शम्भूत्यानन्द अवधूत
विषय परिचय
प्रस्तावना
आध्यात्मिक लोग परमात्मा या ब्रह्म के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, इसलिए आध्यात्मिक दर्शन ब्रहा की विवेचना से प्रारम्भ होता है। उसके बाद वह इस ब्रह्माण्ड के विषय में जानने की प्रचेष्टा करता है। दर्शन का यह प्रबन्ध अज्ञात (ब्रह्म) से ज्ञात (पदार्थ) की ओर उन्मुख है। लेकिन जड़वादी लोग ब्रह्म के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं- वे लोग पदार्थ के ऊपर ब्रह्म (चैतन्य) की सर्वोच्चता का परित्याग करते हैं। इसलिए जड़-वादियों को दर्शन की इस परम्परागत पद्धति (अज्ञात से ज्ञात की ओर) से पुरुष, प्रकृति, ब्रह्म आदि के कार्य को समझना आसान काम नहीं है। चिन्तन की इस श्रेणी के लोग पदार्थ के केवल भौतिक पक्ष को स्वीकार करते हैं, जिन्हें वे सहज ग्रहण कर लेते हैं। इसलिए इस श्रेणी के लोगों को विषय की ओर अनुप्रेरित करने के लिए ऐसा ढंग होना चाहिए जो ज्ञात (पदार्थ) से अज्ञात (चैतन्य-ब्रह्म) की ओर उन्मुख हो । अतः इस पुस्तक के प्रथम भाग में यह प्रचेष्टा की गयी है कि पाठक पदार्थ के माध्यम से उच्चतर भौतिकशास्त्र के अत्याधुनिक खोज के साथ ही अज्ञात चैतन्य या परमचैतन्य (ब्रह्म) की ओर परिचालित हों ।
पुस्तक के दूसरे भाग में परमश्रद्धेय श्री प्रभात रञ्जन सरकार द्वारा लिखित किताब “Idea & Ideology” के अध्यायों पर आधारित प्रश्नावली और उनके उत्तर हैं। सष्टिचक्र को सुन्दर ढंग से समझ पाने में यह भाग पाठकों की सहायता करेगा। साथ ही, यह पुस्तक तत्काल और तत्पर उद्धरण पुस्तिका के रूप में धर्म-प्रचारकों को भी सहायता करेगा। इसमे दिये गये उत्तर सम्पूर्ण रूप से मेरे नहीं है। ये “Idea & Ideology” से लिये गये हैं। मैंने तो केवल उत्तरों को चुन लिया है और क्रमानुसार व्यवस्थित कर दिया है। ऐसा करने में सम्भवतः कतिपय कमी और त्रुटियाँ रह गयी होंगी । इन सभी त्रुटियों का सम्पूर्णतया उत्तरदायित्व मैं अपने ऊपर लेता हूँ। किसी तरह की विभ्रान्ति तथा दर्शन के विस्तुत स्पष्ट ज्ञान के लिए पाठकों से अनुरोध है कि मूल पाठ-प्रन्थ को पढ़ें।
– लेखक
पदार्थ और चैतन्य
(विज्ञान के गवाक्ष से चैतन्य की स्थिति में एक झाँकी)
साधारणतः हम लोग अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जो ग्रहण करते हैं उसे पदार्थ कहते हैं, और वोध की अन्तः शक्ति चैतन्य है। जड़वादी लोग पदार्थ के ऊपर चेतना की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करते। वे लोग कहते हैं कि मन पदार्थ से उत्पन्न है। वे बोध की अन्तः शक्ति को मन की ही क्रिया के रूप में लेते हैं। इसका अर्थ है कि जड़वादी दृष्टि से मन और चेतना दोनों एक ही हैं। इन लोगों की दृष्टि मे “अत्यन्त व्यवस्थित या संयोजित पदार्थ ही चेतना है” । पदार्थ की कोई प्राक् अवस्था नहीं है। इसका अर्थ है कि पदार्थ ब्रह्माण्ड का मूल कारण है। विज्ञान का यह साध्य तीन प्रश्नों को आमंत्रित करता है:-
(i) क्या मन और चैतन्य (संज्ञान की अंतः शक्ति) एक ही चीज है ?
