श्री पी.आर. सरकार के प्रवचनों पर आधारित पुस्तक "उत्तर पूर्व भारतीय सभ्यता का इतिहास" से संकलित
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दिल्ली का पुराना किला :
पठान युग के प्रारंभ में भवन निर्माण की मकबरा शैली सामान्यतः बहलोल लोधी के शासन कल में प्रयुक्त हुई थी।हालांकि, मकबरा शैली की कुछ इमारतें इब्राहिम लोधी के शासन काल के दौरान निर्मित हुई थीं। पठान युग के प्रभाव के कारण दिल्ली के बादशाहों ने फारसी भाषा को राजकीय भाषा घोषित किया था, लेकिन इसे शाहजहां ने उर्दू भाषा में परिवर्तित कर दिया था।
पठान युग के दौरान भवन निर्माण में, ‘चूना और गुड का सीरा’ का मसाला ईंटों को एक साथ जोड़ने में प्रयुक्त हुआ था। किंतु यह सही तरीके से मजबूती प्रदान नहीं कर सका, बाद में मुगल कल में चीनी और चुने का मसाला प्रयुक्त हुआ था।
जुड़ाई सामग्री का संयोजन तथा ईंटों के ढीले होने का तथ्य ही प्रमाण है कि, दिल्ली का पुराना किला पठान युग के प्रारंभिक काल के दौरान ही निर्मित हुआ था । लोधी गार्डन के निर्माण में भी मिलता – जुलता जुड़ाई का मसाला ही प्रयुक्त हुआ था।
पुराना किला के भवन निर्माण का अनुमान, उसके जुड़ाई सामग्री के संयोजन शैली, ईंटों के आकर के विश्लेषण द्वारा निर्धारित होता है कि वह कितना प्राचीनतम है।
हिंदू युग की ईंटें पतली और लंबी होती थीं, ऐसी आकृति की ईंटें भारत में बनी थीं। उन दिनों पठान युग के दौरान भी वास्तु कला की शैली ताज महल तथा फतेहपुर सीकरी में प्राप्त शैलियों की तरह सूक्ष्म नहीं थीं। पुराना किला के प्रवेश द्वार का आंतरिक भाग समेटिक और राजवाड़ा शैलियों के सम्मिश्रण को दर्शाता है, जबकि छतरी के प्रतिकृति वाला उपरी भाग निश्चित रूप से राजवाड़ा शैली का उदाहरण है।
इंद्रप्रस्थ के अवशेष आज भी जमीन के नीचे दबे हुए हैं। केवल व्यापक खुदाई करने से यह जमीन के अंदर गड़ा हुआ शहर अनावृत हो जाएगा। लोधी गार्डन पुराना किला की तरह से टीले पर स्थित है, जो संकेत करता है कि, किसी पुरातन शहर के कुछ अवशेष भूमि के नीचे गड़े पड़े हैं। कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ की अपेक्षा अधिक सुंदर था।
ऊपर की ओर नोक किए हुए एक त्रिकोण तथा नीचे की ओर नोक किए हुए दूसरे त्रिकोण के साथ दो समबाहु त्रिभुजों को मिला कर पांच नोकों वाले तारा का प्रतीक पुराना किला के दीवारों पर प्राप्त हुआ है।यह प्राचीन फारस और आर्य अवशेषों के बीच भी प्राप्त हुआ है।
शिया मुसलमानों ने शाहजहां के शासनकाल तक मुगल बादशाहों के धार्मिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया था। बंगाल, अवध और लाहौर के नबाब लोग भी शिया ही थे। जबकि औरंगजेब एक सुन्नी मुसलमान था। शिया लोगों की मातृभाषा भारत में उर्दू है। शिया आबादी पूरे भारतीय मुसलमान का 0.1 % ही है। बाकी 99.9 % सुन्नी है। शिया लोग अधिकतर शहरों में रहते हैं तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उन्नाव, लखनऊ एवं अलीगढ़ में पाए जाते हैं। बिहार में शिया लोग पटना के एक मोहल्ला शेखपुरा में पाए जाते हैं। पंजाब में शिया एवं सुन्नियों की संख्या कमों बेसी बराबर ही है, जबकि कश्मीर में शिया लोग अधिक हैं।
ईरान में संपूर्ण आबादी शिया लोगों को समाविष्ट किए हुए है।
फारसी भाषा काबुल के पश्चिम से ईरान तक संपूर्ण इलाके में बोल चाल की भाषा है। बंगाल के सुन्नी लोग बहावी वर्ग से जुड़े हुए हैं, जो लोग नमाज के दौरान अपने हथेलियों को ऊपर उठा कर रखते हैं। कहा जाता है कि बहावी लोग मूलतः शैव थे तथा शिव की एक मूर्ति अपने कपड़ों के नीचे छिपा कर या अपने कलाओं के चारों ओर बांध कर रखते थे। जब मौलवियों ने इस कार्य को जाना तब बहावी लोगों को अपने हाथों को सामने की ओर फैलाने को कहा गया, जो अब बहावी लोगों द्वारा नवाज अदा करने की स्वीकृति शैली बन चुकी है।
