‘प्रउत’ दर्शन के अनुसार, उपभोक्ता की जरूरी सामानों का बाजार से गायब होना तथा उसकी कमी होना महँगाई का प्रथम कारण है। दूसरा कारण है, ‘सोना या उत्पादन’ समर्थन के बिना रुपया छापना। काले धन की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके लिये सरकार की गलत नीतियाँ पूर्णतः जिम्मेदार है। “बायदा कारोबार” यानि “Future Trading” का रोल बहुत ही शोषणपूर्ण हैं, और हमारी सरकार इसे बढ़ावा देती है।

मुद्रा प्रवाह मे रुकावट भी महँगाई एवं मंदी का कारण है। मुनाफा प्रेरित आर्थिक गतिविधियाँ संपत्ति संग्रह का कारण है और मुनाफा नहीं मिलने की सम्भावना पूँजी निवेश होने नहीं देता है। अन्तोगत्वा, उत्पादन नहीं, आय नहीं। परिणाम स्वरूप, क्रयशक्ति में ह्रास और बजार में माँग की कमी इसका दुष्परिणाम है संपत्ति का संग्रह। विदेशों में जमा किये गये काले धन के आंकड़े सुनकर और इस धन को देश में नहीं लाने की सरकार की वेरुखी देखकर देश के शुभचिंतक के सिर में दर्द हो रहा है। सरकार और प्रशासन की काले धन पर चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही हैं। भारत की अर्थव्यवस्था को नष्ट करने वाली इस गैरकानूनी सम्पदा को जब्त करने और इसको अर्जित करने वालों पर सरकार की सुस्ती चौंकाने वाली है। यह मामला और भी गंमीर है, जब देश की शीर्ष अदालत सरकार को कई बार फटकार लगा चुकी हैं। कई सामाजिक संगठन इसके खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं।
विदेशों में जमा यह काला धन 258 लाख हजार करोड़ के बीच होने का अनुमान है। सरकार के पास बैंको ने खुद उन लोगों की सूची भेजी है, जिनकी अकूत संपत्ति कालेधन के रुप में विदेशी बैंको में जमा है। आज तक सरकार भ्रष्टाचार पर संयुक्त राष्ट्र संघ की संधि (U.N Conference on Corruption) की पुष्टि नहीं की है। अगर इस संधि को लागू कर दिया जाय तो सभी देशों के बैंकों के गुप्त कानून का अड़गा ही समाप्त हो जाएगा और हम बड़ी आसानी से बाहर भेजे गये काले धन की जानकारी हासिल कर सकते हैं। अगर काले धन को देश में लाकर जन-कल्याण कार्य में लगाया जाय तोः

- भारत विश्व का सबसे शक्तिशाली अर्थशक्ति बन सकता है।
- देश का सारा कर्ज चुकता किया जा सकता है।
- बचे हुये रकम का ब्याज ही देश के कुल बजट से ज्यादा होगा।
- देश-वासियों पर लगाये गये सारे कर हटाने पर भी सरकार बड़े आराम से अपने सारे कार्य कर सकती है।
- काले धन के उपयोग से देश में 2.8 लाख किमी0 लम्बे राजमार्ग का निर्माण किया जा सकता है।
- इस धन से देश में 1500 मेगावाट के 280 पावर प्लांट लगाये जा सकते हैं।
- अतः हम समझ सकते है कि बढ़ती महँगाई, बिजली की समस्या, शुद्ध पेय जल का अभाव एवं पानी की समस्या, समुचित शिक्षा, चिकित्सा, आवास एवं भोजन की व्यवस्था का समाधन देश के बाहर काला धन जाने पर रोक और देश में इसकी वापसी के लिये समुचित अर्थनीति को लागू करने से ही होगा।
आज भ्रष्टाचार को रोकने के लिए श्रीमान् अन्ना हजारे के साथ-साथ हजारों लोग आमरण अनशन पर बैल रहे हैं। वास्तव में जन लोकपाल विधेयक हमारी प्रजातन्त्र की रीड को मजबूत ही करेगी और बहुत हद तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सहायक होगी।