(ii) क्या पदार्थ की कोई प्राक् अवस्था नहीं है ?
(iii) क्या पदार्थ इस ब्रह्माण्ड का मूल कारण है ?
आएँ, हमलोग इन प्रश्नों का एक-एक कर विश्लेषण करें-
(i) मन और चेतना दोनों एक ही चीज नहीं है। हमलोग अपने-आप से एक प्रश्न करें – “क्या हमारे पास मन है ?” प्रत्येक जीवित मानव-प्राणी इसका उत्तर स्वीकारात्मक रूप से ही देगा। मन के अस्तित्व का अनुभव कौन करता है? मन के अस्तित्त्व बोध को स्वीकृति कौन देता है ? निश्चित रूप से मन स्वयं ऐसा नहीं करता है। अनुभव करनेवाली सत्ता और अनुभव का विषय बोध्य वस्तु और बोध कर्ता ये दोनों एक ही नहीं हैं। मन बाहर विषय की वस्तुओ के अस्तित्व का अनुभव करता है। लेकिन मन के अस्तित्व का बोध करनेवाली सत्ता चेतना है। मन जो कुछ भी ग्रहण करता है, यह चेतना के प्रतिविम्बत प्रतिरूप को ही ग्रहण करता है। इसलिए मन और चेतना एक ही चीज नहीं हैं।
(ii) अब हमलोग दूसरे प्रश्न पर विचार करें- “क्या पदार्थ की कोई प्राक् – अवस्था नहीं है?” – कोई चीज, कुछ नहीं से, अर्थात् शून्य से नहीं आ सकती है। पदार्थ ‘कुछ’ चीज है। यह कैसे ‘कुछ नहीं’, अर्थात शून्य से आ सकता है? पदार्थ की उत्पत्ति निश्चित रूप से किसी चीज से हुई हैं। प्रश्न उठता है, आखिर यह चीज क्या है, जिससे पदार्थ की उत्पत्ति हुई है? इस प्रश्न के निष्कर्षात्मक उत्तर देने में भौतिक बिज्ञान असफल हो जाता है। साधारण युक्ति से भी एक प्राक् अवस्था को स्वीकार करना पड़ेगा। मन पदार्थ का ही प्रतिफलित गुण है। लेकिन पदार्थ में यह विशिष्ट गुण-धर्म (मन का गुण) कहाँ से आता है ? (अर्थात् मन के रूप में गुणान्वित हो जाने की क्षमता उसे कहाँ से प्राप्त हुई) पदार्थ एक ऐसी अवस्था से अवक्रमित हुआ है, जिसमें मन के गुण-धर्म वृहत्तर रूप में मौजूद रहता है। इस तरह पदार्थ की अपनी एक प्राक् अवस्था भी है। यह प्रमाणित होता है।
(iii) पदार्थ इस ब्रह्माण्ड का मूल कारण नहीं हो सकता है। पदार्थ स्वयं प्राक् अवस्था से रहित नहीं है। यह बीज के अन्दर बीज पुनः अन्दर बीज की तरह है। सूक्ष्मतर रूप में पदार्थ’ शक्ति’ है (Matter is bottle up energy) और शक्ति की अपनी उत्पत्ति भी इसकी अभौतिक अवस्था अर्थात् भाव (चैतन्य) से है। इस तथ्य के समर्थन में भौतिक विज्ञान के अत्याधुनिक उपलब्धियों को उद्धत किया जा सकता है।
पदार्थ क्या है ?
