नववर्ष –  बढ़े लक्ष्य की ओर (Editorial)

काल के अंतहीन पथ पर एक साल बीत गया। सच तो यह है कि हम अपने लक्ष्य के एक साल और निकट आ गए। गम और खुशियों को झेलते हुए संसार आगे बढ रहा है। हर नये साल के आगमन पर हम आशा करते हैं साल खुशियों की बेहतरीन सौगातें लेकर एक निरापद भविष्य की ओर हमको ले जायगा और पूरा संसार एक जश्न में डूब जाता है। पिछले साल के कडुवे अनुभव, त्रासदी, तनाव को हम भूलना चाहते हैं। निश्चय ही ये जश्न हमें तनाव से मुक्त करते हैं, हमारे अंदर एक नई ऊर्जा का संचार होता है और हम नये साल का स्वागत करते हैं।

गम और खुशियों को झेलते हुए संसार आगे बढ रहा है। आशा थी कि दूसरे महायुद्ध के बाद जब उपनिवेशवाद का अंत हुआ, परतंत्र राष्ट्र स्वतंत्र हुए, शीतयुद्ध थम गया तो संसार अपने अनुभव से कुछ सीख लेगा और एक निरापद सुखी मानव समाज की रचना की ओर अग्रसर होगा। लेकिन वह हो नहीं पाया और आज पूरा संसार फिर से तीसरे महायुद्ध की आशंका से सहमा हुआ है। गम और खुशियों को लेकर संसार इसी तरह आगे बढता चल रहा है। यही मनुष्य मात्र की नियति है। वह सुख दुःख से आबद्ध है। मगर सच यह भी है  कि जो लोग भाग्यवादी बनने के बजाय कर्मवादी बनते हैं, वही बदलाव के वाहक बनते हैं, जिन्होनें दुनिया को कुछ और बेहतर, कुछ और मानवीय बनाने का बीडा उठाया है।” नवचेतना” उन्हीं कर्मवीरों का आह्वान है।

आज मनुष्य जाति के इतिहास में कुछ अपूर्व और नवीन घटना घटने जा रही है जिसकी पूर्व तैयारी के लिए महासंभूति का आगमन हुआ था। एक नया सूरज उगने ही जा रहा है जिसकी लालिमा से क्षितिज लाल हुआ जा रहा है, जो शायद अभी बहुतों को दिखाई नही दे रहा है।

एक नया मनुष्य उभर रहा है। यह एक महत्वपूर्ण घटना है। जब से बंदर मनुष्य बना तब से वह वैसा का वैसा ही है। श्रीश्री आनंदमूर्तिजी का एक प्रवचन है- “व्यतिक्रम”, जब प्राकृतिक विकास के क्रम में स्वाभाविक प्राकृतिक विकास के उलट अपवाद स्वरूप ” होमोसैपियन ” नामक नये प्राणी का आविर्भाव हुआ। हमलोग उसी होमोसैपियन की औलाद मनुष्य कहलाये। यह एक महान क्रांति थी जो उस समय हुई थी जब बंदर इंसान बन गया। उस परिवर्तन ने एक विकसित मन का निर्माण किया। उस परिवर्तन से मनोविज्ञान विकसित हुआ। अब एक और महत्वपूर्ण क्रांति होने जा रही है, जो आत्मा को आम जीवन का हिस्सा बनायेगी और मनुष्य न केवल मनोवैज्ञानिक प्राणी होगा बल्कि एक आध्यात्मिक प्राणी होगा। यह उस क्रांति से भी महान है जब बंदर से इंसान बना था। होमोसैपियन से डिवाइन मैन! विकास के पथ पर कितनी बड़ी क्रांति!! महर्षि अरविन्द के शब्दों में सुपर माइंड, हमारी शब्दावली में ” सदविप्र”।

मन जब पांचभौतिक गुरूत्वाकर्षण को भेदकर आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करता है उस समय विपुल ऊर्जा का विस्फोट होता है। यह वैसा ही है जैसे किसी राॅकेट को पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र से निकाल कर अंतरिक्ष में प्रतिष्ठित करना। उस समय धरती पर बैठे वैज्ञानिक उस राॅ केट में एक विपुल ऊर्जा का विस्फोट कराते हैं और उसका वेग इतना बढ जाता है कि वह पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण को पार कर जाता है। उसी तरह मन जब पांचभौतिक तत्व यानि तन्मात्र के आकर्षण को भेदकर आत्मा में विलीन होता है तब विपुल ऊर्जा का विस्फोट होता है। यह विस्फोट शक्तिपात के द्वारा गुरू कराते हैं। नाथ सम्प्रदाय के योगियों और सिद्धों का कहना है कि उस समय सुषुम्ना ग्रंथियों से मुक्त होकर फ्लोरोसेंट लाइट की तरह प्रकाशित हो जाती है। पूरा मेरूदंड दुधिया प्रकाश से आलोकित हो जाता है। आध्यात्म के क्षेत्र में गुरू करूणावतार शक्ति पात के द्वारा शिष्य को आध्यात्म में प्रतिष्ठित कर देते हैं। लेकिन शिष्य को भी उसके अनुरूप अपनी वाह्य और आंतरिक संरचना को अपनी साधना  समर्पण और  तितीक्षा से सुदृढ करना होता है। सोलह सूत्रों का सम्पूर्ण  आंतरिकता के साथ पालन करना हमारी इसी वाह्य और आंतरिक संरचना को सुदृढ करने का उपाय है।

आज युगों से बंदिनी नारी को मुक्त आकाश मिला है। आरंभ में भले ही ऐसा लगे कि पुरानी मर्यादायें टूट रही हैं, लेकिन इस मर्यादा में पुरूषों को भी स्वयं को बांधना होगा। नारी पुरूष की अनुगामी नहीं, सहभागिनी है। नारी अस्मिता और मर्यादा की नयी इबारत लिखने प्राउटिष्ट गर्ल चल पडी है। नव चेतना उसी की आवाज है। इस नये साल के आलोक में हम सभी इस भाव से भावित होकर चलें। नव चेतना की तरफ से सभी पाठकों को नये साल की बधाई।

प्रद्युम्न नारायण सिंह