Humanism to Neo-Humanism (Hindi)

मानवतावाद से नव्यमानवतावाद तक

विनीता आनंद

मानवता मनुष्य का सार तत्व हैl 

विकाश क्रम में जिस स्तर पर जीव में मन की प्रधानता हो जाती है, उसी मन प्रधान जीव को मनुष्य या मानव कहते है। मन के विकास के साथ ही साथ मनुष्य में बहुत सी विशेषताओं, बहुत से गुणों का उद्भव होता है, जैसे- विवेक, सृजनशीलता, परहित चिन्तन, करूणा, सेवा, संकल्प, नैतिकता, इत्यादि। मनुष्य में पाये जाने वाले इन्हीं गुणों एवं विशेषताओं के गत्यात्मक संगठन को मानवता कहते है। इन गुणों एवं विशेषताओं की अभिव्यक्ति मनुष्य के चिन्तन एवं व्यवहारमें होती है। इन्हीं की सहायता से मनुष्य अपने अस्तित्व एवं सह-अस्तित्व को बेहतर बनाता है। इन गुणों एवं विशेषताओं के संरक्षण, संवर्द्धन हेतु तथा मानव अस्तित्व को सुखद, सुन्दर एवं प्रगतिशील बनाने के उद्देश्य से किये गए चिन्तन, प्रयास एवं वैचारिक संरचना को मानवतावाद कहते हैंl

   मानवतावाद वह चिंतन प्रवाह है जो मानवता के परिष्कार, संवर्धन, मानव हित तथा उसकी संतुष्टि को प्रमुखता देता हैl जिस दर्शन एवं विज्ञान में मानव-हित निहित होता है वही लोकप्रिय और सम्मानित होता हैl

मानव-हित एवं प्रगति के लिए किये जाने वाले सभी चिन्तन तथा प्रयास मानवतावादी हैं, इस दृष्टि से वृहद् अर्थ में अतीत में मानव समाज को सुव्यवस्थित, सुसंगठित करने के उद्देश्य  से विधि-विधान, नीति निर्धारण, तथा की गयी अन्य प्रचेष्टायें मानवतावादी हैं। यह बात भी सत्य है कि विधि-विधान के नाम पर लोगों को प्रताड़ित किया गया, लोग सताए गए, उनका दमन किया गया। समय-समय पर विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में प्रखर मनीषा वाले ऐसे लोग भी आये जिन्होंने विधि-विधान की कुटिलताओं, सामाजिक विकृतियों को समझा इनका विरोध किया और मानवता को इनसे मुक्त करने के लिए नयी सोच पैदा की, उनके चिन्तन उनके कार्य, सभी मानवतावादी थे।

मानवतावाद का वर्तमान आन्दोलनात्मक स्वरूप पुनर्जागरण काल में यूरोपीय देशों में अस्तित्व में आया, जबकि लोग प्राचीन ग्रीस और रोम के दार्शनिकों कि कृतियों में रुचि पैदा कर स्वतन्त्र एवं विवेकपूर्ण चिन्तन को प्रोत्साहित करने के लिए प्रयत्नशील थे। चूँकि मानव मनीषा विकास पर अवरोधात्मक प्रभाव डालने वाले भाव जड़ताओं (डागमाज), पारलौकिकवाद का विरोध तथा स्वतन्त्र एवं विवेकपूर्ण चिन्तन, मानव योग्यताओं में विश्वास, मानव सम्मान एवं सन्तुष्टि आदि तत्त्वों को लेकर मानवतावाद के वर्तमान  आन्दोलनात्मक स्वरूप  का निर्धारण हुआ है, अतः मानवतावाद की कड़ी अतीत में विश्व में जहाँ कहीं भी मानव-हित में इस तरह के प्रयास हुए हैं उनसे जुड़ी हुई हैं।

वर्तमान मानवतावादी विचारधारा का सूत्र ५०० वर्ष ई० पू० महात्मा बुद्ध के चिन्तन में मिलता है। महात्मा बुद्ध ने मानव समाज को शोषण मुक्त करने के लिए “बुद्धिवाद पर मनुष्य की आस्था जमाने का प्रयास कियाl