पदार्थ उर्जा का स्थूलीभूत रूप है, शक्ति पिण्डों का संतृप्त स्वरूप है Matter is botted up energy, a compact mass of energy) जब किसी तत्व पर विस्फोट किया जाता है तो उसके विस्फोटित सूक्ष्म कण परमाणु कहलाते हैं । जब परमाणु का पुनः विस्फोट किया जाता है तो उसके सूक्ष्म-तर कण इलेक्ट्रॉन (ऋणात्मक विद्युत् प्रवाह), प्रोट्रॉन (धनात्मक विद्युत् प्रवाह और न्यूट्रॉन के रूप में पाये जाते हैं। लेकिन इसके आगे भी प्रश्न उठता है कि इलेक्ट्रॉन आदि के भी नियामक या घटक तत्व क्या है? इस प्रश्न के उतर के रूप में अत्याधुनिक खोज ने क्वार्क सिद्धांन्त (Quark theory) को प्रमाणिक रूप से स्वीकार किया है। क्वार्क इलेक्ट्रॉन के घटक-कण के रूप में माना जाता है। क्वार्क क्या है ? कण की जो सामान्य घारणा है उस रूप में क्वार्क भौतिक कण नहीं है। ये पृथक् भी नहीं किये गए हैं। इनके अस्तित्व का अनुमान कुछ निश्चित अवलोकित घटनाओं के आधार पर किया जाता है अनुसंधान से यह स्थापित हुआ है कि प्रकृति की ऐसी विलक्षणता है, जिसको वैज्ञानिकों ने ‘up’ (उत्थान) ‘down’ (पतन), ‘strange’ (विचित्र) ‘Charm’ (आकर्षण) के नाम से संबोधित किया है। कुछ भौतिक शास्त्रियों ने तो “truth” और ‘beauty’ इन दो और नामों को भी क्वार्क की सम्भावनाओं में स्वीकार करते हैं। अनुसंधान का यह भ्रमण यहीं समाप्त नहीं होता है। वैज्ञानिकों ने इससे आगे भी इस प्रश्न पर विचार किया है कि ‘क्वार्क’ पदार्थ का अन्तिम अंश है या उनके उप-अंश (Sub-particles) भी हैं। इस प्रश्न पर वैज्ञानिकों में मत-भिन्नता है। यह सम्भावना कि क्वार्क की भी आन्तरिक संरचना हो सकती है, पर विचार किया गया है, परन्तु सामान्यतया इसे महत्वपूर्ण नहीं माना गया । क्वार्क पदार्थ का भौतिक अंश नहीं है, बल्कि यह पदार्थ का सूक्ष्मतम रूप है, अर्थात् भाव का प्रवेश-द्वार है। इसलिए कुछ पर्यवेक्षकों ने निष्कर्ष दिया है कि अब ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि भौतिक शास्त्र आध्यात्म-विद्या से मिलने जा रहा है। यह वैज्ञानिकों पर निर्भर है कि वे अपने-अपने आविष्कारों का नया-नया नामकरण करें लेकिन परमाणुओं के अन्तः सूक्ष्म संरचना से स्पष्ट रूप से प्रमाणित कर दिया है कि पदार्थ शक्ति से उद्भुत होता है और शक्ति-भाव (चैतन्य) का रूपान्तरण है।
चेतना और उसके नियत कार्य
यद्यपि अनुसंधान और आविष्कार का पथ व्यापक रूप से खुला हुआ है, लेकिन यह संस्थापित सिद्धान्त है कि पदार्थ कुछ नहीं, शक्तियों का (धनात्मक, ऋणात्मक और विद्युत कणों का) स्थूलीभूत संचयन है । (Matter is nothing but bottled up energy, Electrons, protons etc.)
शक्ति क्या है ?
