– श्री पी. आर. सरकार
अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित
पुरातत्त्व के अनुसार इस पृथ्वी पर एक के बाद एक बहुत युग आए और गए। अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों में भी उसी प्रकार अनेक युगों का आना-जाना हुआ है — जैसे क्रेटासियस, पैलियोसिन, यूसीन, मायोसीन, प्लायोसीन, प्लेष्टोसीन (या हलोसीन) इत्यादि। वर्तमान में पृथ्वी पर चल रहा है प्लेष्टोसीन का युग। हर युग का अपना वैशिष्टय है, उनके अपने-अपने विशेष प्रकार के जीव–जन्तु (fauna) और पेड़–पौधे (flora)। इसलिए जाने के पहले अलग-अलग युग अपने पीछे अपने वैशिष्ट्य के पदचिह्न छोड़ जाते हैं।
यह बात याद रखनी है कि विकास, भौतिक स्तर की अपेक्षा मानसिक स्तर पर ही अधिक संघटित होता है। मानसिक विकास के साथ तालमेल की रक्षा के लिए दैहिक स्तर पर भी परिवर्तन होता रहता है। संरचनागत जटिलता के प्रश्न पर भी पुरूष और नारी के शरीर के बीच विभिन्न पार्थक्य सुस्पष्ट रूप से नजर आते हैं। मनुष्य के मानस-देह के विकास के अनुसार चिन्ता और भाव जगत् में भी परिवर्तन आ जाता है। आज से एक लाख वर्ष पहले इस पृथ्वी पर मानव जाति की मानस-भूमि में एक विराट परिवर्तन आया था। यद्यपि इस पृथ्वी पर दस लाख वर्ष पहले मानव जाति का आविर्भाव हुआ था लेकिन आधुनिक मानव का उद्भव हुआ था मात्र एक लाख वर्षों से। उसके बाद भी उनके सभ्य बनने के पहले और भी बहुत लम्बा समय बीत गया है। सभ्यता के राजपथ पर मानवता की पदयात्रा मात्र 15000 वर्ष पहले शुरू हुई है। इसका अनुमान हम इस तथ्य से लगा सकते हैं कि तब से अपनी भाषा का व्यवहार मनुष्यों ने शुरू कर दिया था। वेद का प्राचीनतम भाग इसी समय सृष्ट हुआ था। वेद के प्राचीनतम भाग की भाषा और 15000 वर्ष पहले के लोगों की व्यवहृत भाषा के बीच गहरी समानता को देखकर हम इस तथ्य को जान सकते हैं। वैदिक सभ्यता दुनिया की प्राचीनतम सभ्यता है। प्रगति के चारों स्मारकों — कृषि, चक्का, पोशाक और अक्षर सहित पूर्णांग मानव सभ्यता का प्रथम सूत्रपात हुआ था 7000 वर्ष पहले। सबसे पहले जिस मनुष्य ने चित्रात्मक वर्णमाला का आविष्कार किया था वह भी है 7000 वर्ष के बाद के समय में। सर्वप्रथम दर्शन की सृष्टि मनुष्य ने की थी आज से 4000 वर्ष पहले।
दुनिया के प्रथम दार्शनिक थे महर्षि कपिल। वे हमेशा के लिए मनुष्य के लिए स्मरणीय श्रद्धास्पद बने रहेंगे।
स्थान, काल व पात्र के विवर्तन के साथ-साथ शारीरिक विवर्तन भी संघटित हुआ करता है। और इस परिवर्तन के साथ सन्तुलन बनाए रखने के लिए मानसिक परिवर्तन भी हुआ करता है। मौलिक मानवीय मूल्यबोध जहाँ युग-युग में बहुत कम ही परिवर्तित होते हैं, सामाजिक मूल्यबोध लेकिन वहाँ विशेष-विशेष समय के प्रभावशाली सामाजिक मानस तत्त्वों के साथ सामंजस्य रक्षा के लिए परिवर्त्तित हो जा सकते हैं।
