तुम्हारे “मैं” का रंग मिल जाए

 

 

मुहब्बत का रंग हो

अपनों का संग हो

ऐसी हो मेरी होली

 

भक्ति की बयार हो

आस्था की खुमार हो

ऐसी हो मेरी होली

 

तुम्हारे “मैं” का रंग मिल जाए

मेरा “मैंपन” का रंग मिट जाए

ऐसी हो मेरी होली

 

तन–मन और आत्मा

तेरी ओर हो परमात्मा

ऐसी हो मेरी होली

 

जाति–भाषा का न भेद हो

भावप्रवणता का न खेद हो

ऐसी हो मेरी होली

 

“सभी सुखी हों” का भाव हो

“सभी स्वस्थ हों” का चाव हो

ऐसी हो मेरी होली

 

यह जीव जगत उनकी यह सृष्टि

सबों पर बरसे उनकी कृपा दृष्टि

ऐसी हो मेरी होली

 

गौतम प्रधान ‘मुसाफ़िर‘

रायगढ़ छत्तीसगढ़