शक्ति एक अन्ध उर्जा है। क्रियात्मक क्षमता या क्रिया-शक्ति को आवेग (Momentum) की आवश्यकता होती है। दूसरे शब्दों में कहें कि शक्ति को कार्य करने के लिए उन्मुख करने हेतु दूसरे घटक का होना अपरिहार्य है। यह दूसरा धटक क्या है? शक्ति को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक अंतः आवेग (Momentum) कहाँ से मिलती है? क्रियात्मकता, संचालन एक विशेष दिशा में सुव्यवस्थित चेतना का कार्य है, शक्ति का नहीं, क्योंकि शक्ति एक अंध ऊर्जा है जो विवेक या प्रभेद करने की क्षमता से शून्य है। उदाहरण के रूप में मोटर गाड़ी में चलने की शक्ति या क्षमता है, लेकिन एक चालक के रूप में एक दूसरे घटक- चैतन्य-सत्ता की आवश्यकता होती है जो मोटर गाड़ी को चालित करें। जब हमलोग ब्रह्माण्डीय घटनाओं का विश्लेषण करते हैं, तो पाते हैं कि प्रत्येक वस्तु चाहे वह मानव प्रेरित हो, चाहे अमानव-प्रेरित, एक नियम से, व्यवस्थित रूप से परिचालित होती है। यहाँ तक कि वस्तुओं के अन्तराल मे परमाणु, जिसे हम साधारणतया अजीव या जड़ कहते हैं, वह भी एक नियम से संचालित है । पारमाणिवक प्राण केन्द्रों (atomic nucleus) के चारों ओर सतत् पारस्परिक परिवर्तनीय अंश या उपअंश अति तीव्र वेग से घूमते रहते हैं। लेकिन ये सभी एक प्राकृतिक व्यवस्था और नियम के अनुरूप करते हैं। प्राकृतिक नियम के अन्तर्गत सुव्यवस्थित नियमित गतिशीलता को कौन प्रेरित करता है? निश्चित रूप से कहना पड़ता है कि ऐसी शक्ति है चेतना अर्थात् ज्ञानमूल सत्ता । इसलिए जहाँ कहीं भी गति या क्रियाशीलता है वहाँ दो घटक अवश्य ही विद्यमान है -शक्ति और चेतना अर्थात क्रियाशक्ति और ज्ञानमूल सत्ता । इसलिए दर्शन-शास्त्र में कहा गया है-
“शिव शक्त्यात्मकं ब्रह्म”

अर्थात् ब्रह्म शिव और शक्ति अर्थात् पुरुष और प्रकृति का संयुक्त नाम है । शक्ति और चेतना के बिना पदार्थ की कोई भी अवस्था नहीं हो सकती है। उसी प्रकार बिना शिव और शक्ति के या बिना पुरुष और प्रकृति के अर्थात् क्रिया शक्ति और ज्ञातृ सत्ता के बिना कोई भी स्थिति नहीं हो सकती है। इसी विन्दु पर भौतिक विज्ञान और दर्शन-शास्त्र एक साथ मिल जाते हैं । इसलिए ऐसा कहा जाता है कि “जहाँ पर भौतिक विज्ञान समाप्त होता है, वहीं से अध्यात्म प्रारम्भ होता है।
परम चेतना या पुरुषोत्तम (ब्रह्म)
हमलोग जानते हैं कि ऊर्जा अपने सूक्ष्मतम रूप में भाव (चैतन्य) है। चेतना या ज्ञातृ सत्ता जिस प्रकार परमाणुओं के मामले में एक बिशेष वस्तु के क्षेत्र में अपना नियत कार्य करती है, उसी प्रकार वह सार्वभौमिक घटना या ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में भी अपना नियत कार्य करती है। इसलिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के प्रकरण में चेतना को अध्यात्मिक दर्शनशास्त्र में परम चेतन, ब्रह्म या पुरुषोत्तम कहा जाता है।
“परमः शिवः पुरूषोत्तमः विश्वस्य केन्द्रम्।”
परम पुरुष परम चेतना या पुरुषोत्तम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के प्राणकेन्द्र हैं । “तयो सिद्धि संचरे प्रति संचरे च । “सम्पूर्ण सृष्टि उसी परम चेतना से आती है और उसी सत्ता में जाती है संचर (केन्द्र से बाहर जानेवाली धारा) और प्रति-संचर (केन्द्र की ओर आनेवाली धारा) सभी उनकी ही जादू भरी लीला है, पराक्रम है ।
शेष अगले अंक में
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