वटवृक्ष
गौतम प्रधान ‘मुसाफ़िर’

अपने शाखाओं प्रशाखाओं से
रखता स्वयं को आच्छादित
जिसके तले
नई कोपलें भी होते पल्लवित
अपने फलों से हो रहे हर्षित
और समृद्धि को सुशोभित
बाहर फैला जितना
अंदर जड़ें भी संघनित
एक पिता
अपने परिवार में
सभी सदस्यों को रखता एकजुट
जिसके स्नेह तले
परिवार होता सुरक्षित
भावी पीढ़ी को संस्कार हेतु
तैयार कर होता हर्षित
उसका कर्तव्यबोध
मानों जीवटता का संदेश देती
होता अपार ऊर्जा संचारित
जिजीविषा को तत्पर
उत्तरदायित्व को समर्पित
पिता जिसकी छाँव तले
एक संसार होता सृजित
भरा पूरा परिवार हो
हो ऐसा प्रयास समेकित
कठोर कोमल द्वय गुण
इनमें बाह्य व अंतः दर्शित

पर्णरहित विटपों से सीखा
~ शशि बिष्ट
मन ज़िन्दा कैसे रखते हैं
वो साथ खड़े सूखे पेड़ों से
सावन की बातें करते हैं
कहते हैं माटी ने हमको
शीश उठाना सिखलाया
सूरज की किरणों ने हमको
कुन्दन जैसा दमकाया
बेमौसम की ऑंधी ने
गिर गिर कर उठना सिखलाया
ऑंसू कहाॅं लुटाने हैं
रिमझिम बरखा ने बतलाया
धीरे-धीरे शाखों से भी
कितनी शाखें फूट गईं
गात गात फिर शाख शाख की
पात पात से झूम गई
पातों के कोमल गातों को
सौर किरण ने सहलाया
चंदा की शीतल किरणों ने
जी भर हमको नहलाया
छोटे से बस पौधे थे हम
संग फले संग संग फूले
कोमल फूलों की खुशबू के
मस्त हिंडोले में झूले
कैसे कुदरत ने हमको
बिन माॅंगे ही वरदान दिया
अनगिन फल झोली में डाले
कैसा ये उपकार किया
यही तपस्या तो थी अपनी
यही हमारा था अरमान
हर शाख पे अपनी पत्ते हों
फल फूलों से हो लदी डाल
पत्ते बेशक छोड़ चले हैं
फल दुनिया ने भोग लिए हैं
हैं वसंत का अब भी संबल
इसी आस में रमे हुए हैं
हमको रीता जान
तरस खाने की भूल नहीं करना
हम बस पर्णहीन ही हैं
मृत जान के तर्पण मत करना
हमने अपना सब बाॅंट दिया
पर नहीं खजाना है खाली
जड़ें सुरक्षित हैं अपनी
है संग संग इक इक डाली
