आधुनिकता हमारे लिबास में नहीं विचारों में होनी चाहिए

डॉ. शान्ति सुमन, समस्तीपुर

कपड़ों के प्रति सामाजिक नज़रिये ने विभिन्न नियमों और सामाजिक रिवाज़ों को जन्म दिया है जैसे– शरीर को ढक कर रखना और सार्वजनिक रूप से अधोवस्त्र नहीं दिखाना। आजकल इन सामाजिक मानदंडों के खिलाफ प्रतिक्रिया या विद्रोह का एक परंपरागत रूप बन गया है। समय के साथ-साथ पश्चिमी समाजों ने धीरे-धीरे कार्यस्थल व स्कूल में अधिक आरामदायक और आनंद के लिए वेशभूषा संहिता को अपनाया है। महिलाओं के पहनावे में बदलाव, सभ्यता के बदलाव से संबंधित है, जो हर थोड़े समय में फैशन के नाम पर बदलता रहता है। पहनावा सभ्यता का अभिन्न अंग है। विचारणीय है कि कर्मेंद्रियों के द्वारा हम जो भी काम करते हैं वही सभ्यता है। पहनावा हमारे चक्षुओं को आकर्षित करता है। हम जहां नए फैशन के परिधान पहनते हैं तो लोगों के भीड़ से अलग दिखते हैं। हर इंसान की बुनियादी भावना होती है कि ऐसी बातों पर वह ज़्यादा आकर्षित होता है।

आजकल हो यह रहा है कि फैशन के नाम पर लड़कियां ऐसे-ऐसे कपड़े पहन रही हैं जिसमें तन कम ढंकता है और दिखता ज़्यादा है। इतने छोटे कपड़े पहनते हैं कि उनके प्राइवेट पार्ट दिखने का मौका रहता है जैसे– लो-वेस्ट के जींस या शॉर्ट-शर्ट, जिसके पहनने से फूहड़ता झलकती है। ऐसे कपड़े विदेश में चलते हैं क्योंकि उनके समाज में ऐसी बातों का बुरा नहीं मानते हैं। लेकिन हमारे देश के समाज में अब भी यह चीज़ वर्जित है। कोई भी देश उसके समाज के द्वारा बनाए गए नियमों के हिसाब से ही चलता है। इसलिए कपड़े वह पहनें जो परिष्कृत हो और फूहड़ता नहीं झलके।

कहीं भी, चाहे सिनेमा में ही क्यों ना हो, तुरंत उन परिधानों में स्वतः को काल्पनिक रूप से लोग देखने लगते हैं। चाहे वह परिधान अपने समाज के अनुरूप हो या ना हो। यही कारण है कि हम सिनेमा सूचना प्रौद्योगिकी तथा प्रवासी के द्वारा पहने गए पहनावे से प्रभावित होकर वैसा ही पहनने लगते हैं। फिर भी हम राग अलापते हैं कि हम अपनी संस्कृति से प्यार करते हैं। कभी हमारे यहां घूंघट का प्रचलन था जो सही नहीं था। वहीं आज छोटे कपड़ों का प्रचलन है और वह भी सही नहीं है। आकलन किया जाए तो संयुक्त परिवारों का एकल परिवारों में तब्दील होने के कारण में से यह भी एक कारण है। नई बहू आधुनिक परिधानों को पहनना चाहती है। अविवाहित बच्चे भी इससे बचे हुए नहीं है। मां-बाप आजकल समझौता करते हुए उनके राहों को ही अपना रहे हैं।

संस्कृति और परिधान का तालमेल बहुत पुराना है। किसी देश की संस्कृति को जानना है तो वहां के दैनिक जीवन के तौर-तरीके और वेशभूषा को देखकर वहां की सभ्यता और संस्कारों का काफी हद तक अंदाज़ लगाया जा सकता है। मुख्य रूप से भारतीय परंपरा और संस्कृति इस मामले में सर्वोत्तम रही है। लेकिन आज के परिवेश में संस्कृति की धज्जियां उड़ाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है। विशेष रूप से विदेशी वेशभूषा का नितांत बिगड़ा स्वरूप जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों में भारत को अपने रंग में रंगता जा रहा है, उससे होने वाली भारत की संस्कृति के ह्रास को देख मन दुखी हो जाता है।

परिधान व्यक्तित्व का परिचायक है। भविष्य में संस्कृति को बचाए रखना मुश्किल होगा। इसको बचाने के लिए बीच के पीढ़ी को मजबूती से बांधकर रखना होगा। लड़के हों या लड़कियां, उनके वस्त्र शालीन होने चाहिए क्योंकि नग्नता अच्छी बात नहीं है। वह भी सार्वजनिक तौर पर क्योंकि कोई भी इंसान कपड़े पहनकर जनता के बीच जाएगा। सबसे पहले लोगों की नजर वहां जाती है जहां कुछ अलग दिखता है। जहां कोई लड़की ऐसे कपड़े पहन कर जाए जिससे अंग प्रदर्शन हो रहा हो तो किसी भी इंसान की नज़र वहां अनायास चली जाएगी क्योंकि वह लोगों को भीड़ से अलग दिख रही होती है।

