प्रभात संगीत नंबर-1969
तुमि एसेछिले भालोबेसे छिले
विश्वप्राणे प्राण मेघालय
के तोमार मा सबे वा नाहिं माने
से कथा भुले गिये छिलेक्षुद्र जलाशय क्षुद्रता दिये
दूर पडे थाके सीमारेखा निये
प्लाबन यबे आसे सबे याय मिशे
सीमा भेंगे महासलिलेमानुषे मानुषे ये असूया आछे
ये हीनबुद्धि तिक्तता एने छे
तादेर दृढ करे सरिये दिये दूरे
एक समाज रचना करिले
भावार्थ–
हे प्रभु,तुम आये प्यार का मूर्तिमान स्वरूप लेकर।हे मेरे प्रेमपूर्वक,तुमने समस्त विश्व को अपने प्यार से ओतप्रोत कर दिया।मनुष्य क्या,सारे जीवजगत ही तुम्हारे प्यार के आकर्षण से इतने मुग्ध हो गए कि तरूलतायें तुम्हारा आलिंगन करने के लिए मचल गईं।महर्लिका में अस्वस्थ वृक्ष के पत्र पल्लवित तक आनंद से थिरकते लगे थे।अमेरिका में तुम्हारा वह निर्जीव वाहन तक तुम्हारा प्यार पाकर चंचल हो गया था।हिंसक पशुओं की आंखों से प्रेमालाप बरस रही थी तुम्हारा सान्निध्य पाकर।तुमने कभी भेद ही नहीं किया कि किसने तुम्हें माना और किसने तुम्हें नहीं माना।हे परमपिता,सभी तो तुम्हारी हीं किया संतति हैं।जिसने तुम्हें स्वीकार किया वह भी तुम्हारी संतान,जिसने अपनी अज्ञानता और मूढ़ता के कारण तुमको स्वीकार नही किया वह भी तुम्हारी संतान।तुम मिला दिया। बुंद्धिमान और अज्ञानी संतानों के बीच भेद कैसे कर सकते हो।अपने प्राण को विश्वप्राण से जोड दिया।मानवात्मा को विश्वात्मा में मिला दिया।
छोटे छोटे जलाशयों की रचना कर तुम स्वयं उससे ओझल हो गए और जब बाढ आई तो तो छोटे छोटे जलाशयों की सीमारेखा उसमें विलीन हो गई और सभी महासागर हो गए। तुमने हम जैसे क्षुद्र जीवों में आनंदतत्व का जल तो भर दिया,लेकिन “मैं” की क्षुद्र सीमारेखा से घेर दिया।आनंद सिर्फ क्षुद्र “मैं” के लिए रह गया।आत्मसुखतत्व की स्वाहा के कारण सम समाज तत्व पूरी तरह उपेक्षित रह गया।मनुष्य मनुष्य के बीच द्वेष पैदा हो गया। हीनबुद्धि से पैदा हुई इस दुर्भावना ने सम समाज तत्व आधारित समाज व्यवस्था बनने ही नहीं दिया।हे प्रेमपूर्वक,अपने कठोर हाथों से मनुष्यों की हीनबुद्धि चूर चूर कर एक विश्व मानव समाज की रचना कर दो।
Translated and Read (DMS) by Pradyumn Dadaji
