तुमि एसे छिले मोर मनोबने
आमि बसे छिनु आनमने
तुमि चयेछिले मोर मुखपाने
आमि की भेबेछि के ता जाने
तोमार आमार माझे दुस्तर
छिलो नाको कोन बाधा दुर्धर
तबु आमि काछे आसिते पारि नि
दूर थेके गेछिअभिमाने
प्रशांत छिलो तोमार आनन
अश्रुसिक्त मोर दु नयन
तबु आमि आंखि मुछिते पारि नि
मिशिते पारित नि तब प्राणे
भावार्थ—
हे प्रियतम,तुम मेरे मन वृन्दावन में आये और मैं अनमनी सी बेसुध बैठी रही।तुमने मेरी तरफ देखा था,लेकिन मैं क्या सोच रही थी,यह कोई नहीं जानता।मैं तो खुद भी अपने से भूली सी थी।
तुम्हारे और मेरे बीच कोई बाधा नहीं थी,फिर भी मैं तुम्हारे पास नहीं आ सकी।मेरी अस्मिताबोध ने ही मुझे तुमसे दूर कर रखा था।मैने देखा था,तुम्हारा मुखमंडल कितना शांत था!और तुम मुझे एकटक निहार रहे थे।कितनी करूणा और कितना प्यार भरा था तुम्हारी उन नजरों में।मेरी आंखें आंसुओ से भरी थी।किन्तु हाय,मुझ मानिनी को मेरे मान ने ही तुझसे दूर कर रखा था।लेकिन ,मेरे प्रियतम,बताओ तो तुम्हारे मान से ही तो मैं मानिनी हूं।इतना सा द्वैत भी तुझे स्वीकार नहीं?मैं हतभागी, मेरी आंखों पर आंसुओं की परते ही मेरी बैरिन हो गई। उन आंसुओं को पोछकर तुझमें विलीन न हो सकी।
प्रद्युम्न दादा जी द्वारा अनुवादित