चार मुख्य जातियाँ :
दुनिया में चार मुख्य जातियाँ (Race) हैं — ऑष्ट्रिक, आर्य, मंगोलीय और निग्रो। इस जाति चतुष्टय के बीच एवं अन्यान्य मानव-प्रजातियों (Sub-race) के बीच जो पार्थक्य हैं उनका निर्धारण दो पद्धतियों के प्रयोग द्वारा अनायास ही किया जा सकता है। पद्धतिद्वय में से एक है नासिका-सूचक और दूसरी है करोटी (खोपड़ी)-सूचक। करोटी सूचक पद्धति में नासिका क्षेत्र से लगायत दोनों कर्ण-कुहरों का स्पर्श करके करोटी को पूरी तरह वेष्टित करके फिर से नासिका क्षेत्र तक परिमाप की जाती है। और नासिका सूचक है किसी नासिका क्षेत्र तक परिमाप की जाती है। नासिका-सूचक में किसी नासिका की सर्व निम्न सतह से उसके नासिकाग्र तक परिमाप की एक भिन्न पद्धति है। उदाहरण स्वरूप, आर्यों के नासिका सूचक का आयतन छोटा, किन्तु उनके करोटी-सूचक का आयतन बड़ा, किन्तु करोटी-सूचक का आयतन साधारण माप का। नियो लोगों के माथे के बाल घुंघराले होते हैं क्योंकि उनके बालों की जड़ों में संचित चर्बी में अधिक मात्रा में पारद (मर्करी) जमा रहता है।
ऑष्ट्रिक लोगों की विशिष्टताएँ :
ऑष्ट्रिक जनगोष्ठी गोण्डवानालैण्ड की आदिम और अकृत्रिम अधिवासी है। वे गण्ड उपजाति के नाम से अभिहित थे। वे दीर्घकाय थे और उनके शरीर का रंग काला था। ऑष्ट्रिक जनगोष्ठी दो प्रधान उपशाखाओं में विभक्त थी। उनमें से एक शाखा का नाम है राज-गोण्डा या सरदार, दूसरी का नाम है ध्रुवा–गोण्डा या साधारण गोण्ड।
ऑष्ट्रिक शब्द का व्युत्पत्तिगत रूप है अस्त्र+ इक्न=ऑष्ट्रिक। इस शब्द का अर्थ ठहरता है जो व्यक्ति अस्त्र वहन करता है। आस्ट्रेलिया और ऑष्ट्रिकों का शरीर मध्यम आकृति का होता है, नाक तीक्ष्ण और शरीर का रंग काली मिट्टी जैसा (Mud-black skin)।
आर्यों की विशिष्टताएँ :
आर्य या काकेशीय जाति की तीन उपशाखाएँ हैं-एलपाइन, भूमध्यसागरीय और नार्डिक। इनमें से नार्डिक श्रेणी के आर्य लोग निवास करते हैं उत्तर ध्रुव के निकटवर्ती जगहों पर। उनकी देह विशालकाय होती है, गात्रवर्ण लाल आभा युक्त श्वेत, आँखे बिल्ली की आँखों की मणि की तरह धूसर रंग की (Brown colour); बालों का रंग सुनहरा। फिनलैण्ड, उत्तर-रशिया, स्वेडन, नार्वे, डेनमार्क, आइसलेण्ड इत्यादि देशों में इनका निवास है। एल्पाइन गोष्ठी के आर्यों की देहाकृति मध्यम प्रकार की, बाल और आँखों का रंग नीला और गात्रवर्ण दूध की तरह सफेद। इन एल्पाइन गोष्ठी वालों का निवास फ्रान्स, जर्मनी, पश्चिम यूरोप और एशिया के कुछ भागों में है। भूमध्यसागरीय आर्य जनगोष्ठी के बालों का रंग काला, आँखों की पुतली भी काली। वे निवास करते हैं काकेशीय अंचल के दक्षिणांश में, स्पेन, पुर्तगाल और इटली आदि देशों में। भारत के कशमीरी लोग भूमध्यसागरीय जनगोष्ठी के अन्तर्गत हैं।
