Songs of New Dawn by Shri Shri Anandamurti Ji
(शरत) ओइ आसे ओइ आसे ओइ आसे,
(शरत) नाचेर ताले ताले पा फेले फेले,
मन्दाक्रान्ता छन्दे धराय़ हासे,
ओइ आसे ओइ आसे ओइ आसे (शरत)।
शरत शुधु नय़ शेफालीर सुगन्धते,
शरत शुधु नय़ सादा मेघेर भेलाते,
शरत प्राणे आसे शरत मने आसे,
शरत भुबनके भुलिय़े मर्मे हासे।
शरत शुधु नय़ बाताबि नेबुर गन्धे,
शरत शुधु नय़ कुश-काशेर दोलार छन्दे,
शरत प्राणे आसे शरत मने आसे,
शरत भुबनके दुलिय़े मर्मे हासे।
भावार्थ:
शरद ऋतु के आगमन को देखते हुए कहा जा रहा है कि शरद वह आ रही है, वह आ रही है, वह आ रही है। नृत्य के तालों पे एक के बाद एक कदम बढ़ाते हुए, मंदाक्रांता छन्द के साथ धरती पर आकर शरद ऋतु मुस्कुरा रही है। शरद ऋतु वह आ रही है, वह आ रही है, वह आ रही है।
शरद ऋतु केवल शिउली फूलों की सुखद सुगंध में या केवल सफ़ेद बादलों के समूहों में ही खुद की झलक नहीं दिखाती है; शरद तो प्राण के भीतर आती है, मन के भीतर आती है और यह शरद दुनिया को मंत्रमुग्ध कर अपने अंतरतम हृदय में मुस्कुराती है।
शरद ऋतु केवल चकोतरा फल की खुशबू में या केवल कुश घास के दोलित होने की छंद में ही नहीं झलकती है; शरद तो जीवन के भीतर आती है, मन के भीतर आती है और यह शरद दुनिया को दोलित कर अपने अंतरतम हृदय में मुस्कुराती है।
