तारक ब्रह्म– तंत्र ही साधना : साधना ही तंत्र

श्री पी. आर. सरकार

अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित

जब पुरुषोत्तम अपने ओतः योग से अणुजीव के मानसदर्पण में प्रतिबिम्बित होते हैं, तब अणु संरचना के पुरुष सत्ता अर्थात चितिशक्ति प्रतिसञ्चर धारा में अभिव्यक्ति और रूपान्तरित होते रहते हैं। इस प्रतिसञ्चर धारा के द्वारा चिरकरुणामय परमपुरुष विद्यामाया की सहायता से प्रत्येक अणु संरचना को सूक्ष्म से सूक्ष्मतर पथ पर परिचालित करते हुए उन्नत कर देते हैं-यह पहले ही कह चुका हूँ। भौतिक तथा मानसिक संघर्ष के साथ वृहत के आकर्षण के अनिवार्य परिणामस्वरूप अणुमानस में व्यापनशीलता आती है और अन्ततोगत्वा अणुमानस आध्यात्मिक साधना के माध्यम से चरम विमुक्ति अर्थात मोक्ष प्राप्त करता है। भिन्न-भिन्न अणुमानस प्रतिञ्चर की धारा में, व्यष्टिगत प्रगतिभेद के अनुरूप ही, परिवर्तन के विभिन्न स्तरों में परमपुरुष का अगाध स्नेह-प्यार तथा सान्निध्य विभिन्न मात्राओं में अनुभव करते रहते हैं। इस प्रकार चलते हुए एक दिन अणुजीव के जीवन में ऐसा एक शुभ मुहूर्त आता है, जब वह अपने अस्तित्व में असीम, अनन्त आनन्दघन सत्ता के आविर्भाव की उपलब्धि प्राप्त करता है और प्रकृति के सारे बन्धन चूर्ण-विचूर्ण हो जाते हैं व परमपद प्राप्त करता है। परमपद प्राप्त ऐसे ही सिद्ध साधक, मानव जाति के लिए, एक गौरवोज्ज्वल दृष्टान्त स्थापित कर जाते हैं। इसके बदले मानव जाति उनके प्रति आन्तरिक भक्ति का अर्ध्य प्रदान करती है। सम्बोधिप्राप्त ऐसे पुरुष ही केवल ‘महापुरुष’ की भाँति अभिहित होने के योग्य होते हैं क्योंकि ‘महापुरुष’ का अर्थ होता है मानसिक प्रगति के विचार से उच्चावस्थाप्राप्त मनुष्यविशेष। उनके पवित्र चरणकमलों में मनुष्य अपने हृदय की भक्ति-श्रद्धा का पुष्पार्ध्य प्रदान कर धन्य होते हैं। इन महापुरुषों को स्थूल जागतिक फूल-चन्दन-उपहार के प्रति लेशमात्र भी स्पृहा नहीं रहती।

इन महापुरुषों के आविर्भाव की अवतार-तत्त्व के रूप में धारणायें की जाती रही हैं। ‘अवतार’ की धारणा एक युक्ति-वर्जित कल्पना मात्र है। यह समस्त विश्व ब्रह्माण्ड, परमपुरुष के द्वारा सृष्ट हुआ है। अतः यथार्थ विचार से यह समग्र विश्व ही उनका अवतरण अथवा Incarnation है। अवतार शब्द का अर्थ है व्युत्पत्ति अर्थात् जो किसी सत्ता से व्युत्पन्न या अवतीर्ण होता है। अतः जो समस्त अणु सत्ताएँ प्रतिसञ्चर धारा प्रवाह में सर्वोच्च उन्नति प्राप्त कर चुके हैं, मात्र उन सबों के लिए ‘अवतार’ शब्द का प्रयोग बहुत ही विभ्रान्तिकर है। विराट् भूमा सत्ता प्रत्यक्ष भाव से किसी एक अनुसंरचना में विशेष कर नर देह में, अपने आप को रूपान्तरित करेंगे इस प्रकार की धारणा ही युक्ति ज्ञान से रहित है। परमपुरुष की विश्व-सृष्टि में, मनुष्य ही सबसे अधिक विकसित अणु जीव है और मानसिक विचार से उन्नत महापुरुष लोग पहले सञ्चर फिर प्रतिसञ्चर धारा प्रवाह के फलस्वरूप मानसिक क्रमविकस की एक अवस्था विशेष मात्र हैं। अणु मानस की यह प्रगति धीरे-धीरे क्रमिक रूप से होती है। यह कोई आकस्मिक अवतरण नहीं है।