यूनानी दार्शनिक सुकरात भी रूढ़ियों पर प्रहार करते थे।

यूनानी दार्शनिक प्लेटो (४२७-३४७ ई० पू०) बुद्धिवादी थे। प्लेटो के विचार में ज्ञान (wisdom), साहस (spirit) तथा इच्छा (desire) ये तीन मनुष्य के सदाचार का गठन करने वाले प्रमुख तत्त्व हैं।

Ἀριστοτέλης (Aristotle; 384-322 BC), Greek philosopher of the Classical... | Download Scientific Diagramअरस्तु (३८४-३२२ ई० पू०)का मानना था कि जो आवश्यक और विश्वव्यापी है उसी का वैज्ञानिक ज्ञान सम्भव है। एपीकुरू (३४१-२७० ई० पू०) भौतिकवादी थे। उनका तर्क था कि यह ब्रह्माण्ड परमाणुओं से बना है और जो भी ज्ञान हमें मिलता है वह सब इन्द्रियों के माध्यम से मिलता है।  पुनर्जागरण का आरम्भ इटली के फ्लोरेंस से हुआ है। इटालियन विद्वान फ्रांसेस्को पेट्रार्क (१३०४-१३७४) को पुनर्जागरण काल का प्रथम मानवतावादी कह कर सम्मानित किया गया हैl पुनर्जागरण कालीन मानवतावादियों का चिन्तन, ईश्वरीय कृपा की अपेक्षा मनुष्य की क्षमता, उसकी उपलब्धि, उसकी प्रतिभा, उसके प्रयास, उसके सम्मान, उसकी सन्तुष्टि पर विशेष रूप से केन्द्रित था। पुनर्जागरण दैववाद के विरोध में एक विद्रोह थाlवैज्ञानिक आविष्कारों का दौर शुरू हो गया। निकोलस कापरनिकस ने यह बताते हुए की सूर्य विश्व के केन्द्र में अवस्थित है, अपना ‘हेलियोसेंट्रिक मॉडल’ प्रस्तुत किया। इटैलियन दार्शनिक और खगोलशास्त्री जिआर्डानो ब्रूनो (१५४८-१६००) ने कापरनिकस के मॉडल का समर्थन किया और उसके कार्य को आगे बढ़ाया।

ब्रूनो ने क्रिश्चियन नीतिशास्त्र की आलोचना की और विभिन्न धार्मिक विश्वासों के प्रति सहिष्णुता की बात कही, जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्रूनो को जिन्दा जला दिया गया। इटैलियन दार्शनिक, भौतिकशास्त्री एवं खगोलशास्त्री गलीलियो (१५६४-१६४२) के आविष्कारों से क्रमबद्ध विश्व (Cosmos) के बारे में मनुष्य कि समझदारी में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ। गलीलियो ने कापरनिकस के खोजों की पुष्टि की जिसके कारण उन्हें प्रताड़ित होना पड़ा।

अंग्रेज भौतिकशास्त्री एवं खगोलशास्त्री इशाक न्यूटन (१६४३-१७२७) के गुरुत्वाकर्षण एवं गति के नियमों का आविष्कार तथा क्रमबद्ध विश्व की गणित आधारित व्याख्या ने इन्लाइटेनमेंट आन्दोलन को जोरदार ढंग से प्रभावित किया। सन् १८५९ में चार्ल्स डारविन के ‘ओरिजिन ऑफ स्पीसीज’ के प्रकाशन ने वैज्ञानिकों को चकित कर दिया तथा ईसाई धर्म के जड़ को झकझोर दिया।

उपयोगिता वादी दार्शनिक जर्मी बेंथम एवं कामटे तथा जॉन स्टुअर्ट मिल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे

A Brief Biography of Karl Marxजर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स  (१८१८-१८८३) ने द्वन्दात्मक भौतिकवाद’ कि रचना की। तत्कालीन समाज व्यवस्था से क्षुब्ध मार्क्स ने अनुभव किया कि राज्य, चर्च और पूँजीवाद के मिलित शोषण से जनसाधारण, विशेष रूप से मजदूर वर्ग त्रस्त है। इन्हें शोषण मुक्त कर सम्मानपूर्ण एवं सन्तोषप्रद जीवन जीने का अधिकार दिलाने के अपने संकल्प को मूर्त रूप देने के लिए मार्क्स ने एक नयी राजनैतिक एवं आर्थिक व्यस्था की संरचना तैयार की।

