उत्तर-पूर्व भारतीय सभ्यता का इतिहास – श्री पी. आर. सरकार
अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित
गंगा यमुना सरस्वती घाटी सभ्यता।
चंद्रशेखर आजाद पार्क, इलाहाबाद:
प्राचीन काल मेंभारतवर्ष एक विशाल देश था।इसके उत्तरी छोर पर अक्षय चीन, दक्षिणी छोर पर कन्याकुमारी,पूर्व में प्रागज्योतिष पुर और पश्चिम में कन्धार था।इस क्षेत्र को टुकड़ों में बांट दिया गया और आज यह काफी छोटा हो गया है।यहां न केवल क्षेत्रीय विभक्तिकरण हुआ बल्कि धार्मिक क्षेत्र में भी विभक्तिकरण हुआ।हिन्दू जाति और मुसलमान जुलाहों, का समान इतिहास था।हिन्दूओं, मुसलमानों और ईसाइयों के इस क्षेत्र में समान सभ्यता और संस्कृति का स्वरूप था, किन्तु उसे क्षेत्र में भी विभक्ति कारण हुआ।विभाजनि शक्तियां अभी भी कार्यरत हैं और भारत दोनों दृष्टियों से और भी छोटा हो सकता है।भोजपुर क्षेत्र में भोजपुरी और बघेल क्षेत्र में बघेली भाषा उदाहरणार्थ सब की सामान्य..है
और यदि इस भाषा को महत्व दिया गया होता तोहिन्दी, उर्दू, भाषा आदि के नाम पर यह विभाजन जो आज दिखाई दे रहा है नहीं होता।ऐसे ही सभ्यता और सांस्कृतिक विरासतों की ऐतिहासिक दृष्टि को प्रोत्साहित करके व्यापक एकता की स्थापना आज भी संभव है।सम्मिश्रण किंबा समन्वय इस देश की आत्मा है- वर्गवर्ण ,धर्ममत, भासागत विभिन्नताओं के बावजूद अन्तर्निहित सभ्यता और संस्कृतिजन्म एकता मानवता की अमर अन्त: सलीला आज भी प्रवाहित है।उसे प्रोत्साहित करके व्यापक एकता के वृक्ष के पुष्पित पल्लवित किया जा सकता है।
भारत ही एक ऐसा देश है जहां अनेक प्रजातियाॅ एक साथ सम्मिश्रित हुई है। गोरे और काले के साथ लम्बें और नाटे एक साथ मिलजुल गए हैं।पाॅचो पाण्डव गोरे थे, जबकि द्रौपदी साॅवली थी। तुर्क लोग ठिगने थे जबकि अफगानग लोग लम्बे थे।कुछ शिया लोग सांवले हैं तथा बाकी दूसरे गोरे हैं। काली और गोरी चमड़ी वाले दोनों लोग ही तथा कथित उच्च जातियों में या निम्न जातियों में हो सकते हैं। यह सभी लोग भारतीय हैं।भारत की सम्पूर्ण सांस्कृतिक परिदृश्य एक है। इस प्राचीन देश के सांस्कृतिक विरासत, सांस्कृतिक परिदृश्य मानवता की आन्तरिक भावना पर आधारित भूमिगत एकता से बनी है। इस पर बल दिए जाने से पृथकवादी मानसिकताएं समाप्त हो सकती है।
गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ कम्पनी बाग में ताड़पत्र पर लिखित 50,000 पाण्डुलिपियों को देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई और कुछ पाण्डुलिपियाॅ मैथिली लिपि में और कुछ तिरहुतिया लिपी में देखकर–तिरुहुतिया लिपि कौशाम्बी के श्री हर्षलिपी का परिवर्तित रुप है।
कौशाम्बी की श्री हर्ष लिपि के तीन परिवर्तित रूप हुए, तिरहुतिया, गोडीय और उत्कल। तिरहुतिया अब प्रचलन में नहीं है।नेपाल में प्रचलित मदेशी या मध्यदेशी लिपि तिरहुतिया लिपि की अनुषंगी स्वरूप है। परिवर्तित नेवरी इस लिपि में लिखी जाती थी।
गोरखाली भाषा देवनागरी लिपि में 1773 के बाद नेपाल में सासकीय भाषा होगई इसी काल में पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल विजय किया था। इलाहाबाद के उत्तर शारदालिपि और दक्षिण कुटिला लिपि लोकप्रिय हुई।दोनों का प्रारंभ लगभग 2000 वर्ष पूर्व हुआ था, किन्तु बाद में कुटिला लिपि लोकप्रिय थी ।कुटिला तिरहुतिया,उत्कल और गौडीय रूप में परिवर्तित हो गई। मैथिली में भाषा में प्रथम पुस्तक वर्ण रत्नाकर ज्योतिरीशर ठाकुर द्वारा तिरहुतिया लिपि में लिखा गई विद्यापति के भी पूर्व की यह पुस्तक पूर्वी भारत की प्राचीन पुस्तक जनभाषा में है।श्री हर्ष महाराजाधिराज की राजधानी की कौशाम्बी थी जिनके ही नाम पर कुटिला लिपि को प्रसिद्धि प्राप्त हुई ।कोशाम्बी सरस्वती नदी के किनारे स्थित थी।चर्मण्वती नदी दक्षिण से और दृशदूनी पशिचम सेदोनों ही आकर सरस्वती में मिली जो गंगा और जमुना में प्रयाग के निकट आकर मिल गई थी। लगभग 1200 वर्ष पूर्व भूकंप के कारण सरस्वती नदी का पेट ऊपर उठ गया और सरस्वती नदी का अस्तित्व समाप्त हो गया।