मंगोलियनों की विशिष्टताएँ :
मंगोलीय जनगोष्ठी में हैं मुख्यतः पाँच उपशाखाएँ — निप्पोनीज (जापानी), चीना, मलयी, इन्दो-बर्मी और इन्दो-तिब्बती। निप्पोनी लोगों के मुख का आकार बड़ा किन्तु नाक चिपटी, शरीर बड़े किस्म का। चाइनिज़ लोगों की नाक का आकार चिपटा, आँख की पुतली भेंड़ी (Slanting eye), लेकिन शरीर का आकार पेशीबहुल। अन्यान्य मंगोलीय गोष्ठी की शाखाओं की तरह इनका भी गात्रवर्ण हरिद्रवर्ण का हुआ करता है। हाँ, शरीर में रोएँ बहुत कम होते हैं। मालय शाखा के लोगों का निवास मलेशिया, इन्डोनेशिया और फिलिपाइन इत्यादि देश समूहों में है। देह शीर्णकाय, आकार छोटा और नाक चिपटी। फिलिपिन प्रजाति के चेहरे का आकार छोटा होता है। इस प्रसंग में एक बात बता देता हूँ- थाई, इन्डोनेशीय और मलय भाषा की उत्पत्ति हुई है संस्कृत भाषा से।
इन्डो-बर्मी शाखा के लोग तुलनात्मक विचार से चेहरे से बड़े, नाक चिपटी होती है। आवास स्थल है त्रिपुरा, मणिपुर, मिथेइ, मिजोरम, बर्मा और थाईलैण्ड प्रभृति देशों के सुविस्तृत अंचल में। इन्डो-तिब्बतीय शाखा के लोगों का निवास तिब्बत, लद्दाख, किन्नर, नेपाल और उत्तर बंगाल में है। बोरो, थारू, गुरुंग, नेवारी, शेरपा, भूटिया, लेपचा, खासिया इत्यादि उपजातियाँ इन्दो-तिब्बतीय गोष्ठी के अन्तर्गत हैं। इनकी देहाकृति आर्यों जैसी है। नाक की बनावट चिपटी है, देखने में सुन्दर होते हैं। इनकी भाषा कभी संस्कृत भाषा के मिश्रण से बनी थी। बातें करते समय इनमें नासिका ध्वनि की प्रधानता रहती है। लिपि का नाम हैं टेंगड़ी। इन्दो-तिब्बतीय ध्वनि विज्ञान में ‘र’ ध्वनि का व्यवहार कदाचित होता है। इस शाखा के पुरुषों के चेहरे पर हल्की दाढ़ी-मुछें हुआ करती हैं। इन्डो-तिब्बतीय शाखा की महिलाएँ अधिक परिश्रमी, लम्बे समय तक लगातार परिश्रम कर सकती हैं। इस तरह लगातार बिना थके वे परिश्रम इस कारण कर सकती हैं, क्योंकि देह की लिम्फैटिक ग्रन्थियाँ (Lymphatic gland) अधिक मात्रा में सक्रिय होती हैं। इसलिए पुरुषों की तुलना में पहाड़ी रास्तों से चढ़ने-उतरने के काम में शारीरिक सामर्थ्य उनमें अधिक होती है।
निग्रो लोगों की विशिष्टताएँ :
निग्रो जाति में हैं तीन शाखाएँ। सामान्यतः उनकी शारीरिक उँचाई साढ़े पाँच से छः फुट तक होती है। जुलु उपजाति वालों की औसत उँचाई छः फूट या उससे भी अधिक है। लेकिन पिगमियों की उँचाई पाँच फुट से भी कम होती है। इन पिगमी और जुलु उपजातियों की रक्षा की समुचित व्यवस्था आवश्यक हो गयी है।
