कवयित्री संध्या चक्रवर्ती (1937-2024)
सेवानिवृत्त मेजर और शिक्षाविद् वह जीवन भर बाबा की भक्ति में डूबी रहीं। प्राउट की गतिविधियों और उनके द्वारा संचालित स्कूल में नव्य-मानवतावादी शिक्षा में उनका योगदान बहुत बड़ा था। वह समाज में व्याप्त किसी भी प्रकार की संगठनात्मक अराजकता और भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा मुखर रही थीं। पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में उनके लेख बाबा की विचारधारा को प्रतिध्वनित करते थे। उनके पास सामाजिक कलंक, हठधर्मिता और कई अन्य विषयों पर आधारित 50 से अधिक कविताओं का संग्रह है। वह एक सख्त अनुशासक थीं और हमारे गुरु श्री श्री आनंदमूर्ति (प्यार से बाबा कहा जाता है) द्वारा निर्धारित मूल्यों का पालन करती थीं। वह एक महान गायिका थीं और प्रभात संगीत की बहुत शौकीन थीं।
मानव-मन
क्रोध के बहाव में,
लोभ के झुकाव में,
सत्य के अभाव में,
तड़प रहा है मानव-मन।
झूठ के फैलाव में,
कुटनीति सैलाब में,
भ्रष्टों के समाज में
भटक रहा है मानव-मन।
टूटने की पीड़ा में,
सत्ता की रण-क्रीड़ा में,
जीत-हार की लीला में,
चीख रहा है मानव-मन।
इस सोते संसार में,
अंध कूप अंधियार में,
हिंसा की बयार में,
जाग रहा है मानव-मन।
सोते को जगाना है
देश-प्रेम सिखलाना है,
दलितों को उठाना है,
स्नेह सिक्त है मानव-मन।
भेद-भाव मिटाना है,
सत्य की ज्योति जलाना है,
भ्रष्टचार मिटाना है,
दौड़ रहा है मानव-मन।
न्याय की सेज सजाना है
पूँजीवाद मिटाना है
साम्यवाद फुटलाना है
प्रगति पक्षधर मानव-मन।
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शोषण मुक्त समाज सृजन की भावधारा ही “भारत देश” को सही रूप में स्थापित कर सकेगी।
“Baba” himself has said that anti–exploitation sentiment can help establish Bharat as one nation. Else progress in true sense is far-fetched for the nation.
Very beautifully written kavita by Respected Chakravarti Didi 🙏💐