जागृति में एक दिन प्रातः कालीन सार्वजनिक दर्शन के अवसर पर दिये गये श्री श्री आनन्दमूर्ति जी के प्रवचन का सारांश
– संपादक
कला मानसिक एवं आध्यात्मिक भावधारा की बाह्य अभिव्यक्ति है। कला कला के लिये नहीं है। कला सेवा एवं आनन्द के लिये है।
भूत विज्ञान एक कौशल है। एक सहायक संकाय है और कला शैली है- पथ प्रदर्शक है।
संस्कृति, कला एवं विज्ञान का सुखद सम्मिश्रण है। लोगों के उस समुदाय में जहां यह सुखद सम्मिश्रण पाया जाता है, हम कहते हैं कि वह संस्कृत समुदाय है।
संस्कृति मानव समाज की सार्वजनिक संपत्ति है। जहां एकता के सुखद सम्मिश्रण का अभाव है वहीं डावांडोल (chaos) मात्स्य न्याय भी है। मानव वेष में बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खा रही हैं। चित्रकला का काम है स्थिर अवस्था में गतिशीलता लाना। सभी कलाएं यहाँ तक कि भाषा भी प्रतीकात्मक है। सृष्टि के प्रारम्भ से ही परमपुरुष प्रतीकों के रूप में अभिव्यक्त हो रहे हैं। परम पुरुष का एक दूसरा नाम है नटराज। सभी अभिव्यक्तियाँ सेवा और आनन्द के लिये होनी चाहिए। जो कुछ भी सेवा होती है वह कला के लिये होती है। आज कला का अभ्यास किया जाता है।
भले ही मेरी कला से समाज रसातल में चला जाय, किन्तु मुझे कुछ रुपया कमा लेने दो- इस प्रकार के लोग नर-संहार के व्यवसाय में लीन हैं। वर्तमान सिनेमा यही तो कर रहा है। वे मानव-समाज में फूट की दीवारें खड़ी कर रहे हैं।
कला एवं भूत विज्ञान का इतिहास प्रतीकीकरण का इतिहास है। यह कहना कठिन है कि ‘उफ’ से क्या अभिव्यंजित होता है और ‘ओह’ से क्या अभिव्यंजित होता है क्योंकि गति एवं ध्वनि का माध्यम अपूर्ण है किन्तु तुम पूर्ण हो। भाषा के द्वारा इसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती क्योंकि भाषा एक बहुत ही दुर्बल माध्यम है। यह अपेक्षित माध्यम नहीं है। चित्रकला के माध्यम से अभिव्यक्ति तो और भी कठिन है इसीलिये इसे सबसे सुक्ष्म कहा गया है।
विश्लेषण करने पर सभी ध्वनियाँ octave या सुर सप्तक से विभाजित हो जाती हैं और कम-परिवर्तन एवं संयोजन में प्राच्य संगीत की अनेक राग रागनियाँ हमें मिलती हैं। जाने या अनजाने ब्रह्माण्ड की चेतन या अचेतन प्रत्येक सत्ता परम पुरुष को प्यार करती है। जो जानते हुए प्रेम करते हैं उनमें से कुछ प्रकट करते हैं और कुछ नहीं। आन्तरिक रूप से किये जाने को साधना एवं बाह्य रूप से किये जाने को कीर्तन कहते हैं।