जूलियन हक्सले, अलबर्ट एन्स्टीन, जान डेवी तथा थामस मैन्न,एडवर्ड हेनरी विल्सन ने मानवतावादी संदेशों के प्रचार प्रसार में अपना महत्वपूर्ण योगदान दियाl

विभिन्न प्रकार के ह्यूमैनिस्ट सोसाइटीज की स्थापना एवं मेनिफेस्टो बनाए गए जिससे मनुष्य को अधिक से अधिक सुखी बनाने के प्रयास को गति प्राप्त हो सकेl

भारत में भी मानवतावादी विचारक अपना योगदान दे रहे थेl क्रन्तिकारी विचारधारा के पोषक मानवेन्द्रनाथ रॉय (M. N. Roy) का मानना है कि मनुष्य समाज का आदर्श है, मूल्यों का निर्माता है तथा प्रत्येक वस्तु का मापदण्ड हैl

यह सारे मानवतावादी प्रयास मनुष्य को संतुष्ट एवं सुखी बनाने के लिए हो रहे थेl अधिकतम मनुष्य को अधिकतम सुख मिले इसके लिए प्रयास हो रहे थेl

भारत में भी प्रयास हुए पर महात्मा बुद्ध जैसे विशुद्ध आध्यात्मिक चिंतक के रूप में अपना योगदान दिया गया और निर्वाण को ही जीवन का लक्ष्य बताया गयाl  स्पष्ट है कि यह मानवतावादी प्रयास या तो मनुष्य के भौतिक स्तर पर हो रहे थे या फिर विशुद्ध आध्यात्मिक स्तर पर हो रहे थेl

      प्रश्न यह उठता है क्या मानवतावादी प्रयासों ने अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया?क्या मनुष्य का सर्वांगीण विकास हो पाया? क्या मनुष्य सुखी हो सका?

इसी क्रम में सन् १९५८ में महान मानवतावादी, आनन्दमार्ग के प्रवर्तक श्री श्री आनन्दमूर्ति जी ने प्रभात रंजन सरकार के नाम से ‘नव्य मानवतावाद’ दर्शन का प्रतिपादन कियाl इसके अनुसार मनुष्य एक त्रिस्तरीय प्राणी है जिसकी आवश्यकता भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक तीनों स्तर पर है और इन तीनों स्तर पर जो आवश्यकता है उसकी संतुलित आपूर्ति अति आवश्यक हैl भौतिक एवं मानसिक प्यास के साथ-साथ आध्यात्मिक प्यास भी होती है जिसकी निवृत्ति अति आवश्यक हैl

नव्य मानवतावाद’ दर्शन के अनुसार प्रत्येक संरचना का एक केन्द्र (Nucleus) होता है। संरचना केन्द्राधारित होती है। यह विश्व ब्रह्माण्ड भी एक संरचना है। इस संरचना का भी एक केन्द्र है। यह केन्द्र परम आनन्दघन चैतन्य सत्ता (Blissful Supreme Conciousness) है। प्रकृति इस केन्द्रीय चैतन्य सत्ता की शक्ति है जिसके द्वारा सृष्टि का कार्य सम्पन्न होता है। प्रकृति के कार्य करने का जो ढंग है, जो उसकी विशेषता है, उसका स्वभाव है उसे ही नेचर (Nature) कहते हैं।