आपकी पहचान आपकी फूहड़ता है या फिर आपकी पहचान भारतीयता है? आप आधुनिक हैं या अंधानुकरण करने वाले नकलची? आधुनिकता सोच में होनी चाहिए, नग्नता में नहीं। यहां तक की विदेश में साड़ी को बेहद पसंद किया जाता है। ऐसे में साड़ी को ‘स्मार्ट कैजुअल’ की श्रेणी में रखना अजीब सा लगता है। आजकल कंफर्ट के लिहाज से रेडी टू वियर साड़ी भी आ गई है। प्राकृतिक जीवन के सिद्धांत को देखा जाए तो पोशाक के संबंध में हमारे मनीषियों को इसकी गहरी समझ थी। वह इसके मनोवैज्ञानिकता को जानते थे कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए वायु और सूर्य के प्रकाश का हमारे देह से जितना संपर्क होता रहे उतना ही अच्छा है।

स्त्रियां आजकल तंग वस्त्र पहनती हैं तो इनके रोम छिद्रों से ऑक्सीजन ग्रहण नहीं की जा सकती है, जिसके परिणाम स्वरूप त्वचा में मेलानिन का स्तर गिरने लगता है। तंग वस्त्र कई रोगों के कारण बन जाते हैं। जांघ और बाजू पर अधिक तंग वस्त्र– तनाव, अनिद्रा, अवसाद, मोटापा और अल्सर का कारण बन जाता है। नाभि पर तंग कपड़ों से गैस, कोलाइटिस, कब्ज, बवासीर आदि हो सकते हैं। छाती पर तंग वस्त्र हृदय रोग, श्वास फूलना आदि का कारण बन सकते हैं।

महिलाएं अपनी शक्ति को पहचान कर अपनी बुद्धि बल से अन्याय और आतंक का खात्मा भी कर सकती हैं। मातृशक्ति ही नारी शक्ति है इसमें मां, बहन, पत्नी और बेटी का समावेश है। अतीत में भी नारी ‘सहनशीलता’ की झील थी। वर्तमान में समर्थ शक्ति और शौर्य शक्ति का प्रवाहमान सरिता है। पुरुष समाज अपनी दमनकारी व्यवस्था से इन्हें अपमानित करते आ रहे हैं लेकिन कुरीतियों के कटघरे से अपनी सहनशक्ति की सीमा को लांघकर अन्याय के खिलाफ स्त्री लड़ रही है। अपने महान उद्देश्य की ओर ही ध्यान देना अनिवार्य है, ना कि अपनी रहन-सहन व वेशभूषा को लेकर लोगों के गंदी नजरों को आकर्षित करना। अपने ज्ञान, विज्ञान, सृजन व साहस के बल पर चुनौतियां के लिए चुनौती और बाधाओं के लिए बाधा बनकर लड़ना है।

स्वामी विवेकानंद पहली बार शिकागो यात्रा पर जब गए तो धोती-कुर्ता और सर पर पगड़ी बांध रखी थी। एक सूट-बूट पहने अमेरिकी ने विवेकानंद जी से पूछा– “तुमने यह कौन सी ड्रेस पहन रखी है? मेरे कपड़े देखो कितने शानदार हैं।“ इस पर विवेकानंद जी ने कहा–“मेरी पहचान मेरे कपड़ों से नहीं बल्कि मेरी पहचान मेरे देश की संस्कृति से है।“ यह हमारे लिए सोचनीय प्रश्न है–हमारी संस्कृति कहां जा रही है? आज स्टाइल के नाम पर कटे-फटे और अंग प्रदर्शित करने वाले कपड़े पहनकर लोग सभ्य बन रहे हैं या फिर अपनी फूहड़ता का परिचय दे रहे हैं?

श्री प्रभात रंजन सरकार ने महिलाओं के पोशाक के बारे में लिखा है कि– “अपनी सुविधानुसार अपनी पसन्द की पोशाक-परिच्छद व्यवहार करोगे। पोशाक-परिच्छद सर्वदा परिष्कृत रखोगे जिससे तुम्हारी पोशाक देखकर लोग तुम्हारे बारे में अकारण हीन धारणा न कर लें।

महिलाएँ घर से बाहर निकलते समय खूब साधारण और सादी पोशाक पहनेंगी। शरीर को अच्छी तरह ढँककर बाहर निकलेंगी। उत्सव इत्यादि के समय अथवा साथ में पुरुष अभिभावक के रहने पर या सुरक्षा की अच्छी व्यवस्था रहने पर पोशाक सम्बन्धी कठोरता कुछ शिथिल की जा सकती है।…”

 

डॉ. शान्ति सुमन, समस्तीपुर