ध्रुवों का स्थान परिवर्तन

मानवीय मौल्य-धर्म प्राय: अपरिवर्तनीय है। मैं कहता हूं प्राय: अपरिवर्तनीय क्योंकि मौलिक धर्म हमेशा विश्व-ब्रम्हांड में व्यवहार कुशल के सम्बन्ध बनाया रखता है और इसलिए मानव अस्तित्व में मानवीय मौल्य-धर्म या मौलिक-सिद्धांत में कोई परिवर्तन या भौतिक रूपान्तरण नहीं होता। परन्तु भौतिक शरीर के साथ वैसी बात नहीं है। भौतिकता के क्षेत्र में, भौतिक उत्सारण के क्षेत्र में उस तरह का परिवर्तन हो सकता है और भूतकाल में इस पृथ्वी के इतिहास में भी अनेकों बार ऐसे परिवर्तन हुए हैं। अन्य अनेक ग्रहों, नक्षत्र, तारे, निहारिका आदि के इतिहास में भी ऐसे परिवर्तन हुए हैं। भैतिक क्षेत्र में अस्तित्व को बनाये रखने के लिए परिवर्तन अपरिहार्य है। मानसिक क्षेत्र में, समवायिक संरचना में परिवर्तन होता है, परन्तु वह परिवर्तन विश्व ब्रम्हांड की व्यवस्था से सम्पर्क बनाये रखता है। वह भौतिक स्तर की तुलना में विशेष महत्वपूर्ण नहीं होता।

अपने ध्रुवों का उदाहरण ले लो। ध्रुव अपना स्थान परिवर्तन करते हैं। भूतकाल में ऐसे अनेकों बार ध्रुवों में स्थान परिवर्तन हुआ है। इस पृथ्वी के इतिहास में एवं अन्य अनेकों ग्रह के इतिहास में भी और स्थान परिवर्तन के फलस्वरूप, इस बदलाव के कारण लोगों को कहना है कि ग्रह, पृथ्वी के अन्दर एवं बाहर घुमते थे। जब उसका उपरी धरातल लिथोस्फेरिकल बॉडी आज की तरह ठोस नहीं था। कुछ लोगों की राय है कि पृथ्वी के ठोस रूप में आने के फलस्वरूप प्रशान्त महासागर की उत्पत्ति हुई। प्राचीन खगोल विज्ञान एवं ज्योतिष विज्ञान अनुसार मंगल ग्रह की उत्पत्ति भी पृथ्वी से ही हुई है, परन्तु यह अन्य ग्रहों के भांति पृथ्वी के उपग्रह के रूप में चक्कर नहीं लगाती। इसलिए मगंलग्रह का एक नाम कुजा है। शनि राजा,कुजा मन्त्री (शनि राजा है और मंगल उसका मंत्री है)। कु का अर्थ है पृथ्वी और कुजा का अर्थ हुआ पृथ्वी से उत्पन्न। अतः भौतिक क्षेत्र  में उस तरह के परिवर्तन होते हैं और भविष्य में भी होंगे।

ध्रुव अपना स्थान परिवर्तन करते हैं। अब देखा जाय तो भूतकाल में अनेकों बार ऐसे परिवर्तन से पृथ्वी को अपनी धुरी पर घूमने में जो समय लगा वह भी अलग-अलग है और पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा में लगाया गया समय, उसके वर्ष में भी बदलाव आया है। दिन-रात भी 24 घण्टे के न थे और वर्ष भी 365-366 दिन के न थे। अतः ध्रुवों की स्थिति में परिवर्तन से मौसम में भी बदलाव आया और मंगल ग्रह से सामंजस्य में भी अनेकों बार परिवर्तन हुआ। और तदनुसार भूतकाल में कैलेंडर की गणका एवं तरीके को बदलना पड़ा। यदि ध्रुव अपने ही स्थान परिवर्तन करते हैं, तब पृथ्वी द्वारा अपने धुरी पर घूमने में लिया गया समय निश्चय ही या तो कम होगा या ज्यादा। उसी तरह सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी द्वारा लगाया गया समय भी या तो कम होगा या ज्यादा। इसलिए कभी-कभी हम देखते हैं कि ऋतुऐं अपना सही सामंजस्य माह के साथ नहीं रख पाती हैं, यह प्रदर्शित करता है कि तेजी से स्थान परिवर्तन (ध्रुवों का) हो रहा है। अब इस परिवर्तन के कारण सिर्फ माह एवं ऋतुओं का सामंजस्य ही नष्ट नहीं होगा बल्कि पृथ्वी के पर्यावरण एवं परिस्थिति भी विच्छिन्न होंगे। उस विच्छिन्नता के परिणामस्वरूप भैतिक एवं जैविक (जीववैज्ञानीक) परिवर्तन जीव-जन्तुओं के शरीर में भी होगा, सभी जीवित-प्राणियों यहाँ तक की पेड़-पौधे में भी।

टर्शरी-युग के पौधे क्रेटशियस-युग में नहीं पाया जा सकता। क्रेटेशियस युग के पौधे एवं प्राणी बाद के युगों में नहीं पाये जाते हैं। उसी प्रकार प्लायोसीन, मायोसीन, मिसोजोईक और सिनोजोईक युग में भी क्यूँकि उनका अस्तित्व, जीवन-मरण भी परिस्थितकीय संतुलन पर आधारित होता है। और ध्रुवों के स्थान परिवर्तन के परिणामस्वरूप कुछ लोगों का कहना है कि पूर्वी गोलार्द्ध में उत्तर ध्रुव, उत्तर से दक्षिण की और पश्चिमी गोलार्द्ध में दक्षिणी ध्रुव, दक्षिण से उत्तर की ओर सरक रहा है, और इसकी कोई गारंटी नही की उनका सापेक्षिक अन्तर अपरिवर्तित रहेगा। अतः हमें भविष्य के लिए तैयार रहना चाहिए, हमें ध्रुवी-परिवर्तन के परिणामों के कारण पर्यावरण एवं परिस्थिति की संरचना में परिवर्तन के लिए भी तैयार रहना होगा। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप पृथ्वी के चुम्बकीय-संरचना में भी बदलाव आयेगा। और इसके परिणामस्वरूप सौरमंडल के अन्य ग्रह-उपग्रह में भी असाधारण एवं आश्चर्यजनक रूप से आकृष्ट में परिवर्तन आयेगा। और यदि चुम्बकीय आर्डर विच्छिन्न हुआ तब पृथ्वी और सम्पूर्ण सौर मंडल के विद्युत-चुम्बकीय तरंगों में खास परिवर्तन एवं आश्चर्यजनक बदलाव आयेगा। और विद्युत चुम्बकीय तरंगों में परिवर्तन के कारण मानवीय चिंतन भी निश्चित रूप से प्रभावित होगा।

क्रमशः

श्री प्रभात रंजन सरकार

(उत्तर-पूर्व भारतीय सभ्यता का इतिहास – 31 मई 1986, कलिकता)

 साझा कर्ता: अवधुतिका आनन्द श्वेता आचा