विमिश्र जातियाँ:
दुनियाँ की विभिन्न जातियों और प्रजातियों (Sub-races) के बीच आज रक्त का मिश्रण काफी मात्रा में हुआ है। जिस प्रकार बंगाली जनगोष्ठी के रक्त में मिल गया है ऑष्ट्रिक, मंगोलीय और निग्रो रक्त। द्रविड़ों के देह में प्रवाहित हो रही है ऑष्ट्रिक और निग्रो शोणितधारा। बंगालियों में जिनके शरीर का रंग गोरा है उनके देह में है आर्यरक्त। हम लोगों के राढ़ अंचल में मंगोलीय रक्त का मिश्रण कम हुआ है। यद्यपि आज जिस जनगोष्ठी को हम लोग बंगाली के रूप में जानते और मानते हैं उनके शरीर में बह रही है ऑष्ट्रिक, मंगोलीय और निग्रो लोगों की मिश्रित शोणितधारा, लेकिन बंगाल के भूखण्ड के जितना दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ते जायेंगे उतना ही बंगाली जनगोष्ठी के बीच मंगोलीय रक्त का प्रभाव कम होता जाएगा। और बंगाल के उत्तर-पूरब कोने की ओर आगे बढ़ने पर पायेंगे कि मंगोलीय रक्त का प्रभाव बढ़ रहा है। मिथिला के लोग ऑष्ट्रिक, निग्रो और मंगोलीय लोगों के मिश्रण से बने हैं, लेकिन उनमें से जो दीर्घकाय हैं उन पर मंगोलीय प्रभाव अधिक है। बंगाल से जितना पूरब की ओर बढ़ोगे उतना ही देखोगे कि बंगालियों की शारीरिक उँचाई कम हो रही है। लेकिन पश्चिम की ओर यदि जाओ तो देखोगे कि शारीरिक उँचाई बढ़ रही है, लोग दीर्घदेही होते हैं। आरामबाग, किसानगंज और अंग के मध्यवर्ती अंचल से होकर यदि एक काल्पनिक सीमारेखा खींची जाय तो देखोगे कि इस अंचल के लोग तुलनात्मक रूप से दीर्घकाय हैं। सोन नदी के उस पार निवास करने वाले लोगों का देह बड़ा होता है। उस अंचल के जन्तु-जानवरों के शरीर भी दीर्घ होते हैं। भोजपुर के लोगों के दीर्घ देह की तुलना में गया और औरंगावाद अंचल में रहने वाले लोग कुछ खर्वकाय होते है। इस अंचल के जन्तु-जानवरों के शरीर की आकृति भी छोटी-छोटी होती है। स्थानीय ‘जेबू’ जातीय प्राणी यहाँ ‘पाटनी गाय’ (एक प्रकार के गोरू) के नाम से परिचित हैं। ये पाटनी गायें भारत के अन्यान्य अंचलों के ‘जेबुओं’ की अपेक्षा दीर्घकाय हैं, लेकिन पश्चिमी देश के गोरूओं की तुलना में आकार में छोटी हैं।
दक्षिण भारत में और एक मिश्र जाति है, उस अंचल के ब्राह्मणों का गात्रवर्ण गोरा है। उसका कारण यह है कि वे उस अंचल में आए थे उत्तर भारत से। मद्रास के लोगों में जिनका गात्रवर्ण काला है उनका उद्भव हुआ है ऑष्ट्रिक और निग्रो लोगों के मिश्रण से। दक्षिण भारत के ब्राह्मणों के दो भाग हैं — अय्यर और आयंगर। अय्यर ब्राह्मण लोग शैव हैं, और आयंगर ब्राह्मण लोग वैष्णव हैं।
