मानव सभ्यता का प्रथम पदविक्षेप था अग्नि का आविष्कार। द्वितीय पदविक्षेप लोहा का आविष्कार। तृतीय पदविक्षेप चक्र (चक्का) का आविष्कार।
प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य आग के बारे में नहीं जानता था। प्रागैतिहासिक मानव फल, मूल, कोमल हरी पत्तियाँ तथा कच्चा मांस खाकर जीवन यापन करता था। वे न तो आग जलाना जानते थे और न ही आग का उपयोग। भय और भक्ति के कारण वे अग्नि को अपने देवता के रूप में पूजते थे।
समय ने अपनी अनवरत यात्रा जारी रखी। मनुष्य ने अग्नि की खोज की। आग की खोज, या बेहतर कहें तो आग का आविष्कार, मानव इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन था। आग के आविष्कार के बाद लोग इसका प्रयोग करने लगे। आग के उपयोग को परिष्कृत करने में कुछ और शताब्दियाँ लग गईं। धीरे-धीरे लोगों ने आग का सही उपयोग करना सीख लिया। उन्होंने कच्चे मांस के बजाय भुना हुआ मांस खाना और अन्य प्रकार के भोजन को आंशिक रूप से पकाकर अधिक स्वादिष्ट बनाना सीखा।
आग के आविष्कार के इस पहले क्षण ने मनुष्य को जीवित प्राणियों में सबसे महान के रूप में प्रतिष्ठित किया। आग के उपयोग के माध्यम से, आकाश-चुंबन वाली सभ्यताओं का निर्माण किया गया जो मानव जाति को सब कुछ दे सकती थी – सब कुछ, यानी जीवन की गहरी खुशी को छोड़कर।
आग अपरिहार्य है. अग्नि के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। धातुकर्म, और पहियों, वाहनों, हथियारों, कृषि उपकरणों और बुनाई मशीनों का निर्माण, सभी अग्नि की कृपा से होते हैं। आग तैयार करना कोई आसान काम नहीं है. प्रारंभिक चरण में, उन्होंने चकमक पत्थर के दो टुकड़ों को आपस में रगड़ने की घर्षण गर्मी के माध्यम से आग उत्पन्न की। आग किसी से भी नहीं रखी जा सकती थी। कुछ ऋषियों को आग जलाने के लिए नियुक्त किया गया था।
प्रागैतिहासिक युग में जिस मानवगोष्ठी ने प्रथम आग का आविष्कार किया था, वही उस काल के विचार से सबसे सभ्य और प्राग्रसर माना जाता था। क्रमश: आग का व्यवहार सारी मानवगोष्ठी में प्रचलित हुआ। उसके बाद जिस मानवगोष्ठी ने प्रथम लोहा का व्यवहार सीखा वह युग (स्टोन एज), अस्थियुग (बोन एज), बोज्युग (कास्य युग) प्रभृति की सीमारेखा पार कर उन्नत्तर सभ्यता के अधिकारी के रूप में विवेचित होता रहा। लोहा ने ला दिया मानव इतिहास की गति में नवतर स्फूर्ति – नई द्युति।
तब तक चक्के का आविष्कार नहीं हुआ था, इसलिए गाड़ी भी उद्भावित नही हुई थी। तब लोहे की सहायता से मनुष्य ने चक्का बनाया। उस चक्के लगी गाड़ी पर बैठकर उसने युद्ध करना सीखा। चक्के के अन्तिम भाग (सिरे) को सूक्ष्म और धारदार करके उसने ‘चक्र’ नामक अस्र का आविष्कार किया। बुमेराड़ भी एक प्रकार का चक्र है जिसे आस्ट्रेलिया के माओरी व्यवहार करते थे। भारत और मध्य एशिया में सुप्राचीन काल से मनुष्य ने चक्र का व्यवहार सीखा था। पर उसे वह जितने भी प्राचीन काल से ही सीखा क्यों न हो, उसे उसने लोहा का व्यवहार सीखने के बाद ही सीखा। अर्थात् पहले उद्भावित हुआ था रथ चक्र, बाद में उद्भावित हुआ था प्रहरण चक्र।
प्राचीन अमेरिका की माया सभ्यता एक समय पृथ्वी की अनेक सभ्यताओं से आगे थी। किन्तु चक्का उद्भावन के विषय में पिछड़ने के कारण अनेक सभ्यताओं से ही उसे हार मानना पड़ा था। माया सभ्यता का जो सर्वप्राचीन निदर्शन मिला है उसमें उन्नत जीवन-यात्रा के अनेक प्रमाण रहने पर भी चक्का नहीं है। स्मरण रखना आवश्यक है कि इस माया सभ्यता के नाम से ही अमेरिका का संस्कृत नाम ‘मायाद्वीप’ पड़ा था। मध्ययुग के चोल, पांड्य और पह्लव वंशीय राजाओं के समय भारत के साथ मायाद्वीप का सम्बन्ध था यह कोलम्बस के अमरीका आविष्कार करने के पहले से ही।

लौहा का व्यवहार, चक्का का व्यवहार, सभी में आग की आवश्यकता है। प्राचीनकाल में इसलिए मनुष्य ने अग्नि का व्यवहार सीखने के साथ ही साथ अग्नि को अपना देवता मानकर पूजा करना और सम्मान जताना शुरू किया। प्राचीन युग के आर्यों के देवता हैं इन्द्र, अग्नि, वरूण प्रभृति। वेदज्ञ पण्डित गृह-गृह में यज्ञकुण्ड के माध्यम से अग्नि की रक्षा करते थे। वे साग्निक या अग्निहोत्री नाम से अभिहित होते थे। मन्त्रोच्चारण के द्वारा यज्ञ में समिध आहुति देकर मनुष्य जिस अग्नि की अर्चना करते थे, उस अग्नि को मृत के मुख में आखिरी बार के लिए छुलाने की प्रथा उन्होंने तब प्रवर्तन किया। यह प्रथा ‘मुखाग्नि क्रिया’ के नाम से परिचित हुई थी। यद्यपि इस क्रिया की आज और कोई सार्थकता नहीं है। आज कोई भी घर-घर यज्ञकुण्ड में अग्नि रक्षा नहीं करते। आज दियासलाई के डिब्बे या लाइटर के आधार में अग्नि रक्षित होती है। परवर्ती काल में जब अग्नि का आविष्कार पुराना पड़ गया तब समाज में अग्निदेवता का महत्व कम हो गया। इन्द्र, अग्नि, वरूण प्रभृति वैदिक देवता धीरे-धीरे हट गये। उनके शून्य को पूर्ण किया परवर्ती काल के देवता ब्रह्मा, महेश्वर नेl
साझाकर्ता: अवधुतिका आनंद श्वेता आचार्या
