हम ईश्वर को कब तक इस्तेमाल करते रहेंगे ?

गौतम प्रधान ”मुसाफिर”

कोई भयावह प्रश्न नहीं है यह हमारे लिए परन्तु यह चिन्ता का नहीं अपितु चिन्तन का विषय है कि हम ईश्वर को कब तक ईस्तेमाल करते रहेंगे ? चलिए हम प्राचीन दोहे की ओर चलते हैं –

दुःख मेुं सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।

जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

इस दोहे में सुख या दुःख की बात न कर उन्हें (ईश्वर को) नित्य याद रखने पर जोर दें तो ज्यादा अच्छा है क्योंकि सुख- दुःख तो जीवन का खेल है। इतना सब जानते हुए भी हम केवल और केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ईश्वर को याद करते हैं जिसमें अपने परिजनों के स्वास्थ्य लाभ की ईश्वर से कामना, अपने बेटा बेटी की शादी की लालसा, अपने सामने अपने बेटे बेटियों बहु दामाद को वेल सेटल्ड देखने की महत्वाकांक्षा अपने बच्चों के इम्तिहान में, यथा इंजिनियरिंग, मेडिकल या अन्य महत्वपूर्ण स्थानों में चयन के लिए प्रार्थना, एक अच्छे मकान, गाड़ी के लिए दुआ या कोई अन्य व्यक्तिगत या जातिगत स्वार्थपरक कामना इत्यादि इन सबके लिए तथाकथित रूप से धार्मिक स्थलों, भवनों में याचक की तरह गिड़गिड़ा कर याचना करना। मानो ईश्वर हमारे इन सब कामों का ठेका ले रखा हो, जैसे उन्होंने हमारे साथ कोई अनुबंध साईन करा रखा हो। ईश्वर से शांतिपूर्ण याचना – हे ! ईश्वर मेरे बच्चे को ठीक करा देना, मैं 51 गरीबों को भोजन कराऊँगा। हे ईश्वर ! मैं राहत काम में लग रहा हूँ पर दुसरे दिन पेपर में अपना नाम खोजना। हे ईश्वर मुझे पीएमटी/ पीईटी में सलेक्ट करा दो। मैं तुम्हारे नाम घी के 101 दिये जलाऊँगा वगैरह वगैरह। अब आप ही बताईए क्या यही भक्ति की पराकाष्ठा है ? क्या हमने कभी जानना चाहा है कि जिस ईश्वर को हम चाहते हैं उनकी ईच्छा क्या है? आजकल फेसबुक, व्हाट्सअप जैसे नेट टेक्निकल जानकारों द्वारा बड़ा अच्छा ही मैसेज एक दुसरे को पास हो रहा है वह यह कि –

“तु वही करता है जो तु चाहता है
पर होता वही है जो मैं चाहता हूँ।

तो तू वही कर जो मैं चाहता हूँ,
और होगा वही जो तू चाहता है।

कितना अच्छा है न ! चलिए अब हम ईश्वर की ओर चलते हैं। हमसे कोई पुछता है भगवान को चैबीस घण्टे में अर्थात एक दिन चक्र में कितने बात याद करते हो तो हम औसतन यह कह देते हैं – अगरबत्ती दोनो टाईम दिखाते हैं। लो पुनः सवाल कि क्या ईश्वर इससे खुश हो जायेंगे तब हमारा जवाब रेडिमेड रहता है – ईश्वर को दिल से याद करो सच्चे मन से याद करो। पर पुनः सवाल कि क्या अच्छे सच्चे मन से हमने क्या उन्हें (ईश्वर को) याद किया ? समाज में कितनो का मनोबल बढ़ाया ? ऐसा हमने क्या काम किया कि ईश्वर हमसे खुश हों ? मनुष्य रूप में हमने ईश्वर की एैसी कौन सी ईच्छापूर्ति के लिए हमने अपना पारिवारिक संतुलन बनाते हुए कुछ कार्य किया ? यहाँ पर संतुलन कहना इसलिए नितान्त आवश्यक हो गया है क्योंकि इसकी आड़ में हम अपने ईश्वरत्व की ओर अकर्मण्यता को छुपाते हैं और यही हमारी कापुरूषता है। हमारी स्थिति महाभारत के उस दुर्योधन की तरह है जो धर्म को तो जानता है पर उसका पालन नहीं करता एवं अधर्म को भलीभांति जानता है पर उसे छोड़ नहीं सकता। तो हमारे अन्दर की यात्रा कब होगी ? ईश्वर की ओर चिन्तन कब होगा ? हमारे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है।

स्वामी विवेकानन्द ने कहा है –

“Life is short, give it to a great cause.”