यदि युक्ति की भाषा में कहा जाय तो कहेंगे कि प्रत्येक अणु चैतन्य को ही परमपुरुष का अवतरण कहना अधिक संगत है। अथवा कह सकते हैं कि परमपुरुष के प्रतिनिधि (Messenger of God) सञ्चर धारा में बढ़ते हुए, विवर्तन और सम्मान के रास्ते पर आगे निकल जाते हैं, फिर प्रतिसञ्चर धारा में मानसिक व्यापनशीलता (Psychic Dilation) के द्वारा अधिरोहण के विभिन्न स्तरों पर जा पहुँचते हैं। प्रचलित विश्वास के अनुसार अवतारवाद का अर्थ हुआ सर्वशक्तिमान परमेश्वर का प्रत्यक्ष रूप से इस धूल की बनी धरती पर नरदेह में सीधे उतर कर नीचे चला आना। इस अवतार पुरुष के अलावा अन्य जो भी हैं उनकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में कोई व्याख्या उपलब्ध नहीं। वास्तव में अवतार का अर्थ हुआ जो उतर कर (नीचे) आया हो, जिसका उद्भव हुआ हो, अथवा जो विकृत हुआ हो। पुरुषोत्तम की विकृतिप्राप्त अवस्था ही यदि अवतार हो- यदि इसी प्रकार के डॉगमा व भाव जड़ता को ही मान लिया जाय तब ये ‘अवतार’ तो पुरुषोत्तम के समान मर्यादा पा ही नहीं सकते। जब अणुमानस का मानस धातु व्यापनशीलता प्राप्त करते-करते भूमामानस का सारूप्य प्राप्त कर लेता है, तब स्वभावतः ही अणुमानस भूमा मानस में विलीन हो जाता है। वहाँ द्वेत भाव का कोई अवकाश ही नहीं रह जाता। तभी तो, ब्रह्मचक्र के किसी अवस्था विशेष में, पुरुषोत्तम के समान मर्यादा सम्पन्न किसी अन्य पृथक् सत्ता के अस्तित्व की कल्पना करना ही कितना युक्ति संगत होगा? अतः पूरा का पूरा अवतारवाद ही युक्ति की कसौटी पर टिक नहीं पाता है, बौद्धिकतापूर्ण आलोचना के योग्य भी नहीं है।