मानव समाज एक बहुत ही विषम परिवर्तन की दौर से गुजर रही है। परिवर्तन का यह परिवेश सामाजिक जीवन की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक नैतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों में सम्पूर्ण क्रान्ति का आहवान करता है। समाज परिवर्तन की गति को त्वरित करना ही कान्ति है। किसी खास युग में परिवर्तन का तौर-तरीका समूह मनोभावधारा के स्वभाव पर निर्भर करता है। अगर शोशित वर्ग नैतिक साहस, स्वाभिमान एवं बौद्धिक विकाश के अभाव में सुख-सुविधाओं के प्रलोभन में पड़कर शोशकों की दासता को स्वीकार कर लेता है, तो उन शोशित वर्गों से समाज परिवर्तन कभी भी सम्भव नहीं है। हाँ, अगर शोशितों का नैतिक साहस, स्वाभिमान एवं बौद्धिक झमता विकशित हो और शोषण से समझौता नहीं करता हो, तो शोषण के विरूद्ध संग्राम एवं सम्पूर्ण क्रान्ति संभव है।
संपत्ति का संग्रह, उसका दुरूपयोग और अनुपयोग ही आर्थिक समस्या एवं सामाजिक पतन का कारण है। इस अवस्था में दोनों वर्गों (जिसके पास “है”, और जिसके पास “नहीं है”) का नैतिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक पतन होता है। शोषक वर्ग जब आवश्यकता से अधिक संग्रहीत संपत्ति का दुरूपयोग करता है, तो उसका पतन होता है।
उसकी मनोभावधारा जड़ाभिमुखी होती है। उस तरह के लोगों के लिए नैतिकता और मानव मूल्य का कोई कीमत नहीं है। बड़ी ही निर्दयता एवं क्रूरता से समाज के प्राण-धर्म को नष्ट कर देता है। रोटी, कपड़ा, मकान के अभाव में जन-समुदाय नैतिक एवं मानव मूल्यों को छोड़ने के लिए विवश ही जाता है। किती भी समाज का सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सुख-शान्ति, जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति पर निर्भर करती हैं। अगर हम धर्म का उत्थान और पापशक्ति का विनाश चाहते हैं तो दोशपूर्ण सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था को हटाना जरूरी है।
युग के महान विचारक एवं दार्शनिक श्री प्रभात रंजन सरकार 1959 में “प्रगतिशील उपयोग तत्व (प्रतत) दर्शन का प्रतिपादन किया था। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में संपत्ति संग्रह एवं मुनाफा पर कोई नियन्त्रण नहीं है। साम्यवादी अर्थनीति में संपत्ति पर नियन्त्रण एवं इसका सन्चालन सरकार करती है। प्रउत अर्थनीति के अनुसार आर्थिक संरचना सहकारिता आधारित है। इस व्यवस्था में आम लोगों का
आर्थिक सशक्तिकरण होगा और उनकी भागीदारी बढ़ेगी। साम्यवादी अर्थवयव्स्था का विफल होने का मुख्य कारण था राज-नियंत्रित अर्थतंत्र। इस व्यवस्था में काम करने वाले लोगों की प्रेरणा और भागीदारी का अभाव रहा।
प्रउत सभी प्रकार की संपदा को समाज का धरोहर संपत्ति मानती है और इसका अधिकतम उपयोग एवं विवेकपूर्ण वितरण चाहता है। कीसी भी समाज में किसी वर्ग विशेश का संपत्ति पर अधिकार ही समाज को दो या अधिक वर्गों में बाँटता है। सभी प्रकार की संपत्ति पर समाज के अधिकार का सिद्धान्त मानकर ‘प्रउत’ एक वर्गविहिन समाज कि अवधारण प्रस्तुत करता है। यह एक नवीनतम सामाजिक-आर्थिक दर्शन है जो पूँजीवाद एवं साम्यवाद के दोशों से मुक्त है। यह मानव जीवन के सर्वात्मक विकास के लिए जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति एवं क्रय शक्ति में उत्तरोतर वृद्धि का सुयोग प्रदान करता है। इस व्यवस्था में वयष्टि एवं समष्टि दोनों का सर्वात्मक कल्याण निहित है। प्रउत एक अध्यात्म-केन्द्रित दर्शन है। यह दुनिया की सारी संपत्ति का मालिक परमपिता परमात्मा को ही मानता है। उसके इस अमूल्य निवि का सदुपयोग प्रत्येक प्राणी उनकी सन्तान होने के नाते कर सकता है परन्तु दुरुपयोग करने की अनुमति किसी को भी नहीं है
