जब प्रउत आयेगा…
कुछ दिन पहले 15 नवंबर को, पूर्णिया प्रशासन द्वारा मेरे पिता जी की 119 वीं जयंती मनाई गई। मुझे एक कहानी याद आ गई, कि बाबा सर्वव्यापी हैं। उन्होंने मुझे मेरे पिता जी के साहित्यिक विचारों के बारे में अवगत कराया था। एक बार मैं भाषा के प्रयोग विषय पर अपने पिता ‘डॉ.लक्ष्मीनारायण सुधांशु’ के विचारों को जानना चाहता था। बाबा ने मुझे उनके प्रकाशित लेख को पढ़ने का सुझाव दिया, जो मेरे पिता के विशाल पुस्तकालय में उपलब्ध था। मैने अपनी पुस्तकालय की पुस्तकों में (जो मुख्य रूप से कई प्रतिष्ठित लेखकों की पुस्तकों की संग्रह थी) उनके व्याख्यानों को खोजने का प्रयत्न किया, लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली। तब बाबा ने मुझे उस विशेष पुस्तक का सही स्थान बताया, जिसमें मेरे पिता का व्याख्यान प्रकाशित हुआ था। बाद में मैने उन भाषणों की प्रति को तलाशा। बाबा ने जहां पर संकेत किया था, वह पुस्तक ठीक वहीं मिली। आप कल्पना कीजिए कि, दस – बारह हजार किताबों के बीच वह सर्वदर्शी आँखें देख रही थीं।
उस पुस्तक में काशी नगरी प्रचारिणी सभा के हीरक जयंती के अवसर पर दिया गया उनका अध्यक्षीय भाषण था। उसी अवसर पर माननीय राजश्री पुरुषोत्तम दास टंडन ने काशी नगरी प्रचारिणी सभा की ओर से पिता जी को साहित्यिक वाचस्पति की मानद उपाधि से अलंकृत किया था। दूसरा भाषण ‘राष्ट्र भाषा प्रचार समिति’ वर्धा गुजरात में दिया गया भाषण था, जिसमें उन्होंने भारत की भाषा नीति पर अपने विचार प्रकट किए थे। अपने व्याख्यान में उन्होंने इस बात की वकालत की थी, कि सभी सरकारी लेखन कार्यों में स्थानीय भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए । जबकि स्थानीय क्षेत्र से बाहर के लोगों से बात करते समय अंग्रेजी या हिंदी में से जो भी संचार केलिए सुविधाजनक हो, उसका प्रयोग किया जाना चाहिए। बाद में राजकमल प्रकाशन दिल्ली ने संपर्क भाषा हिंदी नाम से पुस्तक का प्रकाशन किया था, जिसमें कुछ अन्य भाषणों का भी संकलन था। बाबा बड़े ही सहज थे और मुझे कुछ और पूछने के लिए प्रेरित भी कर रहे थे। अपने लौकिक पिता से फिर भी कुछ संकोच होती थी, लेकिन परम पिता बाबा से मानो कोई संकोच नहीं । कितना दिव्य और आत्मीय वातावरण था ! आज मैं जब उन बीते पलों को याद करता हूँ तो सभी दृश्य सजीव हो उठते हैं और मन एक अव्यक्त आनंद से आप्लावित हो उठता है। फिर मैने बाबा से पूछ बैठा कि, बाबा जब प्रउत आयेगा तब हमारी सारी जमीनें संपत्तियां छीन लीं जाएंगी ? उस समय प्रउत के बारे में थोड़ा सा सुना भर ही था। मुझे प्रउत के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी और इस पर प्रकाशित कोई पुस्तक भी नहीं थे। मेरे मासूम से प्रश्न को सुन कर बाबा हंसने लगे थे। “अभी भी उस हंसी को महसूस कर पा रहा हू । “कितना वात्सल्य…..! कितनी मधुरता….!! कितना महान आश्वासन था उस हंसी में…..!!!” मैं व्यावहारिक विषयों में अनभिज्ञ महज पच्चीस – छब्बीस साल का एक लड़का था। बाबा से क्या पूछना चाहिए, क्या नहीं, वह भी नहीं मालूम था। मन में जो बात आई वो मुंह से निकल गई। बाबा ने बड़े प्यार से समझाया। बाबा बोले कि प्रउत ने तो सभी आवश्यकताओं की गारेंटी दी है, फिर क्यों आदमी संग्रह के जंजाल में फंसे ? उससे क्या फायदा ? इसमें वक्त बर्बाद करने के बदले मनुष्य मानसिक विकास की ओर अग्रसर होगा। कितनी मूल्यवान निधियां हैं, जिन्हें हमे पाना है ! केवल भौतिकता में अटक कर मूल्यवान समय को बर्बाद कर देना उचित तो नहीं। सभी सुविधाओं के साथ भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की गारेंटी तो प्रउत देता ही है। अगली फसल के आने तक उपभोग के लायक अन्न का संग्रह और अगली खेती के लायक पूंजी के संग्रह के अतिरिक्त और क्या जरूरत है जी ! बाकी समय में मानसाध्यात्मिक प्रसार की दिशा में मनुष्य आगे बढ़ेगा तो अनेकों मूल्यवान निधियां उन्हें प्राप्त होंगी। तुमलोग उन्हीं मूल्यवान निधियों को प्राप्त करने केलिए समाज को प्रेरित करने संसार में आए हो।
द्वारा : प्रद्युम्न नारायण दादा
