आचार्य शिवानन्द दानी
वर्तमान परिदृश्य
हमारे देश भारतवर्ष को स्वतन्त्र हुए लगभग 77 वर्ष हो रहा है लेकिन अभी भी आम आदमी का जीवन स्तर जैसा होना चाहिए वैसा नहीं है। आज भी आम आदमी अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं के पूर्ति हेतु संघर्षरत हैं। हमें अपनी मानसिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों के विकास के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिल पाता क्योंकि हमारी जागतिक क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति हुई नहीं है। हम अपनी तुलना दो देशों- जापान और चीन से कर देखते हैं। जापान में अगस्त 1945 में अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराया गया। इस घटना से जापान की आर्थिक स्थिति चरमरा गई थी। जापान ने नए सिरे से आर्थिक प्रगति की गाथा लिखी। आज जापान एक विकसि त देश है। हमारी और उनकी कोई तुलना नहीं है। जापान हमारे देश से बहुत आगे निकल चुका है। इसी प्रकार से चीन की भी 1960 के पहले की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी, लेकिन उन्होंने भी बहुत तरक्की की है। हमारा देश भारतवर्ष, इन दोनों देशों की तुलना में कहीं भी नहीं है जबकि हमारे यहाँ किसी प्रकार के संसाधन की कमी नहीं है। फिर भी हम लोग गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं।
इसका मुख्य कारण है हमारे देश के नेताओं की पद लोलुपता और धन अर्जन की लालसा। हमारे देश के इन तथाकथित नेताओं में नैतिकता का अभाव है। नेता वही होता है जो समाज के हित की बात सोचता है और तदनुसार कार्य करता है। उदाहरणस्वरुप- सुभाषचंद्र बोस, लालबहादुर शास्त्री आदि। अतः आज समाज में ऐसे नेताओं की ज़रूरत है जो समाज को सर्वांगीण विकास के पथ पर आगे ले चलें, जो जन-जन के कल्याण के बारे में सोचते हैं, जो समाज को सभी प्रकार के शोषणों से मुक्ति दिलाने हेतु संघर्षशील हों। इसी अवधारणा के आधार पर युग–मनीषी श्री प्रभात रञ्जन सरकार ने समाज नवनिर्माण हेतु उपयुक्त नेताओं के लिए ‘सद्विप्र’ शब्द का उपयोग किया है।
सद्विप्र (Sadvipra) कौन?
वे कट्टर नैतिकवान और निष्ठावान आध्यात्मिक साधक, जो शक्ति- संप्रयोग के द्वारा अनैतिकता एवं शोषण को समाप्त करना चाहते हैं, वे ही हैं सद्विप्र (Sadvipra)। इन्हें आध्यात्मिक विप्लवी भी कहते हैं।
धार्मिक नीतिवादी संग्रामी मनुष्य ही सद्विप्र है।
(मानव समाज–2)
वे नेता, जो आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न हैं और जिनकी विचारधारा, आध्यात्मिकता की ठोस चट्टान पर आधारित है । ऐसे उच्च योग्य नेताओं को सदविप्र कहा जाता है।
सद्विप्रों के गुण
निम्नलिखित गुणयुक्त व्यक्ति सद्विप्र कहलाएंगे :-
- जिनमें सभी चारों वर्णों के गुण होंगे।
- जो कट्टर नैतिकवान (यम-नियम का पालनकर्ता) हो।
- जो शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। अर्थात जो रोगमुक्त, दवामुक्त और ग्रन्थिदोष मुक्त हो।
- जो मानसिक रूप से मजबूत एवं विकसित हो अर्थात् जिनको अपने वृत्तियों पर नियन्त्रण (वृत्तिविकार मुक्त) हो।
- जो निष्ठावान आध्यात्मिक साधक हो। अर्थात जो सदैव ब्रह्म सद्भाव में रहकर सबसे व्यवहार करता हो।
- जो अन्याय के विरुद्ध संघर्ष हेतु सदैव तत्पर हो।
- जिनमें आर्थिक समझ हो।
- जिनमें वैश्विक दृष्टिकोण हो।
- सद्विप्र वे होंगे जिनका सम्पूर्ण प्रयास आनन्द-प्राप्ति की दिशा में होगा।
सद्विप्रों की पहचान