लिए महँगाई, भ्रष्टाचार, कालाधन, बेरोजगारी को दूर करने के “प्रउत” दर्शन अर्थिक प्रजातंत्र (ECONOMIC DEMOCRACY) के सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। आर्थिक सशक्तिकरण के बिना राजनैतिक प्रजातंत्र, आर्थिक शोशण का मात्र एक यंत्र है। प्रजातंत्र को प्रभावशाली बनाने के लिए आर्थिक प्रजातंत्र (ECONOMIC DEMOCRACY) आवश्यक है।
स्थानीय संपदा पर स्थानीय नियंत्रण के द्वारा “आर्थिक प्रजातंत्र आत्मनिर्भरता एवं आत्मपोशकता पर आधारित है।
सामाजिक-राजनैतिक चेतना, शिक्षा, नैतिकता तथा जीवन की आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति के अभाव में राजनैतिक प्रजतंत्र प्रभावी नहीं हैं। प्रजातंत्र की सफलता के लिए “आर्थिक प्रजातंत्र” के निम्नलिखित सिद्धांत का अनुसरण करना होगा।
- स्थानीय कच्चामाल से तैयार माल का उत्पादन उसी क्षेत्र में होना चाहिए।
- क्षेत्र के कच्चेमाल का निर्यात दूसरे क्षेत्र में नहीं होना चाहिए।
- शत-प्रतिशत रोजगार की व्यवस्था करना अनिवार्य है।
- एक क्षेत्र के पूँजी का दूसरे क्षेत्र में स्थानान्तरण नहीं होगा।
- जीवन के न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति एवं क्रयशक्ति में उत्तरोतर वृद्धि
- सभी विकास योजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी और मंजूरी साथ ही साथ सामाजिक-आर्थिक चेतना को भी जगाना होगा एवं नैतिक स्तर को ऊँचा उठाना होगा।
कोई भी देश तथा उसके नागरिक तभी प्रगति तथा विकास की राह पर चल सकते है जब नेतृत्व सिद्धान्ती तथा नैतिकता को आधार बनाकर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर रहा हो। भारत में आज की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सरकार उत्तरदायित्व का निर्वाह नहीं कर रही है। सरकार की साख खत्म हो रही है, जनता का विश्वास उठ रहा है यह बहुत ही चिंता का विशय है।
“नोवेल पुरस्कार विजेता रूसी लेखक रोलेक्जेंडर सोलमहेनित्सिन ने लिखा था कि लोगों पर सत्ता का प्रभाव तभी तक रहता है जब तक वह उनका सबकुछ नहीं ले लेती है। लेकिन जब व्यक्ति का सबकुछ लुट लिया जाता हैं, तब सत्ता का उस पर कोई प्रभाव नहीं रह जाता है। वह फिर आजाद हो जाता है। यदि सरकार जनता को जीने के न्यूनतम आवश्यकताओं से वंचित ना किया होता हो, तो आज समाज में इतनी आशांति, आंदोलन, अभाव, गरीबी, बेरोजगारी और महँगाई नहीं होती है। मरता क्या ना करता। सरकार की गलत नीति और सामाजिक-आर्थिक परिवेश लोगों को अपराधी बनने के लिए मजबूर कर रही है।
