शम्भूत्यानन्द अवधूत
सृष्टि चक्र
(एक से अनेक और अनेक से एक)
‘कार्य-कारण’ सिद्धान्त के अनुसार कारण सदैव ही कार्य की पूर्वावस्था होता है। प्रत्येक कार्य के पीछे दो प्रकार के कारण रहते हैं। 1. उपादान कारण (Material Cause) लौर 2. निमित्त कारण (Efficient Cause) । हम एक उदाहरण बर्तन का लें। बर्तन एक कार्य है। इस मामले में मिट्टी, पानी आदि उपादान कारण हैं और कुम्भकार की इच्छा निमित्त कारण हैं। फिर निमित्त कारण के भी दो पक्ष हैं- १ कुम्भकार की कार्य करने की क्षमता अर्थात कुम्भकार में कार्य करने की भौतिक शक्ति का निहित होना । कुम्भ-कार की इच्छा ने उसके कार्यकारी भौतिक क्षमता में आवेग (Momentum) पैदा किया, जिसके परिणामस्वरुप बर्तन के भौतिक घटक अंश (मिट्टी, पानी आदि) का संचयन हुआ जो क्रमशः बर्तन के रुप में परिवर्तित हो गया । इस प्रकार भौतिक शक्ति ने यहाँ एक संयोजन करनेवाला अभिकर्ता (Agent) के रुप में अपना कार्य अदा किया है। इसने निमित्त कारण (इच्छा) और उपादान कारण (वांछित भौतिक घटकों) के मध्य एक संयोजक का कार्य किया है । इसी तरह ब्रह्माण्ड की रचना के मामला में पंच-भौतिक घटक (क्षिति, अप, तेजस, मरुत और व्योम) उपादान कारण हैं और ब्राह्मी ईच्छा निमित्त कारण है। लेकिन सृष्टि की पूर्वावस्था में यह उपादान कारण भी निमित्त कारण (ब्राहमी ईच्छा) में ही समाहित रहता है। सुदृढ इच्छा-शक्ति ही गुप्त या प्रसुप्त क्रिया-शक्ति में आवेग (Momentum) पैदा करती है जिसमें क्रिया-शक्ति के आन्तरिक पारस्परिक घात-प्रतिघात के फलस्वरुप क्रमिक गति से आगे पंचभौतिक घटकों का सृजन होता है। इसलिए ब्रह्माण्ड की संरचना के मामले में पुरुषोत्तम की ईच्छा ही निमित्त करण और उपादान
करण दोनो हैं। और कलाकार प्रकृति अभिकर्ता है, जो ब्राह्मी इच्छा और स्तुति विषय का मध्य संबंध स्थापित करता है। मूल रूप से प्रकृति कार्य गौण या द्वितीय स्तर का है जो ब्राह्मी इच्छा का आधार है। ब्राह्मी इच्छा की अनुपस्थिति में प्रकृति प्रसुप्त अर्थात अव्यक्त रहता है। इसलिए कहा गया है, ‘शक्तिः सा शिवस्य शक्तिः (आनन्द सूत्रम् से)
प्रकृति पुरूष का गुण है । यह पुरूषोत्तम की सहायिका की हैसियत से उनकी उद्देश्य को आगे ले चलनेवाली सत्ता है । यह भी कहा गया है कि “यह ब्रह्माण्ड ब्राह्मी ईच्छा का विचार-प्रक्षेपण है ।”
जब पुरुषोत्तम ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने का निर्णय लेते हैं तब प्रकृति (क्रियाशक्ति) अपने को अभिव्यक्त करने का अवसर पाती है और अपनी अन्तः निहित तीन शक्तियाँ, सतो गुण, रजो गुण ओर तमो गुण के माध्यम से पुरुष को गुणान्वित करने का कार्य प्रारम्भ करती है। प्रथम अवस्था में सतोगुण पुरुष को गुणान्वित करता है। परिणामस्वरूप पुरुष का कुछ अंश परिवर्तित होता है और विशुद्ध आत्मिक स्वबोध (“मैंपन का बोध) का प्रादुर्भाव होता है इस परिवर्तित या रूपान्तरित स्थिति को ब्रह्मी महत् कहते हैं। दूसरी अवस्था में रजो गुण ब्राह्मी महत् को प्रभावित करता है, जिसके फलस्वरूप ब्राह्मी महत् का कुछ अंश परिवर्तित अवस्था द्वितीय आत्मिक बोध “मैं करता हूँ” “Doer I” अर्थात् कर्त्तापन का भाव बोध को उद्भूत करती है । इस स्थिति को अहम् तत्व) ब्राह्मी अहम्) कहते हैं। तृतीय अवस्था में अहम् तत्व तमोगुण के प्रभाव में आती है जिनके परिणामस्वरूप अहम् तत्त्व का कुछ अंश हातरित होकर वित्त-तत्व को उत्पन्न करता है, जिसमें क्रियापन्न “Done I’ का बोध होता है जो ब्राह्मी मन का विषयीभुत प्रतिरूप है ।
भूना महत्, अहम् और चित्त का सम्मिलित नाम ब्राह्मी मन या भूमा मन है ।