भारत में तृतीय विमिश्र जनगोष्ठी का उदाहरण है हिमाचल प्रदेश के सिरमौर अंचल में निवास करने वाले लोग। इनके रक्त में मिला हुआ है ऑष्ट्रिक जाति का शोणित स्रोत और भूमध्यसागरीय आर्य शाखा की रक्तधारा, गात्रवर्ण है काला। एक समय इस सिरमौर का भौगोलिक आयतन फैला हुआ था कुमायूँ अंचल से शिमला तक। औरंगजेब के राजत्वकाल में राजस्थान के राजपूतों ने इस अंचल में अनुप्रवेश किया था।
किन्नर अंचल के लोगों का गात्रवर्ण पीला या बादामी है। नाक चिपटी जैसी। लेकिन देखने में स्वर्ग की अप्सराओं की तरह सुन्दर। किम+नरः = किन्नर। किम् ‘नर’? अर्थात् ये मनुष्य हैं या अप्सरा? चूँकि देखने में बहुत सुन्दर होते हैं, इसीलिए उस अंचल का नाम रखा गया था किन्नर। उसी प्रकार तिब्बत देश को प्रचीनकाल में कहा जाता था किम् पुरुष वर्ष। उस देश के पुरुषों के चेहरे पर शायद ही दाढ़ी-मूछें दिखायी पड़ती थी। महिलाएँ ढीली-ढाली पोशाक व्यवहार करती थीं। फलस्वरूप उस देश के लोगों में कौन पुरुष है और कौन महिला उसमें अन्तर निर्धारित करना मुश्किल हो जाता था। उस देश को इसीलिए कहा जाता था किम्-पुरुष-वर्ष।
भारत में निवास करने वाले लोगों में भूमध्यसागरीय आर्यों की दो गोष्ठियाँ हैं। एक है सीथिओ भूमध्यसागरीय शाखान्तर्गत लोग (Cytheo Mediterranean)। ये आज हमारे लिए गुजराती के नाम से परिचित हैं। तुम लोग ध्यान देने पर देखोगे कि गुजरातियों के चेहरे का स्वरूप त्रिभुजाकार है। अन्य आर्य शाखा का नाम है प्राक्सम-सीथिओ भूमध्यसागरीय (Pro-Cytheo-Mediterranean) जनगोष्ठी, आज ये लोग भारत में ‘मराठी’ के नाम से सुपरिचित हैं। इनकी वंशगत उद्भूति हुई थी शक् हूण, कुशाण और युची प्रभृति उपजातियों के रक्त के मिश्रण से।
सेमिटिक प्रजाति:
सेमिटिक गोष्ठी के लोग एक महत्त्वपूर्ण मिश्र प्रजाति के लोग हैं। इनकी शोणितधारा में मिला हुआ है अल्पाईन श्रेणी का आर्य-रक्त, भूमध्य सागरीय आर्य-रक्त, निग्रो और मध्यांचल का मंगोल रक्त। आज से 15000 वर्ष पहले इनमें इस रक्त का मिश्रण हुआ था। इसी मिश्रित जनगोष्ठी को आज सेमिटिक कहा जाता है। सेमिटिक प्रजाति के लोगों में कुछ विशेष चारित्रिक विशिष्टताएँ हैं — जैसे बौद्धिक प्रवणता, और किसी काम को शुरू करने पर उसे सुचारू रूप से सम्पन्न करने का तीव्र मानसिक संकल्प और धैर्य। इनकी आदि वासभूमि थी पारस्य छोडकर पश्चिम एशिया का मध्य और दक्षिण अंचल जो आज मध्य प्राच्य के नाम से परिचित है।