इमानदारी का मूल्यांकन करने वाली “ट्रान्सपेरेंसी इन्टरनेशनल” की सूची में हमारा देश बहुत ही नीचे है। इस सूचकांक में हम उन देशों के साथ खड़े हैं जहां मानवाधिकारों की स्थिति बदतर है। हमारी न्याय प्रणाली आर्थिक आपराधों के खिलाफ प्रभावकारी नहीं है। हाल में हुई आदर्श घोटाला, C.W.G घोटाला, ‘2-जी स्पेक्ट्रम’ घोटाला, सी.वी.सी घोटाला, आई.पी.एल. घोटाला, कालाधन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में विफलता इस प्रणाली की कलई खोल दी है। जिस तरह सरकार अपनी साख खोती जा रही है वह देश की आर्थक, सामाजिक तथा राजनैतिक स्थिरता के लिए अच्छा नहीं है। यही कारण है कि “प्रउत” पूँजीवादी व्यवस्था का “लिबरल डिमोक्रेसी” और साम्यवाद का “सोसलिस्ट डिमोक्रेसी” के स्थान पर आर्थिक प्रजानतंत्र को लागू करना चाहता है। वर्तमान प्रजातन्त्र को और भी कारगर और मजबूत करने के लिए प्रउत का विशा निर्देश है कि सरकार का चार अंग-विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और लोकपाल की स्वतंत्र किया जाये। अन्ना हजारे का आन्दोलन इस दिशा में सही कदम है। लेकिन ‘प्रउत” का विचार है कि इतना ही काफी नहीं है। विधायिका के द्वारा कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की बहाली एवं उसके कार्यों में हस्तक्षेप को रोका जाए। तभी जाकर प्रजातंत्र अधिक कारगर सावित हो सकती है।
अतः अगर हम एक शोशण मुक्त समाज तथा सशक्त देश का नवनिर्माण करना चाहते है तो हमें एक नया विकल्प खोजना पड़ेगा। श्री पी० आर० सरकार द्वारा प्रतिपादित्त “प्रगातिशील उपयोग तत्व” (प्रउत्त) हमारे सामने एक विकल्प है। यह एक ऐसा सामाजिक आर्थिक सिद्धांत है जिसकी नितियों पर चलकर समाज को सर्वात्मक कल्याण के पथ पर ले जा सकते है, साथ ही साथ देश को हम सशक्त राजनैतिक संरचना प्रदान कर सकते है। नव्यमानवतावाद और अध्यात्म पर आधारित “प्रउत” दर्शन हमारी सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है।
प्रउत चाहता है कि :
(क) संविधान में “जीने का अधिकार” के साथ साथ योग्यतानुसार “रोजगार का भी अधिकार” दे। “प्रउत” की सरकार इसकी गांरटी प्रदान करता है।
(ख) “प्रउत” अर्थव्यवस्था में कयशक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि की गारंटी है।
(ग) भारत का समरूप विकास के लिये “प्रउत” नीति के अनुसार देश को 44 सामाजिक आर्थिक इकाईयों में विभक्त किया गया है एवं ब्लॉक स्तरीय विकेन्द्रीकृत योजना के द्वारा सभी इकाइयों को आत्मानिर्भर बनाने के लिए कटिबद्ध है.
(घ) हमारा उद्देश्य है:
- (१) जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं (भोजन कर आवास चिकित्सा एवं शिक्षा की पूर्ति की गारंटी।
- (२) क्रयशक्ति एवं जीवन स्तर में उत्तरोत्तर वृद्धि ।
- (3) मेधावी लोगों को, जिसका योगदान समाज की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, चिकित्सा, शिक्षा, विज्ञान, नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान में विशेष रूप से है, विशेष सुविधा प्रदान करना चाहिए।
(ड) एक सामाजिक क्षेत्र के कच्चे माल का दूसरे क्षेत्र में स्थानान्तरण रोका जाय। अपितु उपभोक्ता के लिये प्राप्त कच्चा माल से तैयार माल उसी क्षेत्र में तैयार हो।
(च) एक सामाजिक आर्थिक इकाई से दूसरी इकाई में संपत्ति का स्थानान्तरण नहीं किया जाय।
(छ) किसी भी इकाई की विकास योजना वहाँ के स्थानीय लोगों के विचार-विमर्श से आवश्यकतानुसार किया जाना चाहिए।
(ज) सभी वृहत् उद्योग सहकारिता पर चलाया जायेगा। मूल उद्योग (उदाहरणः स्वरूप खनिज, यातायात, ऊर्जा, संचार, सुरक्षा, मानव संसाधन इत्यादि) आवश्यकतानुसार स्थानीय या केन्द्रीय सरकार द्वारा “न नफा, न नुकसान” पर चलाया जाना चाहिए। लघु उद्योग निजी क्षेत्र में रहेगा।
