प्रभात संगीत नंबर-1972
तुमि गान गाओ काहार तरे
बधिर करे रेखे धरारे
तुमि आस आर याओ हास आर चाओ केउ ना देखिते पाय तोमारे
तोमार गीतिते छंदायित धरा
सुर लय से ये प्रभा मधुमक्खी
तुमि आछ काछे प्रीति संगे आछे
तबु तोमाते मिशिते नाहि पारे
तोमार आसा याओया भालबासा
तोमार हासा चाओया चिति प्रशासन
तुमि बिश्वास तुमि ह्रास तामस
हृदय धरे अणु परमाणु
भावार्थ-
हे अरूप,तुम अपना गान क्यों गाते रहते हो?अपने गीतोंआ से तुमने पूरी दुनिया को बहरा कर दिया है।
असीम प्यार के साथ तुम हंसते हुए आते हो और् चले जाते हो।तुम्हारा आना और जाना दोनो अनुपम प्यार से भरा रहता है।फिर भी तुमको कोई देख नहीं पाता। यह कैसी लीला है तुम्हारी? निकटता का एहसास तो देते हो,लेकिन मधुर कोमल रोमांचकारी स्पर्श का आभास तक नहीं देते।
तुम्हारी गीतों से वसुंधरा छंदायित है।सुर लय की मधुमिश्रित तान मन को अनुपम मिठास से भर देती है।तुम पास होते हो तो प्यार की अनिर्वचनीय अनुभूति तो होती है,हृदय की धडकने तेज हो जाती है,लगता है तुझमें अपने अस्तित्व को खो दूं।किन्तु हाय,तुझमें विलीन नहीं हो पाती।हे अन्तर्यामी, मेरे भाग्य की यह कैसी विडम्बना है?
तुम्हारा आना और जाना दोनो ही प्यार से भरा रहता है।तुम्हारी मधुर हंसी और प्यार मर्म को छू लेती है।
हे भूमामानस की परम चेतना,तुम वसुंधरा को अंधकार से मुक्त करने आये हो।युगों की संकीर्णता,भावजडता,कलह और सभी प्रकार की आधिभौतिक ,आधिदैविक और आध्यात्मिक विषमता, बाधा से ग्रस्त विश्वमानव को मुक्त कर मानव अस्तित्व को आदर्शाभिमुख प्रवाह की ओर प्रवाहित करने आये हो।
इस गीत का अनुवाद और डीएमएस में पठन आदरणीय प्रद्युम्न नारायण सिंह दादा जी द्वारा किया गया है।