निम्नलिखित गुणों के आधार पर सद्विप्र की पहचान होगी :–
- आदर्श आचरण (Model Conduct),
- नि:स्वार्थ सेवाभाव (Selfless Service),
- कर्त्तव्यपरायणता (Dutifulness) और
- नैतिक दृढ़ता (Moral Firmness)
समाजचक्र में सद्विप्रों की भूमिका :-
सद्विप्र समाजचक्र के केन्द्र पर स्थित होंगे क्योंकि वे केन्द्र में रहकर समाजचक्र का नियन्त्रण करेंगे और केवल सद्विप्र ही विश्व की समस्याओं से मानवता को बचा सकते हैं, राजनीतिज्ञ और विशेषज्ञ नहीं। केवल वे सद्विप्र ही विनाश और विलुप्ति से सुरक्षित रहेंगे, जो मानव समाज के कल्याण हेतु कार्य करेंगे। केवल सद्विप्र ही सभी समूहों के लोगों के सर्वांगीण कल्याण की गारण्टी दे सकते हैं क्योंकि सद्विप्र समाज के सभी वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सद्विप्र कभी भी किसी देश की भावना के विरुद्ध जाकर उसे बर्बाद नहीं करेंगे।
आनन्द सूत्रम् के पञ्चम अध्याय के द्वितीय सूत्र के अनुसार :-
“चक्रकेन्द्रे सद्विप्रा: चक्रनियन्त्रका:”
अर्थात् सद्विप्र का चक्र की परिधि में स्थान नहीं है। चूँकि सद्विप्र चक्र का नियन्त्रण करेंगे, अतः सद्विप्र चक्र की धुरी या प्राण केन्द्र के रूप में अधिष्ठित रहेंगे। चक्र ठीक ही चलता रहेगा, किन्तु प्राधान्यवशत: क्षत्रिय युग में क्षत्रिय यदि शासक की भूमिका से शोषक की भूमिका में अवतीर्ण हो, विप्र युग में विप्र यदि शोषक की भूमिका ग्रहण करें अथवा वैश्य युग में वैश्य यदि शोषक की भूमिका में अवतीर्ण हो, उस दशा में शक्ति सम्प्रयोग के द्वारा सत् और शोषित जनों की रक्षा करना तथा असत् और शोषकों का दमन करना इन्हीं सदविप्रों का धर्म है।
प्रउत व्यवस्था में शासन व्यवस्था :-
वर्तमान में शासन चलाने की व्यवस्थाओं में प्रजातन्त्र ही अधिक पसंदीदा व्यवस्था है। लेकिन अभी तक कोई ऐसी आदर्श व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी, जो शोषणमुक्त हो। अन्य शासन व्यवस्थाओं की तरह प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था में भी कई दोष हैं। वर्तमान में प्रउत, प्रतिबन्धित प्रजातन्त्र (Restricted Democracy) पद्धति का समर्थन करता है। भविष्य में सरकार सञ्चालन की और भी अच्छी व्यवस्था बनेगी। प्रउत के अनुसार सद्विप्रों का शासन ही है- नेतृत्व की आदर्श व्यवस्था। अन्धी जड़ शक्ति अथवा कर्मविमुख बौद्धिक अमिताचार के द्वारा इस आदर्श नेतृत्व की स्थापना सम्भव नहीं है।
सद्विप्रों के कार्य :-
जब शासक शोषक बन जाय, तब उस दशा में शक्ति सम्प्रयोग के द्वारा सत् और शोषित जनों की रक्षा करना तथा असत् और शोषकों का दमन करना सद्विप्रों का धर्म है। इसके अलावा मानव समाज के उन्नयन के लिए सदैव कार्यरत रहना, मानव समाज का नेतृत्व करना, समाज सेवा, कल्याणकारी परिषदों का सञ्चालन करना, धर्म-प्रचार आदि। प्रउत के अनुसार सद्विप्रों का शासन ही है आदर्श व्यवस्था। समाज के सर्वात्मक कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए सद्विप्रों के कल्याणमूलक एकनायकत्व (Benevolent Dictatorship) की स्थापना अत्यन्त जरूरी है। इसका रूप होगा- राजनैतिक क्षमता का केन्द्रीकरण और आर्थिक क्षमता का विकेन्द्रीकरण।
राजनैतिक क्षमता के केन्द्रीकरण का अर्थ यह नहीं है कि एक व्यक्ति या एक प्रतिष्ठान के हाथों में सारी क्षमता केन्द्रित होगी। शासन व्यवस्था में निपुण लोगों के बीच से उपयुक्त व्यक्ति का निर्वाचन करके सद्विप्रगण विभिन्न बोर्डो (परिषदों) का गठन करेंगे और उन सद्विप्र परिषदों के माध्यम से शासन व्यवस्था सञ्चालित होगी।