मन में अभिव्यक्त चेतना उस आनन्दघन (Blissful) सत्ता का ही अंश है इसलिए मन में सुखाकांक्षा की उत्पत्ति होती है। सुखानुरक्ति जीवन की स्वाभाविक परमवृत्ति है। मन के विकास के साथ – साथ ज्यों – ज्यों चेतना की अभिव्यक्ति में वृद्धि होती जाती सुखाकांक्षा भी बढ़ने लगती है और सुखानुभूति की क्षमता में भी वृद्धि होती जाती है। विकसित चेतना के कारण मनुष्य इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाले अल्प सुख या खण्ड सुख से सन्तुष्ट होने वाला नहीं है, उसे असीम सुख, अखण्ड सुख ‘आनन्द’ चाहिए जिसकी प्राप्ति शुद्ध चेतना में प्रतिष्ठित होने से ही हो सकती है। सम्प्रदाय अलग –अलग हो सकते हैं लेकिन विश्व भर के मनुष्यों का एक ही धर्म है, वह है , अनन्त सुख  ‘आनन्द’ की प्राप्ति की इच्छा। यही धर्म का मूल तत्त्व है, मानवता का मूल धर्म है। सृष्टि विकास की प्रक्रिया तीन कारकों (Factors) घात -प्रतिघात (Clash) सममिति (Cohesion) तथा वृहद् (आनन्दघन केन्द्रीय सत्ता) का आकर्षण – की क्रियाशीलता से सम्पन्न हो रही है।

वृहत् के प्रति मन में उत्पन्न आकर्षण को ही भक्ति कहते हैं। भक्ति मन की शुद्धावस्था है जिसमे वृहद् के आकर्षण में मन आनन्द विभोर रहता है और मन के सम्पूर्ण आभाव दूर हो जाते हैं। यह कोई काल्पनिक या सुपर नेचुरल घटना नहीं है बल्कि मन के विकास का एक विशेष स्तर है जो विशेष प्रयास से अनुभव गम्य है। श्री पी. आर. सरकार का कहना है कि यह भक्ति मानव – जीवन का महान सम्पद है। भक्ति की स्थिति में, मनुष्य एवं मनुष्येतर जीवों के प्रति प्रेम से मनुष्य का हृदय परिपूर्ण हो जाता है। इस अवस्था में पहुँच कर ही मनुष्य सम्पूर्ण सन्तुष्टि (Fulfilment) का अनुभव करता है। इसलिए व्यष्टि और समष्टि जीवन में भक्ति संरक्षण अति आवश्यक है। मनुष्य की आन्तरिक मानसिक गति, उसकी आस्तित्विक तरंगे ‘मैं हूँ’ का बोध (Existential wave)  पूर्णरूपेण छन्दमय है (Rhythmic), शान्तिमय हैं। जब मन आस्तित्विक तरंग में रहता है तो वह वृहद् का आकर्षण अनुभव करता है। वृहद् के प्रति आकर्षण की अनुरक्ति ही भक्ति है।

वाह्य जगत का एक अंश आन्तरिक मानसिक छन्द के साथ अभियोजित होता रहता है लेकिन जब वाह्य जगत की भौतिक तरंगे आन्तरिक मानसिक तरंगों के साथ अभियोजित नहीं हो पाती हैं तो मनुष्य असहज और परेशान हो जाता है। यद्यपि कि मनुष्य ने काफी बौद्धिक प्रगति किया है लेकिन वाह्य जगत के साथ अभियोजन का अभाव है। आन्तरिक एवं वाह्य जगत में असन्तुलन के कारण लोग अनेकों प्रकार के मानसिक रोगों से पीड़ित हो रहे हैं। मन बहुत से कार्यों को करता है, जैसे- चिन्तन करना, स्मरण करना इत्यादि। इसके अतिरिक्त मन तीन भिन्न तरीकों से कार्य करता है। इनमें से पहला है कि मन विभेदन (Discrimination) का पथ पकड़ कर आगे बढ़ता है। यह सोचता है कि क्या करना चाहिये, क्या नहीं करना चाहिये? इस विभेदन (Discrimination) के पथ को युक्ति (Rationality) कहते हैं। जब उचित और अनुचित के बीच विभेदन करके मनुष्य उचित पथ का चयन करता है तो इसे विवेक (Conscience) कहते हैं। मन के कार्य करने की यह पद्धति अतिविकसित जीव, मनुष्य में ही होती है। दूसरा है कि उचित – अनुचित का विचार किये बिना मात्र इच्छा की पूर्ति के लिए मन जब गतिशील हो जाता है तो मन की इस प्रकार की गति को भाव प्रवणता (Sentiment) कहते हैं। मन की इस प्रकार की गति बहुत ही खतरनाक हो सकती है। इससे स्वयं और समाज का बड़ा से बड़ा अनिष्ट हो सकता है। मनुष्यों में मन की इस तरह की गति वांछित नहीं है। यह पथ पशुओं में ही अधिकांशतः पायी जाती है। तीसरा है कि मन केवल जन्मजात प्रवृत्तियों (Inborn Instinct) के माध्यम से कार्य करता है। मन की इस प्रकार की क्रियाशीलता मच्छर आदि जीवों में पायी जाती है।