सेमिटिक जनगोष्ठी की मूलभाषा हिब्रू आज से 1500 वर्ष पहले उत्तर और दक्षिण की दो भाषाओं में विभक्त हो गयी थी। परिवर्तित दक्षिणी भाषा का नाम पड़ा अरबी और उत्तरी भाषा का नाम पड़ा हिब्रू। उत्तरांश के सेमिटिकों के शरीर का रंग कुछ गोरा होने पर भी भूमध्यसागरीय आर्यों की तुलना में कम गोरा है। लेकिन दक्षिणांश के लेभिटिक लोगों के शरीर का रंग कालिमा लिए धूसर है (Darkish Brown)। प्राचीन हिब्रू भाषा और अरबी लिखी जाती हैं दाहिनी ओर से बायीं ओर। दोनों भाषाओं के बीच निकट सम्बन्ध है। निम्नलिखित शब्दों की तुलना करने पर वह सम्बन्ध और भी अच्छी तरह पकड़ में आएगा-
प्राचीन हिब्रू आरबी
जोसेफ याकूब
सोलोमन सुलेमन
अदम आदम
जेसस ईशा
सॉक्रेटिश सुकरात
मेरी मिरियान
अलफा अलिफ
अलेक जेनिद्रया सिकन्द्रिय
पैलेस्टाइन फिलिस्तीन
हिंदू और अरबी भाषा-भाषी दोनों गोष्ठियों के बीच ‘सुन्नत’ की प्रथा प्रचलित है। बगैर जाति-वर्ण-धर्म भेद के प्राचीनकाल से सेमिटिक प्रजाति के अन्तर्गत सभी लोगों के बीच यह प्रथा चली आ रही है। इन दोनों भाषागोष्ठियों के लोगों की नगर निर्माण पद्धति ऐसी थी कि शहर की मुख्य सड़कों के साथ जुड़ी हुई असंख्य पतली गली-कूचों का पथ–जाल फैला रहता था। सामाजिक आचार-आचरण की ओर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि लोग रेस्तराँ या होटलों में खाना अधिक पसन्द करते थे। इस्लाम्, यहूदी और ख्रीश्च्यिन धर्ममत सेमिटिक प्रजाति के लोगों का ही उपधर्म है। पूजा-प्रार्थना के लिए निर्धारित दिन हैं क्रमशः शुक्रवार, शनिवार और रविवार। संस्कृत भाषा में सेमिटिक को कहते हैं समिति।
भाषा :
तिब्बती, लद्दाखी, किन्नरी और पहाड़ी-पंजाबी भाषाओं में क्रियापद के व्यवहार की अपेक्षा क्रिया विशेषण या जिरण्ड का ही व्यवहार अधिक है। उदाहरण दे रहा हूँ तुम लोगों को। मान लो, कहा जा रहा है Ram is going. या राम जा रहा है। लेकिन इन्दो-तिब्बती गोष्ठी की उन भाषाओं में उसकी अभिव्यक्ति का रूप होगा- ‘Ram is in a moving stage’ : राम चलायमान अवस्था में है। संस्कृत भाषा और इन्दो-तिब्बती जनगोष्ठी की भाषा में अनुस्वार ध्वनि की प्रवणता है। बंगला वर्ण और तद्भव वर्ण प्रायः एक ही तरह के हैं। बंगला भाषा के ऊपर भी इन्दो-तिब्बती भाषा का काफी प्रभाव है।
‘खश’ शब्द का अर्थ है दमन करना। जो दूसरों को कष्ट देते हैं या दमन करते हैं उन्हें खश कहा जाता है। खश राजपूत लोगों ने एक समय स्थानीय लोगों का काफी दमन किया और कष्ट दिया। इसलिए इन भाषाओं में बहिरागत लोगों को ‘दिक्कू’ कहा जाता है। ‘खश्’+मेरु = खश्मीर या कश्मीर। कश्मीर देश से बढ़ई लोग एक समय हिमाचल प्रदेश गए थे। इसीलिए उन्हें कहा जाता है कशमेरु।
‘आर्य’ शब्द की व्युत्पति हुई है ‘ऋ’-धातु के साथ ‘यत्’-प्रत्यय जोड़कर। ‘ऋ’ धातु का अर्थ है तेजी से आगे बढ़ना।
सामाजिक रीति :