तमोगुण के प्रभाव से चित्त-तत्व का निर्माण होता है, जो प्रकृति की तीसरी और अन्तिम अवस्था है। क्या इसका अर्थ हुआ, प्रकृति की सारी शक्तियाँ यहाँ समाप्त हो जाती हैं और यह कार्य करना बंद कर देती है ? नहीं, प्रकृति सतत्, संघर्षशोला, युद्धरत उर्जा है (यह कभी भी बंद नहीं हो सकती है, बल्कि तमो के प्रभाव को मात्रा प्रत्येक क्रमागत अवस्थाओं पर बढ़ती ही जानी है। इसलिए इसके प्रभाव की क्रमिक वृद्धि से आकाश, मरुत तेजस अप और क्षिति तत्वों का सूजन होता है। भूमा प्राणकेन्द्र (पुरुषोत्तम) की केन्द्र धारा जिसमें ब्राह्मीमन और भौतिक तत्व (क्षिति, जल, पावक, समीर, गगन) का सूजन होता है, को संचर कहा जाता है। यह गति बारा बहिर्गामी और विश्लेषणात्मक है। यह एक से अनेक की ओर जाने वाली गति है ।
आकाश से ठोस तक तत्वों का रूपान्तरण या उत्पन्न हो जाना कुछ नहीं है बल्कि अन्तर आणविक और अन्त परमाणविक जगह का संकुचित हो जाना तथा रासायनिक दृश्य सम्बन्ध का बढ़ जाना है। संख्या की दृष्टि से घटकों में वृद्धि होती है, लेकिन कुल तीव्रता (क्षमता) ज्यों का त्यों यानी प्रथम घटक आकाश तत्व की तीव्रता के अन्तर्गत रहती है। द आकाश घटक को कुल तीव्रता (क्षमता) के अन्तर्गत ही शेष चार घटकों (मरुत, तेजस, रस और ठोस) का निर्माण होता है। इसलिए जब पाँचवे घटक ठोस का निर्माण होता है तो अन्तर आणविक और अन्तर परम। णविक जगह अपनी चरम सीमा तक संकुचित हो जाती है। यही कारण है कि छठे घटक का निर्माण नहीं होता है। लेकिन तमो गुण का बाह्य चःप (बल) अपना दबाब बढ़ाने के लिए क्रियाशील ही रहता है, जिसके परिणामस्वरूप चाहे प्राण का निर्माण होता है या जड़स्फोट होता है ।
प्रकृति के तमोगुण के बाह्य दबाब (बल) के कारण संयुक्त संरचना के अन्तर्गत दो विरोधी शक्तियाँ – अन्तर्गामी और बहिर्गामी – विर्कासत होती है। इस अन्तर्यामी और बहिर्गामी शक्तियों के संघर्ष के दौरान कोई एक शक्ति बिजयी हो जाती है। जब अन्तर्गामी शक्ति बहिर्गामी शक्ति पद विजयी हो जाती है तब प्राण केन्द्र का निर्माण हो जाता है, बस्तु का ठोसरव कायम रहता है और जब बहिर्गामी शक्ति अभ्वर्गामी शक्ति पर विजयी होती है तब वस्तु की संरचना विस्फोट के द्वारा टूट जाती है। विस्फोट की इस प्रक्रिया को जडस्फोट कहा जाता है। परिणामस्वरूप वस्तु के पाँवों घटक ब्रह्माण्ड के अपने सम्बन्धित घटकों में समाहित हो जाती है और पुनः संचर धारा की प्रक्रिया में आ जाती हैं। घटकों के अपने सम्बन्धित घटक में पीछे की ओर पुनर्गमन को ऋणात्मक संचर कहते हैं। क्योंकि संचर की प्रक्रिया में पंच भूतों का निर्माण होता है और जड़स्फोट के कारण घटकों का पुनः अपने सम्बन्धित घटक में पीछे की ओर मुड़ जाना होता है, इसलिए यह प्रक्रिया संचर के विपरीत है, ऋणात्मक है। अतः इसे ऋणात्मक संचर – कहते हैं।
यद्यपि प्राणकेन्द्र (प्राणाः) का निर्माण हो जाता है फिर भी अन्तर्गामी शक्ति और बहिर्गामी शक्ति के संघर्ष के फलस्वरूप संयुक्त तत्व का कुछ अंश चूर्ण-विचूर्ण हो जाता है। जब पूर्णीभूत यह अंश आकाश तत्व से भी अधिक सूक्ष्म हो जाता है तब यह चित्त तत्व का एक भाग बनता है और अणुमन का निर्माण होता है।
“त्रिव संघर्षेन केशाभूतानि जड़ानि चितां मानस घातुः वा। – आनंद सूत्रम्।
जब प्राण, अनुकूल परिवेश (वातावरण) पाता है अर्थात् जब सभी पाँचों घटक आवश्यक अनुपात में विद्यमान रहता है, तब पदार्थ से जीवन का अभिप्रकाश होता है। इस बिन्दु से ही प्रतिसंचर (केन्द्र की ओर जाने वाली गति) प्रारम्भ होता है। प्रसुप्त सर्पनुमा कुण्डलिनी शक्ति (मुल-ऋणात्मिका शक्ति) ही गति को प्राणकेन्द्र (मूल बिन्दू) की ओर जाने के लिए प्रेरित करती है ।
कुल कुण्डलिनी क्या है ?