जब किसी भू-भाग विशेष के प्रति प्रेम से भाव प्रवणता (Sentiment) का निर्माण होता है तो इसे भौगोलिक भाव प्रवणता (Geo Sentiment) कहते हैं, जैसे – क्षेत्रवाद, राष्ट्रवाद, भौगोलिक धर्मवाद इत्यादि। इस भौगोलिक भाव प्रवणता से अन्धविश्वास तथा भावजड़ता (Dogmas) पैदा होते हैं। अपने समुदाय या समाज के हित को सर्वोपरी समझ कर दूसरे समुदाय या समाज के रस रक्त पर अपने समुदाय या समाज का हित पोषण करने की मानसिकता सामाजिक भाव प्रवणता (Socio Sentiment) है, जैसे- सम्प्रदायवाद, साम्राज्यवाद इत्यादि।

भौगोलिक भाव प्रवणता, सामाजिक भाव प्रवणता, अन्धविश्वास तथा भावजड़ता मन को बांध देते हैं, जिससे मन की स्वाभाविक प्रगति अवरुद्ध हो जाती है, मन संकीर्ण होता जाता है। मन की यह संकीर्णता नाना प्रकार के कलह और सामाजिक संघर्ष को जन्म देती है। युक्तिपूर्ण मन (Rational mind) का विकास कर, भौगोलिक भाव प्रवणता के कुप्रभावों से बचा जा सकता है और सामाजिक भाव प्रवणता को निष्प्रभावी करने का एकमात्र उपाय है आध्यात्मिक मानसिकता का निर्माण करना।

Neohumanism In A Nutshell (Part One) | Exotic India Artश्री प्रभात रंजन सरकार का कहना है कि “सभी अणु, परमाणु, इलेक्ट्रान, प्रोटान और न्यूट्रान उस परम चैतन्य सत्ता की अभिव्यक्तियाँ हैं। जो इस सच्चाई की अनुभूति को हृदय में सदा जीवन्त रखते हैं, यह कहा जायेगा कि उन्होंने इस जीवन में पूर्णता प्राप्त कर ली है।वे ही सच्चे भक्त (Devotee) हैं”। भक्ति से परिपूर्ण मानवतावाद का विस्तार जब इस विश्व ब्रह्माण्ड के सजीव और निर्जीव सबके लिए किया जाता है तो उसे नव्य मानवतावाद कहते हैं। यह नव्य मानवतावाद, मानवतावाद को सार्वभौमवाद (Universalism) में प्रतिष्ठित करेगा। यह एक ऐसा दर्शन है जो कि मनुष्य में यह समझ पैदा करेगा कि वह केवल साधारण जीव नहीं है। यह दर्शन मनुष्य को समस्त हीनता और दोष की भावना से मुक्त कर देगा, अपने महत्व के बारे में उसे चैतन्य बना देगा तथा उसे नये विश्व के निर्माण के लिए प्रेरित करेगा।  सामान्य (General) मानवतावाद के सम्बन्ध में श्री प्रभात रंजन सरकार का मानना है कि सामान्य मानवतावाद किसी चिरन्तन प्रेरणा के श्रोत से अभिप्रेरित नहीं है अतः यह एक औपचारिकता है, मानव हित के प्रति वास्तविक गम्भीरता से वंचित है, इसकी गति मानव मन की समग्रता को लेकर नहीं है।

निश्चित रूप से नव्यमानवतावाद ही मानवतावादी प्रयासों को पूर्णता प्रदान करता है

विनीता आनंद