शिव ने इन्दो-तिब्बतीय जनगोष्ठी में जन्म लिया था। उनकी तीन पत्नियाँ थीं — पार्वती, गंगा और काली। पार्वती आर्य कन्या थीं। उनके शरीर का रंग था गोरा। गंगा थीं मंगोल कन्या। उनका गात्रवर्ण था पीतवर्ण, और काली का जन्म हुआ था निग्रो गोष्ठी में। शिव यातायात करते थे याक या चमरी गोरू की पीठ पर बैठकर।
आज भी लद्दाख, तिब्बत और किन्नर अंचलों में विवाहिता नारियों के एकाधिक पति होते है (Polyandry)। द्रुपद राज्य तिब्बत या किन्नर अंचल में अवस्थित था। पंचपाण्डवों की पत्नी द्रोपदी भी इसी द्रुपद राज्य की कन्या थीं।
इन अंचलों की समाज व्यवस्था में नारियों की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बंगाल की समाज व्यवस्था मातृतांत्रिक पद्धति को आंशिक रूप से मानकर चलती है। इस व्यवस्था में नारियाँ यथायोग्य महत्व प्राप्त किया करती हैं।
आनन्दनगर :
दूर अतीत में, नौ से दस लाख वर्ष पहले आनन्दनगर के निकटवर्ती डिमडीहा पहाड़ की चोटी एक आग्नेय विस्फोट (ज्वालामुखी विस्फोट) के फलस्वरूप उत्क्षिप्त हो गयी थी। इस ज्वालामुखी विस्फोट के फलस्वरूप पहाड़ का मलवा डिमडीहा के अगल-बगल लगभग दो मील व्यासार्द्धयुक्त इलाके में फैल गया था। अचानक इस प्रकार की अग्नि वर्षा के फलस्वरूप उस दिन उस इलाके के सभी अभागे पशु और मनुष्य मृत्यु के मुँह में पतित हुए थे। उस अंचल के तापक्रम में अचानक अस्वाभाविक परिवर्तन आ जाने के कारण सारे के सारे प्राणी काल के गाल में समा गए और परवर्तीकाल में उनके शव जीवाश्म में परिणत हो गए। उस सुदूर अतीत के अशिक्षित लोगों ने सोचा था कि उस दिन उस आकस्मिक अग्निवर्षा के पीछे देवी चण्डी का हाथ है। अग्नि उद्गीरण के मुखगव्हर को कहा जाता है ज्वालामुखी।
इस दुनिया में सबसे पहले साधना का अभ्यास शुरू किया था भूमध्यसागरीय काकेशीयन गोष्ठी के और इन्दो-तिब्बती गोष्ठी के लोगों ने। उसके परवर्तीकाल में साधना सीखी मंगोल जनगोष्ठी के लोगों ने और एल्पाइन श्रेणी के आर्यों ने। उनसे भी बाद में साधना सीखी नार्डिक, काकेशीय और ऑष्ट्रिक लोगों ने। निग्रो जनसाधारण के बीच आनन्दमार्ग ने ही पहली बार साधना सिखाना शुरु किया है। ऋग्वेदीय उपासना पद्धति शुरु की थी आर्यों ने, लेकिन आध्यात्मिक साधना सर्वप्रथम शुरू हुई थी इसी भारत भूखण्ड से।
मानव समाज की सभी जातियों व उपजातियों के अन्दर विचित्रताओं के बीच एकता की भावमूर्ति हुए परमपुरुष। वे महाविश्व की समग्र सत्ता के शीर्षेन्दु हैं। परमपुरुष ही हैं चरम और परम सत्ता। इस विश्वब्रह्माण्ड में और जितनी सत्ताएँ हैं, वे सभी सगुणाश्रित हैं, एकमात्र परमपुरुष ही हैं निर्गुण सत्ता। वे ही सभी के पिता हैं और सभी पिताओं के परम और चरम पिता हैं।
28 दिसम्बर, 1987, आनन्दनगर
स्त्रोत: उत्तर-पूर्व भारतीय सभ्यता का इतिहास – श्री प्रभात रंजन सरकार