कुल कुण्डलिनी अर्थात् सुप्त सर्पनुमा कुण्डलिनी शक्ति त्राह्मी प्रति-क्रियात्मक संवेग है, जो संचर गति की प्रक्रिया के क्रम में संग्रहित होती है बौर जो केन्द्राप्रसारी गति को केन्द्रानुगामी गति में रूपान्तरित करती है। सुष्टि की इस केन्द्रानुगामी (केन्द्र की ओर जाने वाली) गति को प्रतिसंचर कहते हैं। इसलिए प्रतिसंचर अनेक से एक तक जाने की प्रक्रिया है, स्थूल से सूक्ष्म की ओर संश्लेषात्मक गति । पदार्थ से जीवन का अभिव्यक्त होने निम्नलिखित तीन परिस्थितियों के कारण मन का विकास के बाद होता है ।
(i) भौतिक संधर्ष – जीव की भौतिक देह और भौतिक वस्तुओं के मध्य संघर्ष ।
उदाहरण के लिए जब मछली को जल से निकाल कर जमीन की कड़ी सतह पर रखते हैं तब जमीन की कड़ी ततह और मछली के सुकोमल देह के मध्य संघर्ष का प्रादुर्भाव होता है। इसके परिणाम स्वस्थ्य मछली के मन में दर्द और बेचैनी का भाव जन्म लेता है। इसलिए मछली पात्ती में कूद जान की चेष्टा करती है, जिससे पुनः सुरक्षित जगह में चली जाय । सुरक्षा खोजने की यह जागृति और दुःखों के समाधान की खोज भौतिक संघर्ष के कारण उत्पन्न मानसिक विकास का लक्षण है। यह संघर्ष हुआ भौतिक वस्तुओं और भौतिक देह के मध्य ।
२. मानसिक संघर्ष – जोवित प्राणो के मन और मानसिक वस्तुओं के मध्य संधर्ष ।
उदाहरण के लिए-किताब पढ़ते हुए या वर्ग में अभिभाषण सुनते समय विद्यार्थी कठिन अररिचित शब्द पाते हैं, जिस शब्द का अर्थ उसे पता नहीं है। वह विद्यार्थी स्वयं उस शब्द के अर्थ लगाने का अनुमान करता है बा शब्द कोष में अर्थ कढ़ता है या किसी जानने वाले व्यवित से मिलकर उस कठिन शब्द, जो उसका सरदर्द था, का अर्थ जानता है। इसलिए यहाँ नए शब्द का जानना मानसिक संघर्ष से उत्पन्न मानसिक विकास है। हुआ । यह संधर्ष मानसिक देह (मन) और मानसिक वस्तु (शब्द) के मध्य
३. ब्रह्म (अनन्त) के लिए प्रबल अभिलाषा – ब्रह्म (अनन्त) के लिए अभिलाषा (वृहतैषण) उनके हो आकर्षण के कारण होता है। सार्वभौमिक या ब्राह्मी प्राण केन्द्र के आकर्षण के कारण ही ब्रह्मांड के प्रत्येक कण-कण में उनकी और अनुगमन करने की प्रवृति होती है। इसलिए विकास की प्रक्रिया जड़ से चैतन्य व जीव की ओर प्रवाहित होती है और जीव जगत में प्राणों से उच्चतर प्राणी की बोर यह क्षुद्र प्राणी से उच्च प्राणी और उच्च धारा चलती है। मानव प्राणी के हृदय में अनन्त की कामना का रहना ब्रह्म के आकर्षण का सुस्पष्ट लक्षण है। यह अनन्त कामना मनुष्य को आध्यात्मिक चलने के लिए प्रेरित करेगी और अन्ततः वह परम चैतन्य तक कर उसी में समाहित हो जाएगी। यह वृहत की आकांक्षा से उत्पन्न तसिक विकास का उदाहरण है ।
विकास के दो भेद हैं।
(i) क्रमिक (ii) उलम्फन