(झ) स्थानीय लोगों को शत-प्रतिशत रोज़गार देने के लिये अधिक से अधिक कृषि आधारित एवं कृषि उद्योग की स्थापना की जानी चाहिए। (वे सभी लोग स्थानीय माने जायेंगे जो अपना आर्थिक हित रहने वाले समाज के हित में मिला दिया है)
(ञ) कृषि को उद्योग का दर्जा दिया जाना चाहिए।
(ट) काले धन को तुरन्त समाप्त करने के लिए नयी मुद्रा का मुद्रांकण हो और आयकर को हटाकर सरकार अपनी खर्च चलाने के लिए उत्पादन स्रोत पर ही उत्पादन शुल्क लगावे। इनकम टैक्स ही काला घन पैदा करने का कारण है।
(ठ) सभी स्तर के सभी प्रकार की शिक्षण संस्थान राजनैतिक दबाव एवं हस्तक्षेप से मुक्त रक्खा जाय।
(ड) नारी हमारी जनसंख्या का लगभग 50 प्रतिशत है। अतः नारी समुदाय का पिछड़ापन कम करने के लिये विशेष योजना का कार्यान्वयन किया जाना चाहिए।
(ड) प्रउत भ्रष्ट नेतृत्व के स्थान पर नैतिकवान नेतृत्व का समर्थक है। नैतिकता एवं सामाजिक-आर्थिक विकास हमारा नारा है। अब तक की तीनों मुख्य व्यवस्थाओं (पूँजीवाद, साम्यवाद एवं मिश्रित) ने जहाँ एक तरफ नैतिकता एवं अध्यात्मिकता को त्यागकर उसके नाम पर अन्धविश्वास, रूढ़िवाद, जातिवाद तथा अन्य संकीर्ण विचारों, बुराइयों को जन्म दिया है एवं भौतिकता को जीवन का चरम लक्ष्य साबित करने का असफल प्रयास किया है, वहीं वैज्ञानिक एवं तकनीकी अग्रगाति और जीवन की आवश्यक चीजों की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद आम जन जीवन दुःख, दारिद्रय एवं निराशा का जीवन जी रहे हैं। ऐसी दशा में आर्थिक-सामाजिक चेतना के प्रदीप को जलाये रखने के लिए, “प्रउत” रूपी संजीवनी सुधा का संचार जनजन में करना आवश्यक है।
आज हमारे सामने सबसे अहम सवाल है नैतिकवान नैतृत्व का। नैतिकता एक गुण है जिसका सम्बन्ध मानव मनोविज्ञान से है। शैक्षणिक और सांस्कृतिक परिवेश के द्वारा खासकर बच्चों में नैतिक गुणों को उन्नत करने के प्रयास में लगे रहना होगा। समाज सुधार का यह अनबरत प्रयास स्वयंसेवी सामाजिक संस्थाओं द्वारा चाहता रहेगा परन्तु तत्काल भ्रष्टाचार तथा अन्य सामाजिक दावों को दूर करने के लिये एक ऐसी व्यवस्था को लाना होगा जिसमें समाज विरोधी साथी कोष्चार तथा अपराध करने का मौका ही नहीं मिले। पाशविक प्रवृत्ति वाले भ्रस्ट एवं समाज विरोधी तत्व उपदेश की भाशा नहीं सुनते हैं। हमें कठोर दण्डव्यवस्था करनी होगी। एस ऐसा प्रशासनिक कदम उठाना होगा जो अपरधी मानसिकता वाले लोगों को भ्रश्टाचार एवं अपराध करने से रोक सके।
यद्यपि कि प्रजातन्त्र आज के समय में और भी किसी तन्त्र से बेहतर है फिर भी इसे हम दोश मुक्त नहीं कह सकते हैं। आज से बाई हजार साल पहले प्रजातन्त्र की शुरुआत लिच्छवी राजतन्त्र से हुई थी। उस समय के प्रजातन्त्र में भी सभी लोगों को मतदान का अधिकार नहीं था। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी लोगों को मतदान का अधिकार नहीं होना चाहिए। मतदान का अधिकार जरूर मिले परन्तु मतदाता में समुचित गुणों का समावेश हो, जिससे वे नैतिकगुणों से सम्पन्न उम्मीदवार को चुनकर विधानसभा एवं लोकसभा भेज सकें। ‘प्रउत’ दर्शन के अनुसार योग्य मतदाता के लिये निम्नलिखित गुणों एवं परिवेशों का होना नितान्त जरूरी है।
सामाजिक-राजनीतिक चेतना (सामाजिक-राजनीतिक चेतना)
- नैतिकता (Morality)
- शिक्षा (Education)
- जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति (भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा और शिक्षा) यानि गरीबी का ना होना।
मतदाताओं में उपरोक्त गुणों और परिवेशों को लाना सरकार का उत्तरदायित्व है। इन्हीं योग्यताओं के अभाव में प्रजातन्त्र सफल नहीं हो रही है।
हम जो भी व्यवस्था लावें, जब तक नैतिकवान् नेतृत्व के हाथों में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका नहीं होगा। तक तक अच्छे परिणाम नहीं मिलेंगे। निराशा ही निराशा हाथ लगेगी। धउत एक नयी व्यवस्था की अवधारणा प्रस्तुत करता है। सरकार के चार अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, लोकायुक्त) में समुचित सन्तुलन बनाये रखने के लिय इन अंगों को स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में कार्य करने का अधिकार दिय जाना चाहिए। “प्रउत” में इसे हम कम्पार्टमेन्टलाइज्ड डिमोक्रेसी (Compartmentalised Democracy) के नाम से जानते हैं।
अब प्रश्न यह उठना है कि चयन कैसे किया जाए। जहाँ तक विधायिका का सवाल है, वह तो गुण सम्पन्न, योग्त मतदाताओं से निर्वाचित होंगे। “प्रउत” मतदाता और उम्मीदवार की योग्यता के निर्धारण का समर्थक है। यह सरकार की जवाबदेही बनती है कि वह मतदाताओं को मतदान देने योग्य बनायें। इन्हीं योग्य मतदाताओं से मतदान सूची बननी चाहिए। जहाँ तक कार्यपालिका और न्यायपालिका के गठन का सवाल है, वे उन्हीं योग्य मतदाताओं से निर्वाचित एक “सर्वोच्च बॉडी” के द्वारा गठित और नियंत्रित होना चाहिए। विधानसभा तथा लोकसभा ‘पॉलिसी’ बनाने वाली बॉडी है। इसको यह भी देखना है कि बनाई हुई पॉलिसी का कार्यान्वयन ठीक से हो रहा है या नहीं, लेकिन सरकार के अन्य अंगों के गठन एवं संचालन में विधायिका हस्तक्षेप नहीं करेगी उन पर नजर ‘सर्वोच्च बॉडी रखेगी और आवश्यकतानुसार समुचित कार्यवाही भी करेगी।
लिबरल डिमोक्रेसी (Liberal Democracy) में राजनैतिक शक्ति विकेन्द्रित रहता है और अर्थशक्ति व्यश्टि के हाथों में केन्द्रित रहता है। केन्द्रित अर्थशक्ति विकेन्द्रिकृत राजनैतिक शक्ति को मनमानी ढंग से कठपुतली के समान नचाता है। इतना ही नहीं, केन्द्रित अर्थव्यवस्था ही भ्रश्टाचार अपराध और सामाजिक पतन का सबसे बड़ा कारण है। साम्यवाद में तो राजनैतिक शक्ति और अर्थशक्ति, दोनों का नियंत्रण सरकार करती है। इसका दुश्परिणाम । रोटी, कपड़ा, मकान मिलने की बात तो दूर ही रहती है उल्ले विचारों एवं वाक्यों की स्वतन्त्रता भी छिन जाती है।
इन्हीं बिन्दुओं को ध्यान में रखकर “प्रउत” सहकारिता आधारित अर्थनीति द्वारा अर्थशक्ति का विकेन्द्रिकरण और जन-साधारण का आर्थिक सशक्तिकरण करना चाहता है। आम जनता की आर्थिक मजबूती और सुख-सम्पन्नता प्रजातन्त्र की नींव को और भी मजबूत करेगा।
देश के उन समस्त मानवता के शुभ चिन्तक एवं खास कर युवा वर्गों को प्राउदिष्ट यूनिवर्सल आह्वान करता है कि आज देशव्यापी जागरण के समय नवयुग निर्माण हेतु सम्पूर्ण क्रान्ति लाकर समस्त मानव जाति को “प्रउत” रूपी ज्ञान से आलोकित कर “नूतन भारत” का निर्माण करें।
प्राउटिष्ट यूनिवर्सल सभी प्रबुद्ध एवं सजग लोगों से आग्रह करता है कि “प्रउत” दर्शन पर आधारित नव समाज निर्माण में लगे लोग अधिक से अधिक लोगों तक प्रउत के विचार साझा करें।
