अयलन हे प्राण पहुनवा सेवरी के घरवा।
एक बेर अयलऽ! बाबा! परेम बेर चखलऽ हो!
अबरी तो प्राण हरी लेलऽ! सेवरी के घरवा।
अयलन हे प्राण पहुनवा सेवरी के घरवा।
सुधबुध न होऽ रहलइ कहाँ होऽ! बईठाऊ तोरा
कऊन जिनिसिया होऽ खिलाऊ! सेवरी के घरवा।
अयलन हे प्राण पहुनवा सेवरी के घरवा।
एक बेर अयलऽ! बाबा! परेम बेर चखल हो!
अबरी तो प्राण हरी लेलऽ! सेवरी के घरवा।
एक मन करे रामा! गहती चरनवा होऽ!
तजती न कऊनो बहनवा! सेवरी के घरवा।
अयलन हे प्राण पहुनवा सेवरी के घरवा।
एक बेर अयलऽ! बाबा! परेम बेर चखलऽ हो!
अबरी तो प्राण हरी लेलऽ! सेवरी के घरवा।
अयलन हे प्राण पहुनवा सेवरी के घरवा।
लेखन
ददन दादा
दौर-ए-इलेक्शन
दौर-ए-इलेक्शन में कहां
कोई इंसान नजर आता है।
कोई हिन्दू, कोई दलित
तो कोई मुसलमान नजर आता है।
बीत जाता है जब इलाको से
इलेक्शन का दौर, तब हर इंसान
रोटी के लिए परेशान नजर आता है।
कुछ तो खासियत है,
इस प्रजातंत्र में,
कुछ तो बात है,
इस करामाती मंत्र में ।
वोट देता हूँ फकीरों को,
कमबख्त शहंशाह बन जाते है,
और हम हर बार,
वहीं के वहीं रह जाते हैं..!!
रह जाते हैं हम हर बार,
ऊँगली रंगाने के लिए!
नए फकीरों को फिर,
शहंशाह बनाने के लिए ।
महान व्यंग्यचित्रकार आर. के. लक्ष्मण की लेखनी से