सद्विप्र बोर्ड :-
सद्विप्र बोर्ड निम्न प्रकार के होंगे:-
1) सद्विप्रों का सर्वोच्च परिषद– यह सर्वोच्च परिषद सद्विप्रों में से निर्वाचित सदस्यों के द्वारा तैयार होगा। नीति निर्धारण के मामले में और समाज के अन्यान्य बोर्डों के क्रियाकलापों की सही तरीके से देखभाल करने के लिए यह बोर्ड होगा- सर्वोच्च स्तर का सामूहिक प्रतिष्ठान।
2) सद्विप्रों का कानून बनाने सम्बन्धी बोर्ड Legislative Board :- जो सद्विप्र कानून बनाने के मामले में अभिज्ञ हैं, उन्हीं के द्वारा यह बोर्ड गठित होगा। प्रउत की मूलनीति के अनुसार सर्वोच्च बोर्ड जो कार्यक्रम निर्धारित करेगा उसी के अनुसार कानून बनाना ही इस बोर्ड का काम होगा।
3) सद्विप्रों का शासन कार्य सञ्चालन सम्बन्धी बोर्ड Executive Board:- जो सद्विप्र शासन व्यवस्था के काम में अभिज्ञ हैं, उन्हीं के द्वारा यह बोर्ड गठित होगा। सद्विप्रों का कानून बनाने सम्बन्धी बोर्ड जो कानून और शासन नीति तैयार करेगा, उन्हें लागू करने का दायित्व होगा। जो प्रशासनिक दायित्व में नियोजित रहेंगे, उनका चयन सही तरीके से करना और नियुक्ति देने की देखरेख यह बोर्ड करेगा। शासन व्यवस्था की विभिन्न शाखाओं में जो उप-परिषद (sub-board) गठित होंगे, उनके क्रियाकलापों की भी देखभाल यह बोर्ड करेगा।
4) सद्विप्रों की न्याय व्यवस्था सम्बन्धी बोर्ड Judiciary Board :- जो सद्विप्र न्याय व्यवस्था के काम में अभिज्ञ हैं, उन्हीं के बीच से चुने गए सदस्यों के द्वारा यह बोर्ड गठित होगा। न्यायाधीशों की नियुक्ति और न्याय व्यवस्था के अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति से सम्बन्धित विषय पर विभिन्न नियमों और पद्धतियों का निर्धारण यह बोर्ड करेगा।
5) प्रशासनिक कार्यों हेतु
सद्विप्रों का उप–परिषद (sub-board) :-
शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए विभिन्न उप-परिषदों (sub-board) का गठन करना होगा और इन उप-परिषदों में सद्विप्रों की नियुक्ति की जाएगी। सद्विप्रों का शासन कार्य सम्बन्धी बोर्ड इन उप-परिषद के प्रतिनिधियों के सम्भावित नामों की सूची तैयार करके कानून सम्बन्धी बोर्ड में भेजेगा। कानून बनाने सम्बन्धी बोर्ड फिर से ज़रूरी संशोधन करके वह सूची सद्विप्रों के सर्वोच्च बोर्ड के पास सिफारिश करके भेजेगा। इस मामले में सर्वोच्च बोर्ड अन्तिम अनुमोदन प्रदान करने का अधिकारी होगा।
सद्विप्रों का निर्माण :-
- श्री श्री आनन्दमूर्त्ति जी प्रदत्त आचरण संहिता (Conduct Rules) के कट्टरतापूर्वक पालन करने एवं प्रशिक्षण से सद्विप्र का निर्माण होगा।
आचरण संहिता :- 1. पञ्चदश शील 2. आनन्द मार्ग चर्याचर्य खण्ड-1,2,3. 3.षोडश विधि 4. एक बिन्दु स्थानीय)
- भाति अर्थात विकास (Development) के छह आवश्यक तत्त्व (आध्यात्मिक दर्शन, आध्यात्मिक साधना पद्धति, सामाजिक-आर्थिक सिद्धान्त, सामाजिक दृष्टिकोण, त्रिशास्त्र और प्रवर्तक) जिस समाज में विद्यमान होंगे, वह समाज सद्विप्र निर्माण करने के योग्य होगा।
- मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रशिक्षण ही सदविप्रों का निर्माण कर सकता है। राजनीतिक नेता व्याख्यान मञ्चों से अपनी चापलूसी व भाषण कला से सद्विप्रों का निर्माण नहीं कर सकते। इसके लिए ईमानदारी और आत्मशुद्धि का अभ्यास करना होगा।
