My memories -Prout explained by Shri P R Sarkar

प्रउत न्यूनतम आवश्यकता को पूरा करने की गारंटी देता है


आज सारे के सारे अर्थ दर्शन, समाज दर्शन, इतिहास दर्शन निरर्थक हो गये, मार्क्स, एडम स्मिथ, टायनबी सभी बीते दिनों की स्मृति भर रह गए हैं, वैज्ञानिकों द्वारा गाॅडपार्टिकिल्स की खोज ने पश्चिम के तत्वदर्शन की उपयोगिता समाप्त कर दी है, अबतक के सारे मजहब, सम्प्रदाय केवल रूढियों मे बंधकर रह गए हैं जो मानव जाति की परेशानियाँ ही बढा रहा है, एक नये विश्व दर्शन ने दस्तक दे दी है, मानव जाति की नयी उम्मीदें दहलीज पर बैठी आपकी प्रतीक्षा कर रही है, कोई चाहे या न चाहे जबर्दस्त ढंग से वह नयी उम्मीदों के साथ प्रवेश करेगा ही, आप स्वागत पूर्वक उसे आने का मार्ग दे देते हैं तो आपका जीवन धन्य हो जायगा, यदि अवरोध पैदा करेंगे तो प्रलय के साथ वह आयगा ही, पुरातन का कुछ भी शेष नहीं रह जायगा, नव्य मानव के चरम उत्कर्ष का समय आ गया है, जो कल उपयोगी था आज उसकी उपयोगिता समाप्त हो गई है, एक्सपायरी डेट की दवा काम नहीं करती है, वह जहर हो जाती है, सम्पन्नता में आज सडांध पैदा हो गई है, मुंबई की सम्पन्नता के गंदे नाले, गटर, को रोज आजकल आप टी, भी, पर देख रहे हैं, सैकडों युवक और युवतियाँ उस गंदे नाले में नहाने के लिए दौड रहे हैं, क्या समाज आज उसी अधोगति की ओर उसी आदिम अवस्था की ओर लौटने तो नहीं लगा है, जहाँ न समाज था, न संबंध थे, न कोई नीतिशास्त्र, न कोई शासन, स्वेच्छाचार, मुक्त यौनाचार,?

आज हजारों हजार साल की प्रगति का यही नमूना है? लेकिन मनुष्यता अभी शेष है, आपने देखा होगा जब अपनी सुरक्षा के लिए सीरिया से भागते एक छोटे से शिशु का शव समंदर के तट पर मिला था तो पूरी दुनिया की संवेदना दहल उठी थी, मेरा आग्रह है इस शेष बची संवेदना को संभालिये, नव्य मानवता का सूरज उगने वाला है, अंधेरा दूर होगा, सन 1966 की बात है, बाबा अवंतिका मे विराज रहे थे, पूणियॉ में डी, एम, सी, था, मै बाबा के चरण दबा रहा था, प्रउत की थोडी बहुत चर्चा शुरू ही हुई थी, उस समय मै युवा था, थोडा अल्हड़, बुद्धि प्रौढ नहीं हुई थी तो बाबा से बेखौफ प्रश्न पूछा करता था, बाबा भी बडे वात्सल्य पूर्वक उत्तर देते थे, प्रउत में सम्पत्ति के संग्रह को लेकर प्रथम मूल नीति में ही कहा गया है, तो सुविधा में पले बढे होने के कारण मेंरे मन में अज्ञात रूप से थोडा भय था l

मै बाबा से पूछ बैठा, बाबा तब तो बडा गडबड हो जायगा, मुझे मेरी अपनी चिंता थी कि पता नहीं सुविधा कहीं छिन न जाय, बाबा ने बडे वात्सल्य पूर्वक मुझे समझाया कि प्रउत ने तो न्यूनतम आवश्यकता ओं की पूर्ति का वादा किया है फिर संग्रह की आवश्यकता ही कहां है, इसमें क्यों व्यर्थ की उर्जा को नष्ट करना, उस उर्जा को वृहत्तर मानसिक विकास में लगावोगे, प्रउत ने तो न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति का वादा अधिकतम सुविधाओं के साथ देने की गारंटी दी है, मैने उसी दिन बाबा से यह भी पूछा था कि बाबा आप चाय पीयेंगे, इसपर बाबा बोले, अब मै चाय नहीं पीता, पहले थोडा बहुत पीता था, बाबा फिर बोले, जानते हो, मैने चाय कम्पनी के एक विज्ञापन में प्राईज भी जीता था, अब तो बहुत बातें भूल भी गया हूँ, कैसे थे वे दिन!,,,, आगे