अवतारवाद की इस त्रुटिपूर्ण व्याख्या और विश्वास के पीछे एक सामाजिक कारण भी निहित है। इस अवतारवाद के प्रचार और प्रसार के पीछे कायमी स्वार्थ का हाथ है। अनुसन्धित्सा (Inquisitiveness) और युक्ति की कसौटी पर सब कुछ को परखकर विचार करना मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रवणता है। विभिन्न अवस्थाओं के चाप और बौद्धिक जागरण के फलस्वरूप समाज में प्रचलित बहुतेरे युक्ति-ज्ञान रहित अन्धविश्वास तथा कुसंस्कारों के विरुद्ध एक भीषण प्रतिक्रियात्मक आन्दोलन शुरु हुआ था। इसी कुसंस्कार तथा अन्धविश्वास ने समाज में दूसरों के रक्त और श्रम से अपना जीवन निर्वाह करने वाले बौद्धिक परजीवी लोगों को समाज का शोषण करने के लिए एक मजबूत आधार तथा बड़ा सुयोग प्रदान किया था। समाज को अन्ध-कुसंस्कारों के गोरखधन्धों में फँसाकर अपने शोषणकारी कार्यकलापों को बनाये रखने हेतु, ये परजीवी, मनुष्य के स्वाभाविक प्रतिक्रिया तथा बौद्धिक युक्तिवाद के अभ्युदय के अंकुर को ही दबाये रख कर नष्ट कर देने के लिए, तरह-तरह के उपाय आविष्कार किये थे। उन्होंने जनगण के पास से उनकी मानसिकता को समझकर सेण्टिमेण्ट को भली-भाँति परखकर इस प्रकार के अवतारवाद का प्रचार किया था। इस अवतारवाद का प्रचार कर, तथाकथित दैवशक्ति का नाम देकर उन्होंने समाज के ऊपर थोप दिया था। ईश्वर के नाम पर व्यापक दुर्नीति चल चुकी थी। जो इस प्रकार की समस्त युक्तिहीन आदेशों, निर्देशों अथवा मतवादों के विरुद्ध सिर ऊँचा कर उठ खड़े हुए थे, उन्हें प्रतिक्रियावादी, नास्तिक इत्यादि जिस किसी अपवाद के नाम से पुकार कर उनके हाथ बाँध दिये गये थे, उनके कण्ठ अवरुद्ध कर दिये गये थे। कोई भी आरोप लगाकर उनके हाथ-पाँव बाँधकर सूली पर चढ़ाओ “Give the dog a bad name and hang it” यही था उनका मतलब। यहाँ तक कि बड़े-बड़े दार्शनिकों की मूल्यवान कृतियों रचनाओं को विकृत रूप में अपव्याख्या करके जान बूझ कर गलत विभ्रान्ति पैदा करने लगे। महान दार्शनिकों के इन सभी अमूल्य कृतियों को प्राचीनकाल से ही जनगण धर्मग्रन्थ के रूप में समादर करते आये हैं। निहित स्वार्थ का पताका ढोने वाले अपने क्षुद्र स्वार्थ की प्रेषणा से ही ऐसी अपर्कीत्ति कर गये हैं।

तारक ब्रह्म :- ब्रह्मचक्र (सञ्चर और प्रतिसञ्चर का मिलित नाम) के चलने की गति, सभी स्तरों में सर्वथा एक सी नहीं होती। सत्वगुणी प्रकृति की गति रजोगुणी गति की तुलना में अधिक तीव्र होती है। इसी प्रकार रजोगुणी प्रवाह की गति तमोगुणी गति से अधिक होती है। स्पष्टतः, सञ्चर धारा के प्रारम्भ में गति अधिक तीव्र होती है। ठीक इसी प्रकार सत्वगुणी शक्ति के प्रभावाधीन कुछ उन्नति प्राप्त कर लेने पर, अर्थात सामान्य देह में पहुँचने पर (हिरण्मय कोष के उर्ध्व स्थित स्तर पर, जहाँ अणुमन सत्वगुणी प्रभाव अनुभव करता है) गति में तीव्रता आ जाती है। फिर यदि अणु जीव साधना द्वारा ब्रह्मचक्र पुरुषोत्तम की ओर आगे बढ़ता चले तो अणुमन की गति और भी बढ़ जाती है, तीव्रतर हो जाती है।

सृष्टि के उषाकाल से ही मनुष्य, पुरुषोत्तम के साथ अपने महामिलन की आकांक्षा की अपेक्षा करता आ रहा है। परन्तु ब्रह्मचक्र में गति की असमानता के कारण अणुमन का गतिपथ इलिप्टिकल (elliptical) हो पड़ता है तथा वृत्ताकार नहीं रह पाता, अण्डाकार हो जाता है। जो पुरुषोत्तम को जीवन का चरम लक्ष्य मान लेते हैं उनमें विलीन होते जाते हैं। परन्तु मोक्ष प्राप्ति की कामना रखने वाला अणुमन निर्विशेष निर्गुण ब्रह्म में अपने आपको सम्पूर्ण समर्पित कर डालने की साधना करता हुआ, इस ब्रह्मचक्र के बाहर एक स्पर्श विन्दु विशेष पर आ पहुँचता है। यही स्पर्श विन्दु-विशेष तारकब्रह्म का अवस्थान है। (इनकी अवस्था सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म दोनों ही के अधिक्षेत्र के मध्य स्थित है)।

