Anandam: Two Poems

रंग बिरंगी होली : सब रंग में ईश्वर एक, मानवता एक

 

होली के अनेक रंगों में
ईश्वर का एक ही रंग है समाया
भिन्न-भिन्न देशों के मेल से
एक मानव वसुधैव समाज बनाया

रंग अनेक, रूप अनेक
पर सत्य तो बस है एक
ईश्वर एक, मानव एक
यही है होली का संदेश

छोड़ मानव-मानव का भेद,
राग-द्वेष का त्याग अर्पण
भारत बने फिर से जगदगुरु
कर तन-मन-धन का समर्पण

भौतिक मानसिक आध्यात्मिक
त्रिस्तरीय विकास का हो उदय
फिर से खड़ा हो भारतवर्ष
विश्व को बनाए नूतन निर्भय

मानव मानव एक है
मानव का जाति-धर्म एक है
वसुधैव कुटुंबकम का हो स्थापन
ऋषि-मुनियों का यही है वचन

शिव-शक्ति ब्रह्म का भाव
नव्य मानवतावादी विचार
मन में रहे सदा राधा-भाव
भारतवासी बने उदार

त्यागें धन-संपत्ति का मोह
नाम-यश का अभिमान
याद करें क्रांतिकारियों को
जिन्होंने दिया बलिदान महान

धर्म, मानवता के रक्षक वे
जिनका रक्त बना पहचान
उनके सपनों का भारत हो
आत्मनिर्भर, शक्तिमान

आधुनिक विज्ञान से श्रेष्ठ
वेद-ब्रह्म विज्ञान का ज्ञान
गुरुकुल संस्कृति पुनः जगे
योग, आयुर्वेद बने अभियान

संस्कृत, वेद, उपनिषद
वैदिक गणित का हो प्रचार
प्राकृतिक गौ कृषि, ग्रामोद्योग,
गांव-गांव में हो नव-संचार।

घर-घर गुरुकुल गांव-गांव गुरुकुल द्वारा
अंग्रेजियत की मानसिक गुलामी का हो क्षय
भारतवासी बनें आत्मनिर्भर अभय

संगच्छध्वं संवदध्वं,
संग वो मनानसि जानताम की,
वैदिक शक्ति का आधार
बने कृषक, उत्पादक, उपभोक्ता
त्रिस्तरीय सहकार

कच्चा माल हो जहां
उद्योग लगे वहां
कच्चे उत्पाद का निर्यात रुके
पके सामान का आयात थमे
गांव-गांव स्वावलंबी बने
जहाँ आत्मगौरव जगे

विदेशी-देशी पूंजी निवेश हो समाप्त,
विकेंद्रित अर्थव्यवस्था में,
आर्थिक लोकतंत्र हो प्राप्त

संघे शक्ति सहकारिता,
यही विकास का मूलाधार,
वसुधैव कुटुंबकम की धारा में,
वैश्विक लोकतंत्र हो साकार।

भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा,चिकित्सा
सबको अधिकार,
मानव जीवन की न्यूनतम जरूरत
पूरी हों हर बार

ऐसा विश्वगुरु भारत
बने शांति का आधार
फिर कोई तानाशाही शक्ति
न कर सके
शांतिप्रिय देश पर दमनाचार प्रहार

होली के रंगों की भाँति,
प्रेम-रस में सब घुल जाएँ,
ईश्वर के एक ही रंग में,
सब भिन्नता भूल जाएँ।

देश-देश का हो संगम,
मानवता बने पहचान,
एक भागवत धर्म स्थापित हो,
मानव-मानव समान।

होली का यही संदेश है,
होली का यही उद्गार,
एक रंग, एक मानवता,
एक विश्व—प्रेम अपार।

अंतरंग आनंद योगी

4 मार्च, 2026


दिवस दधीचि सदा त्याग का
दिया प्रेरणा नित्य विराग का

दिवस दधीचि सदा त्याग का
दिया प्रेरणा नित्य विराग का

पंचरत्न प्रिय भाई मेरे।
ब्रह्म साधना किए घनेरे।।
शौर्यवान थे साधु निराले।
सदा समर्पित गुरु मतवाले।।
भारी हृदय में गुण स्वराग का।
दिवस दधीचि सदा त्याग का।।

मार्ग सुरक्षित हुए बलिदान।
पूर्ण किए वे गुरु अरमान।।
कर्मदीप बन हरे अंधेरे।
नमन करें हम शाम सवेरे।।
तन मन मंजुल हो सुमन बाग का।
दिवस दधीचि सदा त्याग का।।

तपो भूमि पर प्राण गवाँए।
कण-कण में वे ज्ञान सजाये॥
छोड़ आदर्श गए लोक से।
घरा उद्वेलित हुई शोक से॥
सब धारे पथ ईश राग का।
दिवस दधीचि सदा त्याग का।।

ग्रहण करें हम शिक्षा उनसे।
त्यागे सब कुछ मधुरिम मन से।।
त्याग साधना, सेवा बल हो।
हृदय प्रेम शुभ नंद कल-कल हो।।
बनूँ ज्योति सब शुभ भाग का।
दिवस दधीचि सदा त्याग का।।

 

सुंदर कुमारी, समस्तीपुर