प्रगतिशील उपयोगतत्त्वमिदं सर्वजनहितार्थं सर्वजनसुखार्थं प्रचारितम् : GPIF Class by Manjula didi

प्रगतिशील उपयोगतत्त्वमिदं सर्वजनहितार्थं सर्वजनसुखार्थं प्रचारितम्

आनन्दसूत्रम्  पञ्चमोऽध्यायः

16 Principles of Prout

Classes taken by Trainer Manjula didi at GPIF platform

 

५.१   वर्णप्रधानता चक्रधारायाम्।

(समाज की गतिशीलता में एक वर्ग सदैव हावी रहता है।)

५.२    चक्रकेन्द्रे सद्विप्राः चक्रनियन्त्रकाः।

(चक्र केन्द्र में स्थित सद्विप्र समाज चक्र का नियन्त्रण करता है।)

५.३   शक्तिसम्पातेन चक्रगतिवर्द्धनं क्रान्तिः ।

(शक्ति सम्पात् से समाज गतिवर्द्धन क्रान्ति है।)

५.४   तीव्रशक्तिसम्पातेन गतिवर्द्धनं विप्लवः ।

(तीव्रशक्ति सम्पात् से समाज गतिवर्द्धन विप्लव है।)

५.५   शक्तिसम्पातेन विपरीतधारायां विक्रान्तिः ।

(शक्ति सम्पात् से समाज चक्र विपरीत धारा में लाना विक्रान्ति है।)

५.६   तीव्रशक्तिसम्पातेन विपरीतधारायां प्रतिविप्लवः ।

(तीव्रशक्ति सम्पात् से समाज चक्र विपरीत धारा लाना  प्रतिविप्लव है।)

५.७   पूर्णावर्त्तनेन परिक्रान्तिः ।

(समाज चक्र अपनी धूरी पर पूर्णरूपेण घूम जाना परिक्रान्ति है।)

५.८   वैचित्र्यं प्राकृतधर्मः समानं न भविष्यति ।

(विचित्रता प्राकृत धर्म है न कि समानता।)

५.९    युगस्य सर्वनिम्नप्रयोजनं सर्वेषां विधेयम् ।

(युग की सभी की निम्नतम आवश्यकतायें सुनिश्चित होनी चाहिये।)

५.१०    अतिरिक्तं प्रदातव्यं गुणानुपातेन ।

(अतिरिक्त साधनों का वितरण कुशल एवं मेधावी में उनकी कर्म कुशलता में हों ।)

५.११     सर्वनिम्नमानवार्द्धनं समाजजीवलक्षणम् ।

(जीवन स्तर सुधार समाज की जीवनी शक्ति का परिचायक है।)

५.१२    समाजादेशेन बिना धनसञ्चयः अकर्तव्यः ।

(सामूहिक अनुमति के बिना भौतिक सम्पत्ति का सञ्चय किसी भी व्यक्ति को न हो।)

५.१३    स्थूलसूक्ष्मकारणेषु चरमोपयोगः प्रकर्त्तव्यः विचारसमर्थितं वण्टनञ्च

(विश्व के समस्त स्थूल सूक्ष्म कारण सम्पदाओं का अधिकतम उपयोग एवं विवेकपूर्ण वितरण हो ।)

५.१४    व्यष्टिसमष्टिशरीरमानसाध्यात्मिक-सम्भावनायां चरमोऽपयोगञ्च।

(मानव समाज में व्यष्टि व समष्टि के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सम्भावनाओं का अधिकतम उपयोग हो।)

५.१५    स्थूलसूक्ष्मकारणोपयोगाः सुसन्तुलिताः विधेयाः।

(जगत् के स्थूल, सूक्ष्म, कारण सम्भावनाओं के उपयोग  में सन्तुलन हों।)

५.१६ देशकालपात्रैः उपयोगाः परिवर्त्तन्ते ते उपयोगाः प्रगतिशीलाः भवेयुः ।

(देश, काल, पात्रोऽनुरुप उपयोग के तरीके में परिवर्त्तन एवं उसका स्वभाव प्रगतिशील हो ।)