किसान

सारे जग में व्याप्त है
महंगाई का दौर ।
मुश्किल से ही प्राप्त हो
अब तो भैईए कौर ।।

कभी देश की थे सुनो
केवल शान किसान ।
शोधन कर निज भूमि का
उपजाते थे धान ।।

सारे जग की सम्पदा
को तुम समझो झूँठ।
रोटी तभी है मिल सके
जब ये पकड़े मूठ (हल)।।

तुम तो सोये महल में
ये खेतों के बीच ।
आखों के ही नीर से
रहे खेत को सींच।।

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इनकी मेहनत का सुनो
तुम्हें प्राप्त है अन्न ।
इनकी विपदा देखकर
क्या तुम होते हो सन्न ?

धरिणी हित धर धैर्य को
सहते दैव प्रकोप ।
सह शीतलता ग्रीष्मता
धान रहे हैं रोप।।

तुमने देखा कभी ना
उगता सूर्य प्रभात ।
अवलोकन हित खेत में
जाते आधी रात ।।

राम सहारे मिश्र कानपुर