तारकन्ब्रह्म तन्त्र की एक धारणा विशेष है। तन्त्र में समस्त सृष्टि को ‘सम्भूति’ के नाम से जाना जाता है। जब तारकब्रह्म स्वेच्छा से पञ्चभूत की सहायता लेकर मानव देह में इस पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करते हैं, तो उनका भौतिक शरीर सगुण ब्रह्म की परिधि में चला आता है, अन्यथा वे निर्गुण ब्रह्म ही हैं। इसी पञ्चभौतिक शरीर को लेकर जब उनका शुभ आर्विभाव होता है, तन्त्र की भाषा में उन्हें महासम्भूति के नाम से पुकारा जाता है।

तन्त्र की साधना पद्धति अथवा आनन्दमार्ग की साधना पद्धति के अनुसार जो साधक पुरुषोत्तम को अपना लक्ष्य बनाते हैं, वे सगुण ब्रह्म को प्राप्त करते हैं, और जो निगुण ब्रह्म की साधना में रत होते हैं, वे साधना द्वारा निर्गुण-पद में ही समाहित हो जाते हैं। केवल तन्त्र में ही तारकब्रह्म की विशेष साधना का उल्लेख है-जो कि सगुण और निर्गुण की साधना से स्वतन्त्र, अपने वैशिष्ट्य में समुज्ज्वल है।

सैद्धान्तिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर पाते हैं कि सगुण ब्रह्म के संस्कार अनन्त हैं और इसी कारण वे अनन्तकाल तक उसका भोग करते रहेंगे। निर्गुण ब्रह्म तो कर्म रहित हैं। अतः उनके पास कोई कर्म बन्धन नहीं है। तारकब्रह्म हैं इन दोनों के मध्यवर्ती सत्ता, जो कि दोनों ही के कार्य कर सकते हैं। वे अपने अपार स्नेह से अपनी सन्तान को कल्याण पथ निर्देशन करते हैं, प्यार करते हैं, स्नेह करते हैं। उनके बच्चे भी जानते हैं और समझते हैं कि तारक ब्रह्म उन्हें छोड़ कर अलग नहीं रह सकते। तभी तो वे अपने परमाराध्य देवता की प्रार्थना करते रहते हैं, “हे महान पिता, हे ममतामयी जननी, हे सर्वनिधि ! हम आपका स्मरण करते हैं। हम आपका ध्यान करते हैं, हे महान साक्षीसत्ता ! हम आपको अपने हृदय की श्रद्धाभक्ति अर्पण करते हैं, इस स्थूल जड़ जगत में आप ही हम लोगों की एकमात्र शरणागति हैं, अतः आपके ही चरण-कमल में हम निवेदन करते हैं, हे कृपानिधि ! हमें शरण दें।” सम्पूर्ण आत्मसमर्पण ही समस्त आध्यात्मिक साधना का सार है। इसके अवश्यम्भावी फलस्वरूप मनुष्य परम-पद प्राप्त करते हैं। और एक बार इस परमपद के प्राप्त हो जाने से, मनुष्य की अधोगति की सम्भावना हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। सत्य तो यह है कि जिसने एक बार उनमें पूर्ण-आत्मसमर्पण करने की कला सीख ली उसका अस्तित्व सार्थक हो चुका है, उसका जीवन धन्य हो चुका है। ठीक उसी प्रकार जैसे नमक की एक छोटी सी गुड़िया; अथाह समुद्र की गहराई मापने चली; किन्तु यह क्या-कैसा दैवीय झटका लगा… कैसा एक आकर्षण लगा उसे; और लो उसी में वह विलीन हो, खो गई-कहाँ लुप्त हो गई, कोई भी जान न सका। तारकब्रह्म किसी दर्शन शास्त्र के कोई सत्ता नहीं, वे हैं मानव हृदय के गहरे भक्ति समुद्र से उत्सारित एक भाव विशेष।

(जमालपुर, 1-5-1959), Idea and Ideology
श्री श्री आनंदमूर्तिजी की पुस्तक “तंत्र ही साधना : साधना ही तंत्र” के अंश