जानने की प्यास ले,बाहर गया घर से निकल कर।
खोल देगा भेद सारे, हृदय में ये आस रखकर।
प्रकृति कर देगी समर्पण, देख कर संकल्प उसका।
मोहिनी सूरत दिखा देगी,स्वयं घूँघट उठाकर।
किंतु दिन की धूप ही, उसके लिये हो गई अंधेरा।
और अंधियारा निशा का,बन गया उसको सवेरा।
कर प्रकाशित विश्व सारा, है स्वयं तम ग्रस्त दीपक,
ज्योत्स्ना बरसा रहे शशि को अमा ने आन घेरा.
सिंधु में जल है अपरिमित, पर तृषा का अंत है क्या?
पंख कितने भी प्रबल हों, पर गगन का अंत है क्या?
प्यास प्रियतम की संजोये, अभी तक जीवन गुजारा.
जब घड़ी आयी मिलन की, प्रकृति ने तुझको संवारा.
सौम्यता पायी सुमन से, सुधाकर से कांति पायी,
कमल से कमनीयता, ऋतुराज से सौंदर्य सारा.
केश गजरा से सुशोभित, नैन में कजरा तुम्हारे,
अधर लाली,भाल बिंदिया, मांग में सिंदूर धारे.
कर खनकती चूड़ियाँ और सूत्र मंगल का गले में,
कौन इस श्रृंगार का वर्णन करे, सब शब्द हारे.
सेज पर तेरी सुहागन, पर बता तो, कंत है क्या?
पंख कितने भी प्रबल हों, पर गगन का अंत है क्या?
कौन है जो सूर्य, शशि, नक्षत्र को गतिमान रखता?
कौन फूलों को खिलाता, तितलियों में रंग भरता?
कौन मदिरा बन छलकता, प्रियतमा के मृग नयन से?
और चातक के हृदय को, स्वाति जल बन तृप्त करता.
कोकिला के कंठ से जो गीत निस दिन गीत गा रहा है,
एक पल में सृष्टि लय अनगिन किये जो जा रहा है.
मृत्यु अपनी कोख में, पाले यहाँ जीवन सनातन,
फूटता है नया अंकुर, वृद्ध तरुवर जा रहा है.
जो बुझा दे इस पहेली को, कोई मतिमंत है क्या?
पंख कितने भी प्रबल हों, पर गगन का अंत है क्या?
सोमेश शर्मा