परिणामस्वरुप चर्मन्वती जो चम्बल नदी नाम से जानी जाती है यमुना में और दृशदूती नदी जिसे घर्घर-घाघरा के नाम से जाना जाता है। रीवा के निकट सोन में मिल गई।कौशाम्बी का महत्व सरस्वती के लुप्त होने से समाप्त हो गया क्योंकि प्राय: सभ्यवताओं का मध्यवर्ती स्वरूप नदियों की उपत्य का में पनपता है।बावजूद इस घटना के श्री हर्षलिपि इलाहाबाद से आसाम तक फैली थी ना गरी लिपि पश्चिमी, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में प्रचलित थी।नागरी लिपि का भाषागत और सांस्कृतिक महत्व विशेषत: लक्षणीय रहा है।राजस्थान, हरियाणा, पश्चिम, उत्तर प्रदेश और प्रयाग तक महिलायें घाघरा पहनती थी।किन्तु इसके अतिरिक्त साडियों का प्रचलन था।
सभ्यता और संस्कृति (Culture) एक व्यापक शब्द है जिसमें सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक स्थितियां (भाषा और लिपि , वेशभूषा) सभी कुछ महत्व रखती है।
प्राचीन भारतीय भाषाओं की सुरक्षा के लिए लिपि विज्ञान (Scriptology)जो भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अभिन्न भाग है, एक अलग विषय के रूप में विद्यालयों में पढ़ाया जाना चाहिए।
3फरवरी, 1984
कम्पनी बाग:
कम्पनी बाग संसार के बड़े-बड़े पार्कों में सबसे बड़ा था और इसका बहुत अंसआवासीय उपयोग में आ गया है। यह लगभग 180 एकड़ के भू भाग में फैला था। इसका संरक्षण तो हो रहा है किंतु उचित ढंग में विकास नहीं किया जा रहा है।आने का आने के ग्रीष्मकालीन और।विषुवदीय वृक्ष और पौधों को पौधे को यहां स्थान मिलना चाहिए। सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में सिल्क उपादान के लिए उपयुक्त वृक्ष लगाना चाहिए और।जब जापान शुद्ध और कृत्रिम सिल्क उत्पादन सम्बन्धी कारखाने लगा सकता है तो भारत क्यों नहीं जबकि यहां तन्तुओं का अच्छा खास समुदाय अभी भी है?रेशम के कीड़े शहतूत पेड़ पर बढ़ते हैं। इसकी लकड़ी खेल के समान बनाने में उपयुक्त है। तीन प्रकार के गैर शहतूत रेशम है। तसर,एण्डी और मूंगा,निसर कीडे सकवा या पेड पर,एण्ड किडे एण्डी पर मुगां कीडे समाजात के पेड़ पर बढ़ते हैं।
4फरवरी, 1984
प्रयाग:
चूंकि यमुना नदी काली मिट्टी से होकर गुजरती है। इसलिए नदी का पानी हल्का नीला जैसा दिखता है। गंगा नदी पीली मिट्टी से होकर बहती है। इसीलिए इसका रंग सफेद सा दिखता है। कृष्ण के द्वैपायन के पितामह मछुआरा थे तथा यमुना क्षेत्र के उसे पार में काली मिट्टी पर स्थित एक द्वीप ग्रह में रहते थे।काली मिट्टी से द्वीप पर जन्म होने से उन्हें कृष्ण द्वैपायन के नाम से जाना जाता था। गंगा के उस पार के क्षेत्र में।बोलचाल की भाषा अवधि और ब्रज के जबकि यमुना नदी के दक्षिण में लोग बुन्देली ,अवधि बोलते हैं ब्रज और बुन्देली शैरसेनी प्राकृत की शाखाएं है।ब्रह्मा व्रर्त के ऊपरी भाग की शाखाअओं ब्रज, अवधि ,बघली, बुन्देली और हरियावी में भाषा वैज्ञानिक सामानएता है। विषय में लिंग और वचन में परिवर्तनों के अनुसार क्रिया विभक्तियां बदल जाती है।प्रयाग एक समय आर्यों का सांस्कृतिक केंद्र था। जब आर्य आगे बढ़े तो काशी वाराणसी सम्पूर्ण देश का सांस्कृतिक केंद्र बन गया और यह अभी तक बना हुआ है। नाव जब संगम स्थित किला पाण्डेवों के समय का साखी रहा है, अक्षयबट भी पुराना है।
गंगोत्री और यमुनोत्री से शुरू गंगा और यमुना की बीच की भूमि को वैदिक काल के दौरान ब्रह्मावर्त कहा जाता था तथा बाद में महाभारत काल के दौरान सुरसेन के नाम से जाना जाता गया था।
महाभारत काल के पूर्व इसी की राजधानी वृश्नीपुर थी। गंगा और यमुना के बीच की दूरी जहां 10 मिला के कम थी, उसे स्थान का नाम था। बिन्ध्यमेखला।बिन्धयमेखला दो भागों में विभाजित हो जाती है।
पश्चिम दिशा के भाग को बुन्देलखण्ड कहा जाता था। पूर्वी दिशा के भाग को बघेलखण्ड कहा जाता है।कौशाम्बी या ऐतिहासिक महत्व का स्थान है। प्राचीन काल में सभ्यताएं नदी घाटियों के आस-पास उन्नत थी। कौशांबी सरस्वती के किनारे पर उन्नत हुई थी। यहां थेरापन्थी जैन मत का बहुत बड़ा केन्द्र था जब सरस्वती नदी का तल उठने के कारण नष्ट हो गई। तब कौशाम्बी ने भी अपना महत्व खो दिया।
प्रयाग 6 फरवरी,1984