(i) क्रमिक विकास – मान लीजिए की जीव-जन्तुओं को क्रमागत खला के अनुसार अ, ब, स और द चार जीव है। यदि अ जाति के किसी व विशेष का मन क्रमिक रूप से विकसित होकर आगे बढ़ता है । अर्थात् म-क्रम से उच्च से निकटवर्ती उच्चतर अवस्था में प्रवेश करता है, तो । श्रमिक विकास कहेंगे ।
(B) उपजाति के किसी निश्चित प्राणी बहुतविक भौतिक और मानसिक संघर्ष के परिवेश में रहता है और उ चकी कायम विकास के सामान्यमिक कदम या कदमों को लगि लगाकर अधिक उच्चतर अवस्था में प्रवेश कर जाता है जैसे ‘ब’ से ‘ग’ या ‘द’ में ती इस विकासको उल्फन किया से उत्पन्न विकास कहते हैं। यही कारण है कि हम पालन के व्यवहार और जंगली पशुओं के व्यवहार में अंतर पाते हैं। यह उल्फन किया केवल पाओं के जीवन तक ही सम्भव है। मनुष्य स्तर प्राप्त हो जाने के बाद उल्फन क्रिया नहीं होती है क्योंकि पतन को सम्भावना रहती है। जिसे ऋणात्मक प्रति संचर कहते हैं। मन के मनुष्य और ब्रह्म के मध्य कोई अन्य अवस्था नहीं है, बल्कि मानव स्तर 1 स्थूल चिन्तन से ओत-प्रोत रहने के कारण और क्षेद्र प्रति रखने के कारण वह पश आणी या उससे भी नीचे यहाँ तक कि पत्थर की अवस्था तन् उसका अधःपतन हो जाता है। इस अधःपतन को ऋणात्मक प्रतिसंंच संचर में नहीं आ सकते हैं क्योंकि पशों के पास अपना स्वतन्त्र मन कहा जाता है। पश या मनुष्य से नीचे स्तर के प्राणी ऋणात्मक प्रति. (संलग्न छहम्) नहीं है, वे सीघ ब्राह्मी मन के सीधे निर्देश से चाक है। इसलिए पशुओं के द्वारा संस्कार ग्रहण करने का प्रश्न ही नहीं सिद्ध है। स्वभावतः वे पतन में अर्थात् ऋणात्मक प्रतिसंचर में नहीं जाते हैं।
इसलिए मनुष्य के स्तर की प्राप्ति कर लेने के बाद पतन को रोकने के लिए और अपने परम लक्ष्य की ओर गति को तेज करने के लिए आध्यात्मिक साधना की आवश्यकता होती है।
लेकिन एक प्रश्न सिद्ध है: मनुष्य का जन्म प्रतिसंचर घारा की प्रक्रिया में होता है। यह प्रक्रिया स्वतः चरम प्राणकेन्द्र अर्थात् ब्रह्म तक जाती है। इसलिए मनुष्य को स्वतः (स्वचालित रूप से) उस प्राण केन्द्र में मिल जाना चाहिए। अतः मनुष्य के लिए साधना की आवश्यकता कहाँ है? मनुष्य के पास हजारों पशु-योनि का संस्कार संचित रहता है, जिस योनियों में अटकते हुए मनुष्य स्तर तक बाया है उन सभी योनियों की पणु प्रवृत्तियों मनुष्यों को स्थूल शारीरिक भौतिक भोगों की ओर ढ़केलती है। अगर कोई मनुष्य इन पशु-प्रवृतियों के ढलकाव का शिकार बनता है तो उनका मन निम्नस्तरीय प्राणी या उससे भी नीचे पत्थर की अवस्था तक अद्यः पतित हो जाता है। इसलिए मनुष्य के लिए उनके मन की उर्ध्व ति को त्वरित करने के लिए तथा उनके पतन की सम्भावना को रोकने के लिए साधना अनिवार्य है।
यह साधाना एक आध्यात्मिक प्रचेष्टा है, जिसके द्वारा मनुष्यों को अपने चरम लक्ष्य पुरुषोत्तम तक जाना है।
इस तरह सृष्टि चक्र संचर से प्रतिसचर तक (एक से से एक तक) कभी न समाप्त होने वालो प्रक्रिया के रूप में अनेक और अनेक चलती रहती है।