- अवश्य ही व्यष्टि जीवन की साधना से ये सद्विप्र गढ़ उठेंगे। धर्मशास्त्र के पाठ करने से या संस्कृत में उपाधि लेने से ब्रह्म की पूजा नहीं होती है। कौन कुलीन है और कौन किस जाति का है- यह लेकर भी ब्रह्म को कोई सरदर्द नहीं है। करनी होगी साधना, करना होगा संग्राम, और इस संग्राम में ही जीवन का प्रकृत मूल्यांकन होगा।
समष्टि जीवन का संग्राम, जिसका नेतृत्व सद्विप्र लेते हैं, वह सतत भाव से चलता रहेगा। सद्विप्र के बाद सद्विप्र आएंगे, एक का मशाल दूसरे उठा कर पकड़ेंगे; किन्तु जो केवल व्यष्टि जीवन की साधना है उसकी समाप्ति नहीं है, उसकी समाप्ति व्यष्टि जीवन की ब्रह्म सम्प्राप्ति में है। व्यष्टि साधना में, सिद्धि नहीं होने पर्यन्त, समष्टि के संग्राम में नहीं उतरेंगे- इस प्रकार का मनोभाव जो लोग पोषण करते रहते हैं, उन्हें हताश होना होगा। कारण समष्टि की कल्याण भावना जो नहीं लेते हैं, उनके लिए व्यष्टि जीवन में व्याप्ति पाना असम्भव है। इसलिए व्यष्टि को सद्विप्र बनने की साधना में लाना होगा। अन्यथा कागज़-कलम में धर्म शब्द जितनी बड़ी चीज़ क्यों न हो जाए, कर्मक्षेत्र में वह धोखा मात्र ही रह जाएगा। साधक को सद्विप्र होने की साधना में उतरना ही होगा- इसी मुहूर्त से उतरना ही होगा। जो घूस लेते हैं, उनका घूस विरोधी प्रचार करना हास्यास्पद होगा। सारा मन-प्राण लगाकर स्वयं को तैयार करने के कार्य में लगाना होगा। केवल वक्तव्य देते हुये घूमते रहने से नहीं चलेगा। जिसमें निष्ठा है, वह निश्चय ही स्वयं को तैयार कर सकेगा, वह निश्चय ही सार्थक धर्म प्रचारक होगा, सार्थक धार्मिक होगा। धर्म-प्रचार के लिए सरकारी सहायता का प्रयोजन नहीं है।
ये सद्विप्र इतने तेजस्वी होंगे कि इनकी साधना, सेवा, त्याग और अन्याय के खिलाफ़ जुझारू प्रवृत्ति के बदौलत, अन्यायी एवं शोषकगण इनके विरुद्ध आँख उठाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पायेंगे। इन्हें जन सामान्य का प्रबल समर्थन रहेगा।
सद्विप्र पैदाइशी नहीं होते, विभिन्न स्तरों से पार करते हुए ही कोई सद्विप्र बन सकता है। सर्वप्रथम कार्यकर्ता (Cadre) बनना होगा, फिर सक्रिय कार्यकर्ता (Active Cadre) बनना होगा और अन्तिम सोपान में नेता (Leader) बनेंगे, जिसे सद्विप्र (Sadvipra) कहते हैं।
अतः सुखी, समृद्ध और शोषण मुक्त समाज बनाने हेतु सद्विप्रों की नितान्त आवश्यकता है। इस हेतु कार्य में लग जाना होगा। समाज में लोगों के बीच जाना होगा। समाज में 50% लोग अच्छे हैं, 25% लोग साधारण हैं और 25% लोग दुष्ट है। यदि हम 50% के साथ 25% जोड़ सकें तो 75% लोग प्रउत के पक्ष में आ जायेंगे। । प्रउत की वाणी जनसाधारण के बीच ले जाना है। मार्क्सवाद के निष्फल आदर्श ने समाज की छाती पर शून्यता पैदा की है। प्रउत के आदर्श के द्वारा इस रिक्त स्थान को पूरा करना होगा।
आज कुशल और आदर्शवादी नेताओं के समूह के नेतृत्व में व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में सर्वांगीण आध्यात्मिक विप्लव की तत्काल आवश्यकता है। वे सभी युगों में सभी देशों में सामाजिक प्रगति सुनिश्चित करेंगे।
अतः नैतिकवान बनें, सद्विप्र बनें और दूसरों को भी नैतिकवान एवं सद्विप्र बनने हेतु प्रेरित करें।
सन्दर्भ : 1. आनन्द सूत्रम
- कणिका में प्रउत खण्ड – 3
- कणिका में प्रउत खण्ड – 18
- मानव समाज खण्ड – 2
- PROUTIST ECONOMICS
- सुभाषित संग्रह खण्ड – 7
आलेख प्रस्तुति :-
आचार्य शिवानन्द दानी
भिलाई दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मो. 8085803885
