प्रभात संगीत नंबर-1970

 

तुमि एसे छिले  मोर मनोबने

आमि बसे छिनु आनमने

तुमि चयेछिले मोर मुखपाने

आमि की भेबेछि के ता जाने

तोमार आमार माझे दुस्तर

छिलो नाको कोन बाधा दुर्धर

तबु आमि काछे आसिते पारि नि

दूर  थेके गेछिअभिमाने

प्रशांत छिलो तोमार आनन

अश्रुसिक्त मोर दु नयन

तबु आमि आंखि मुछिते पारि नि

मिशिते पारित नि तब प्राणे

 

भावार्थ—

हे प्रियतम,तुम मेरे मन वृन्दावन में आये और मैं अनमनी सी बेसुध बैठी रही।तुमने मेरी तरफ देखा था,लेकिन  मैं क्या सोच रही थी,यह कोई  नहीं जानता।मैं तो खुद भी अपने से भूली सी थी।

तुम्हारे और मेरे बीच कोई  बाधा नहीं थी,फिर भी मैं तुम्हारे पास नहीं आ सकी।मेरी अस्मिताबोध ने ही मुझे तुमसे दूर कर रखा था।मैने देखा था,तुम्हारा मुखमंडल कितना शांत था!और तुम मुझे एकटक निहार रहे थे।कितनी करूणा और कितना प्यार भरा था तुम्हारी उन नजरों में।मेरी आंखें आंसुओ से भरी थी।किन्तु हाय,मुझ मानिनी  को मेरे मान ने ही तुझसे दूर कर रखा था।लेकिन ,मेरे प्रियतम,बताओ तो तुम्हारे मान से ही तो मैं मानिनी हूं।इतना सा द्वैत भी तुझे स्वीकार नहीं?मैं हतभागी, मेरी आंखों पर आंसुओं की परते ही मेरी बैरिन हो गई। उन आंसुओं को पोछकर तुझमें विलीन न हो सकी।

प्रद्युम्न दादा जी द्वारा अनुवादित