एैसा उन्होंने क्यों कहा क्योंकि बहुत ही कम समय में वे मनुष्य होने के सुयोग के मर्म को भलीभांति जान गये थे इसलिए इस क्षणभंगुर जीवन (सीमित जीवन अवधि) को जनकल्याणार्थ एक नूतन मानव समाज के निर्माण की खातिर आह्वान किया।

वहीं आनंदमार्ग संस्था के संस्थापक श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने कहा है –

“Encourage everyone to build up his career in a nice way, let no one should undergone to think that his life has become useless.”

अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को उसका भविष्य संवारने में उत्साहित करो। किसी भी व्यक्ति को यह अहसास न होने पाये कि उसका जीवन बेकार चला गया। परन्तु आज हो क्या रहा है केवल हम एक छोटा “मैं“ मं सिमट कर रह गये हैं। क्या यह “मैं“ का दायरा बड़ा नहीं हो सकता है?

अब आप ही बताईए हम किस ईश्वर के उपासक हैं ? क्या तथाकथित निम्न या उच्च जाति के पृथक पृथक भगवान होते हैं ? यदि नही तो एक मूल मंत्र हम बना लें ईश्वर की ओर कि –

“जो जात पात को मानता है वो ईश्वर को नहीं मानता
जो ईश्वर को मानता है वो जातपात को नहीं मानता।“

हाँ पर यह तब होगा जब हमारे मन मष्तिष्क में यह बात पूरी तरह से बैठ जाये कि दुनिया में ईश्वर केवल एक ही है और वो हम सबके लिए है न कि वो जात पात में बँट कर खण्डित हो गया है क्योंकि जो खण्डित है वो ईश्वर नहीं , वो पूर्ण नहीं। जो अखण्डित है जो नित्य है जो अनन्त है वही ईश्वर हो सकते हैं। जो भौगोलिक सीमा, भाषा, लिंग, संस्कृति इन सबसे परे सबों के लिए है वही ईश्वर है। वही कृष्ण ईश्वर हो सकते हैं जो द्रोपदी का भी लाज बचाये, जो अर्जुन का भी पथप्रशस्त करे, जो महाभारत का कारण हो, जो गोपियों के भी हृदय में बसे, जो सुदामा का भी सखा हो, जो कर्ण की बहादुरी पर भी नाज कर उसकी मृत्यु के लिए अश्रुपात हो, जो राधा का भी प्रिय हो, जो समाज को भी एक नूतन दर्शन (गीता) दे, समाज को जिनका इंतजार हो ….. धर्मसंस्थापनाथाय संभवामि युगे युगे।

पर हम मनुष्य इन सबसे सीखने के बजाय विभिन्न धर्मग्रन्थों की आरती उतारने, उन्हें ड्राईंग रूम में शोकेस में सजावट की वस्तु मान लिये हैं। रोज इस प्रकार की पवित्र ग्रन्थों के नाम की झुठी कसमें खाते हैैं बजाय इनके आदर्शों को आत्मसात करने के, इनको पालन करने के। वास्तव में हम ईश्वर से बिजनेस मोड में ही अपेक्षा रखते हैं कि हे ईश्वर ऐसा कर दो तो मैं इतनों को खाना खिलाऊँगा, कपड़ा दूंगा, घी के दिये जलाऊँगा। अर्थात बवदकपजपवदंस कमअवजपवद शर्तपरक भक्ति। माने उनके प्रति प्रेम नहीं है, उनके प्रति समर्पण नहीं है। उनके लिए निःस्वार्थ कुछ देना, कुछ करना नहीं है। आईए हम अन्दर की ओर आमुख हों और ईश्वर चिन्तन तथा समाज सेवा की खातिर जो हमसे तथा जितना बन पड़े चाहे वो मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक, आर्थिक या अन्य कोई समाजोपयोगी कार्य में अपनो अमुल्य योगदान देकर मानव तन का सुयोग पाने का उपयोग करें और ईश्वर के इस्तेमाल करने की बजाय अर्थात ईश्वर “से“ चाहने की बजाय ईश्वर “को“ चाहना को जीवन का ध्येय बना लें।

 

 

गौतम प्रधान ”मुसाफिर”
केलो विहार रायगढ़ (छ.ग.