प्रभात संगीत नंबर-1974

यह प्रभात संगीत आनंद पूर्णिमा डीएमएस में गाया गया था और इसका हिंदी में अनुवाद प्रद्युम्न नारायण दादाजी ने किया था

आमि यतटुक बुझिते पारि हे देवता
या बुझि बलिते पारि ना
तुमि की जाने ना दर्शन ओ विज्ञान
ताइ ता बलार प्रश्नओ ओठे ना
जीबनेर आदि कोथा केउ जाने ना
सीमार प्रत्यंत्ये याय ना
बांधा मापा याहू आछे ताते मेते रहियाछा
अस्मिता तबु मरे ना
क्षुद्र यदि निजेर क्षुद्र क्य
एटा तार स्वभाविक विनय तो नय
एइ स्वाभाविकता हे देवता
तब करूणाय केन भरे दाओ ना
आ,

भावार्थ-
हे मेरे अन्तर्यामी,मेरे देवता,अपनी अनुभूतियों में जितना तुमको जान सकीं हूं,वह भी बहुत थोडा,बिजली की एक छोटी सी कौंध की तरह,उसे भी तो शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती।पश्यंति की इस क्षणिक दशा को अभिव्यक्ति कैसे दूं?अनुभूति और अभिव्यक्ति की यह दूरी विचलित कर देती है।कैसे कहूं,किससे कहूं? किस माध्यम से उस दशा को व्यक्त करूं? न शब्द हैं,न अर्थ हैं।
दर्शन और विज्ञान भी तो नहीं जानते तुम कौन हो।आदिकाल से ही दर्शन का चिंतन तुम्हें स्पर्श भी नहीं कर पाया।विज्ञान की गवेषणा गार्ड पार्टिकल्स पर आकर अटक गई। तुमको जानने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
जीवन की आदिकथा क्या कोई जान सका है?सारी सीमाओं से परे है यह जानना।यह वर्णमय जगत,असंख्य तन्मात्रिक स्पन्दनों का घनीभूत रूप,फिर जड तत्वों के आभ्यंतरिक संघर्ष से संश्लेषण के रूप में प्राण की उत्पत्ति।फिर काल के क्रम विवर्तनिक से जड से चेतनायुक्त एकपक्षीय जीव से आरंभ होकर उन्नत मस्तिष्क तथा चैतन्य मानव का आविर्भाव- सबकुछ ही विस्मित कर देने वाला है।सृष्टि विकास के अज्ञात बिन्दु से विवर्तन होते होते यह निहारिका,सौर जगत,ग्रह,उपग्रह,नक्षत्र,तारामंडल,से शोभित लता गुलाम,पत्र पुष्प मंडित नद,नदी,मेघालय,सागर,भूधर,अरण्य प्रांतर,जनपद,आंखों को विस्मित और विस्फारित कर दे रही है।
और हे मेरे वरेण्य,मेरे आराध्य,तुम इन सभी मापने योग्य सीमित सत्ताओं के साथ ओतप्रोत भाव से हो।किन्तु हमारा अहंकार कहाँ इस बात को समझ सकता है।यही स्वभाविक भी है,नहीं तो तुम्हारी लीला कैसे चलेगी?क्षुद्र को क्षुद्र कहना स्वभाविक ही है,यह कोई विनम्रता नहीं,लेकिन हे मेरे देवता,मेरे करुणामय बाबा, क्यों नहीं अपनी कृपावर्षा से इस क्षुद्र को विराट में रूपांतरित कर स्वयं में विलीन कर लेते हो।