गुरुकुल परम्परा और नैतिक मूल्य

 

एल. के. अग्रवाल

 

प्राचीन जम्बू द्वीप स्थित भारत खंड अनेकों ऋषियों, मनीषयों, चिंतकों, विचारकों तथा दर्शनिकों द्वारा आध्यात्मिक स्पंदन युक्त भूखंड है। आध्यात्मिक बल तथा अंतर्ज्ञान के द्वारा इन विभूतियों ने सृष्टि के अनकों रहस्यों का उद्भेदन किया। उन्होंने यह जाना कि सृष्टि चक्र मे करोड़ों वर्षों के संघर्ष के उपरांत मानव शरीर प्राप्त होता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य देवत्व की प्राप्ति है। ऐसे विभूति मानव समाज के दिग्दर्शक बने तथा गुरु की श्रेणी प्राप्त कर अत्यंत पूज्यनीय हो गए। इन्हीं गुरूओं द्वारा सर्वप्रथम शिक्षा की अवधारणा की नींव रखी गई।

लिखित इतिहास में, दुनिया का सबसे प्राचीन शैक्षिक मॉडल गुरुकुल मॉडल रहा है। छात्र पाँच से पच्चीस वर्ष की आयु तक अपने गुरु के साथ रहते थे। गुरुओं द्वारा सादा जीवन, नैतिक मूल्य और वैज्ञानिक ज्ञान प्रदान किया जाता था। गुरु अपने विवेक से छात्रों का चयन किया करते थे। उनकी क्षमता का आकलन कर शास्त्र विद्या, शस्त्र कौशल, विज्ञान, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र इत्यादि का ज्ञान दिया करते थे। गुरुकुल परंपरा में आध्यात्मिक या आत्म ज्ञान सर्वोपरि था, अन्य सभी ज्ञान पूरक मात्र थे।

गुरुकुल परंपरा को समझाने के लिए, मैं विष्णु पुराण के निम्नलिखित श्लोक का उल्लेख करूँगा:-

“तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये।

आयासायापरम् कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्।”

कर्म वह है जो बाँधता नहीं है, विद्या वह है जो मुक्त करती है। अन्य सभी कर्म केवल एक अर्थहीन गतिविधि हैं और अन्य सभी अध्ययन केवल शिल्प कौशल हैं।

उपरोक्त श्लोक का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि गुरुकुल प्रणाली में शिक्षा का केंद्र परा-विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) था तथा अपरा-विद्या (भौतिक ज्ञान) की मात्रा नगण्य थी। इससे छात्रों में आचरण, नैतिकता, श्रद्धा और विनम्रता का उच्च स्तर पैदा होता था। बदलती सामाजिक संरचना के साथ, गुरुकुल परंपरा आजीविका की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं रहा। इसलिए धीरे-धीरे यह प्राचीन शैक्षिक पद्धति का ह्रास होता गया।

समय-समय पर दार्शनिकों और विचारकों ने लोगों और समाज की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से कई तरह की व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। इन सभी पद्धति मे भौतिक आवश्यकता सुख-सुविधा इत्यादि केंद्र में रहा तथा आत्मीय दर्शन का कोई स्थान नहीं रहा। विश्व मे 24 प्रचलित शैक्षिक पद्धति हैं, जिसमें अधिकांश पाश्चात्य सभ्यता से आए हैं, जिसने शिक्षा के आयाम को पूर्ण रूप से बदल दिया।

1907 में इतालियन फिलैंथ्रॉपिस्ट  मारिया मोंटेसरी ने शिक्षा के “मोंटेसरी मॉडल” को प्रस्तुत किया जो अत्यंत ही लोकप्रिय हुआ, जिसे दुनिया भर में स्वीकार किया गया। मोंटेसरी मॉडल मे उम्र के हिसाब से स्ट्रक्चर्ड सैंस ट्रेनिंग के माध्यम से पर्यावरण में संवेदी अनुभवों को प्रोत्साहित किया गया। इस कारण संवेदी और मोटर अंग उत्तेजित हो गए जिसके फलस्वरूप बाह्य ज्ञान को अत्यधिक अर्जित करने की प्रेरणा होने लगी। धन, शक्ति और शोषण आदि का संचय ही मुख्य उद्देश्य बन गया। शक्तिशाली और संपन्न राष्ट्र कमज़ोरों को दबाने लगे। आतंरिक और बाह्य जगत का संतुलन नष्ट होता गया। दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली के कारण आज की दुनिया पूरी तरह अराजकता और संकट की स्थिति में है।

 

ब्रिटिश दार्शनिक जोसेफ रुडयार्ड किपलिंग की टिप्पणी तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने कहा था “पूर्व और पश्चिम एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं तथा इन दो विपरीत सभ्यताओं और दर्शनों को मिलाना असंभव है”।

प्रउत दर्शन के प्रणेता श्री प्रभात रंजन सरकार ने नव्य-मानवतावाद के नाम से एक प्रगतिशील शिक्षा सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। उन्होंने समाज की सेवा करने के लिए आवश्यक कौशल और योग्यता प्राप्त करने की पद्धति को व्यावहारिक रूप से समझाया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सभी जीवित प्राणियों को अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए। पशु, पक्षी, पौधे आदि सभी जीवित प्राणियों की गरिमा को संरक्षित किया जाना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में किसी भी मनुष्य का शोषण, दमन या उत्पीड़न नहीं किया जाना चाहिए। नव्य-मानवतावाद पाश्चात्य विज्ञान और भारतीय दर्शन के विलय की पुरज़ोर वकालत करता है। ऐसा होने पर ही जागृत चेतना, ज्ञान और कला मानव सभ्यता के सौंदर्य को संरक्षित करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। सार्वभौमिकता (universalism) की भावना को जागृत करना नव्य-मानवतावाद की मूल शिक्षा है। आइए हम सभी अपने अंदर नव्य-मानवतावादी मूल्यों को विकसित करें, ताकि पृथ्वी पर एक स्वस्थ, मजबूत और संतुलित मानव समाज का निर्माण हो सके।

एल. के. अग्रवाल