समाज सेवी के लिए मकर ध्वज है – विरोधी शक्ति का होना

व्यवस्था परिवर्तन की निरलस भावना से जब कोई व्यक्ति, संस्था या समूह आगे बढ़ता है, तब तत्कालीन समाज उसे पागल करार देता है, तिरस्कार करता है। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन के पथ पर चलने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की उपासना, निरलस भावना, लगन, धीरे-धीरे रंग लाती है और एक दिन निन्दा करने वाले, पागल कहने वाले, धोखा देने वाले, पैर खींचने वाले लोगों का मुँह काला हो जाता है।

अंग्रेजों के ख़िलाफ़ भी जब कुछ लोग खड़े हुए थे, तब भी तत्कालीन समाज के बहुसंख्यक आबादी उन क्रान्तिकारियों की निन्दा करने में, उन सब को हतोत्साहित करने में कोई कंजूसी नहीं किए थे। लेकिन जिन मुट्ठी भर पवित्र आत्माओं के मन में सिर्फ और सिर्फ माँ भारती के हाथों में जकड़ी ज़ंजीर को काट कर अंग्रेजों से भारत को मुक्त करना था,  वैसे लोग माँ भारती के लिए अपना कर्तव्य करते हुए हँसते- हँसते फाँसी पर लटक गए। अंडमान तथा अन्य जेलों में मर खप गए। लोगों से जेलों के कोल्हू में बैल की तरह जोतकर तेल तक निकलवाया गया। तब भी उन सबों ने कभी उफ तक नहीं किया। किसके लिए? सिर्फ और सिर्फ माँ भारती की आजादी के लिए। और अंततः वही देशभक्ति का जुनून, असह्य कष्ट-पीड़ा, बलिदान, तथा जेलों के कोल्हू में जुताकर निकाले गए तेल का एक-एक बूंद, समस्त देशवासियों के दिल और दिमाग में अंग्रेजों के खिलाफ जन आंदोलन तैयार कर दिया। अंग्रेजों को भागना पड़ा। आज कुछ मुट्ठी भर लोगों के निरलस त्याग और बलिदान के फलस्वरूप ही हम सब अपने आप को आज़ाद देश का नागरिक कह पाने का गौरव हासिल कर पा रहे हैं।

आज पुनः समाज में अमन-चैन देने वाली संसाधन, संस्था और तमाम व्यवस्था दानवी विचारों से सम्पन्न लोगों के मुट्ठी में कैद है। सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन युग की ज़रूरत बन पड़ी है। देश में अधिवास करने वाली सभी जन-गोष्ठी जो अलग-अलग तरह से पूर्ण आत्म-निर्भर बनाने वाली प्रकृति प्रदत्त संसाधनों से सम्पन्न हैं, यह सब शोषकों द्वारा बनाए गए उपनिवेश के ज़ंजीर से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से आत्म-निर्भर बनकर अपनी-अपनी अलग-अलग रूप रंग में छटा बिखेरने के लिए छटपटा रही है। इसी कार्य को पूरा करने के लिए श्री प्रभात रंजन सरकार जी का प्रउत दर्शन पर आधारित देश के प्रमुख चवालिस जन-गोष्ठी को लेकर गठित चवालिस समाजिक आर्थिक इकाई अपने-अपने संसाधनों से पूर्ण आत्म-निर्भर होने के लिए आन्दोलन रत हैं। इन सब जन-गोष्ठियों के संसाधनों पर मुट्ठी भर शोषक कुंडली मारे बैठे हैं। और इन सब की सुरक्षा में कानून का आड़ लेकर देश का सारा तंत्र चीन की मोटी दीवार की तरह खड़ा है। बाहरी स्थिति व्यवस्था-परिवर्तन हेतु होने वाले समाज आन्दोलन के विपरित दिखाई देती है। लेकिन ऐसी स्थिति में ही हमें काम करना है। काम अपने दुनियावी लाभ के लिए नहीं, बल्कि काम करना है सिर्फ अपने गुरु के अरमानों को पूरा करने और परमात्मा की सृष्टि के हित के लिए। हमने इतिहास के पन्नों से तथा गुरु से यही जाना और सीखा है कि सच्चे समाज सेवी सिर्फ निरलस भावना से अपना कर्तव्य पूरा करते हैं। हमें इसी भाव से काम करते जाना है। दुनिया में किया गया कोई भी प्रयास एक न एक दिन अपना रंग ज़रुर दिखाता है। बस! हमें तो रास्ता का निर्माण करना है, वृक्ष तैयार करना है, यह सोचकर कि इन सब का उपयोग हम कर पाएं या नहीं लेकिन आने वाली नस्लें इसका उपयोग ज़रुर करेंगी। याद रहे! जिस दिन से हम अपने आप में आत्मवलोकन करने लगेंगे की जो दायित्व हम लिए हैं, उसे कितनी इमानदारी से हम खुद से इसे पूरा कर रहे हैं, उसी दिन से हमारे भीतर सकारात्मकता और आशावादिता का गुण भर जाएगा। व्यवस्था परिवर्तन के अभियान को तीव्र करने के लिए सलाह से ज़्यादा साथ देने वालों की ज़रूरत है।

                 सुशील रंजन