शेर – ई – मन्ज़िल का वास्तु राजवाड़ा शैली का द्योतक कोटा में प्रचलित शैली है। वास्तु कला प्रति 800 वर्ष की अवधि पर महत्वपूर्ण रूपांतरण से गुजरती है, क्योंकि इस दौरान सुन्दरता के प्रति समाज का विचार बदल जाता है तथा 20 पीढ़ियों के बाद, अर्थात् करीब 500 वर्षों बाद मानव शरीर की शारीरिक संरचना बदल जाती है। उदाहरण के लिए : – दाढ़ी और नाक बदल जाती है तथा यदि 21 वीं पीढी की तुलना पहली पीढ़ी से की जाती है तो बहुत प्रभेदक शारीरिक रूपान्तरण नजर आते हैं। राजवाड़ा और गौंडिय शैलियों में शिव मन्दिर उत्तरी और पूर्वी भारत में पाए जाते हैं। बंगाल में शिव मंदिरों का मात्र 1 प्रतिशत ही राजवाड़ा शैली में है, बाकी गौंडिय शैलियों में है, जबकि सभी शाक्त मन्दिर गौंडीय शैलियों में है
विशुद्ध उत्कल शैली उड़िया में पाई जाती है, जबकि बंगाल में उत्कल और गौंडीय शैलियों का सम्मिश्रण सुस्पष्ट रूप से देखा जाता है। छत्तीसगढ़ में राजवाड़ा और उत्कल शैलियों का सम्मिश्रण पाया जाता है, जिसे मैने छत्तीसगढ़ शैली नाम दिया है। गोदावरी नदी के दक्षिण किनारा पर द्रविण शैली पाई जाती है, जैसा कि मीनाक्षी मंदिर में प्रकट होता है। जबकि गोदावरी नदी के उत्तरी किनारे पर तेलंगाना और उत्तरी आंध्रप्रदेश में वास्तुकला की उत्कल शैली प्रभावी है। पांडवों के जीवन काल में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग होता था, हालांकि ख़रोष्ठी लिपि का भी यदा – कदा प्रयोग होता था। पांडव लोग इंद्रप्रस्थ में रहते थे, जहां श्री कृष्ण बार – बार आते – जाते रहते थे। अभी के समय में इंद्रप्रस्थ जहां भूमिगत है, अथवा जमीन में दबी हुई है। दिल्ली में अभी तक बहुत सारी खड़ी इमारतें करीब 700 वर्ष पुरानी हैं, तथा वे प्रथम पठान युग के समय निर्मित हुई थीं, जो राजा दाहिर की मृत्यु के बाद शुरू हुआ था। इन इमारतों के निर्माण हेतु प्रयुक्त सामग्रियों को पूर्वनिर्मित इमारतों को दुर्भाग्य वश नष्ट कर के उनसे पाया गया था। प्राचीन इमारतों का विनष्टीकरण मूल्यवान पुरातात्त्विक इतिहास को नष्ट करता है, जो प्राप्त इतिहास के मिथ्या वर्णन में परिणत होता है।
भारत के सभी मंदिरों में से जैन मंदिर सर्वाधिक उपस्थित है। उन स्थानों में जगन पर प्राचीन स्मारक बचे हुए हैं, वहाॅं छोटे संग्रहालय स्थापित होना चाहिए, तथा उन्हें जनता के लिए खोला जाना चाहिए। इसके अलावा प्राचीन स्मारकों को विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित होना चाहिए।
24 फरवरी 1984

शांतिवन
शांतिवन के इस टीले युक्त क्षेत्र की यदि खुदाई की जाए तो प्राचीन दिल्ली के अवशेष यहां पाए जा सकते हैं। दिल्ली दीर्घकाल तक भारत की राजधानी रह चुकी है तथा यहां बहुत प्राचीन काल का पुरातात्त्विक प्रमाण मिलना चाहिए। शाहजहां के समय में भारत की राजधानी आगरा स्थानांतरित हुई थी तथा 1657 से 1912 के बीच ब्रिटेन द्वारा कोलकाता को भारत की राजधानी बनाई गई थी। इस दो कालावधि के अतिरिक्त दिल्ली हमेशा ही भारत की राजधानी रही है। कांटेदार अनन्नास ईष्ट इंडिज एवं मलेशिया से भारत लाया गया था जबकि कंटकहीन अनन्नास वेस्ट इंडिज ग्वाटेमाला से आया था। अनन्नास पुर्तगालियों द्वारा भारत लाया गया था तथा केला ईष्ट इंडिज से डच लोगों द्वारा भारत लाया गया था।
मानव जीवन के विभिन्न स्तरों एवं बहुअभिव्यक्तियों के सृजन के संग्रह को संस्कृत कहते हैं। हालांकि क्षेत्रीय भिन्नता और परिवर्तन कई क्षेत्र में विद्यमान रहते हैं, फिर भी मानव संस्कृति मूलतः एक ही है।
उदाहरण के लिए वैदिक संस्कृत शब्द ‘धाम’ का अर्थ है, शरण स्थली या घर। वैदिक भाषा में, यह मेरा घर है” को “एतद् नस धाम” तथा रूसी भाषा में ” एतद् नन्त धाम” कहते हैं।
आध्यात्मिक उन्नति के लिए शास्त्रीय नृत्य बहुत सहायक है। जब मैं 22 वर्ष का था तब मैं उर्दू में 50 गीत एवं अंग्रेजी में 100 गीतों की रचना की थी, तथा मैं जब मात्र 13 या 14 साल का था, तब मैं संस्कृत में भी 12 गीतों की रचना की थी।
12 फरवरी 1984
श्री श्री आनंदमूर्ति जी
अवधूतिका आनंद श्वेता आचार्य द्वारा संकलित
