अहंकार के कारण बढ़ता संबंध विच्छेद

शांति सुमन

शादी दो आत्माओं का मिलन होता है। आत्मा का आत्मा के द्वारा भेद जानकर उसे परम आत्मा में मिलना शादी होता है। शादी का मतलब दो शरीर का मिलन सोच कर मनुष्य अज्ञानता में नाचते गाते दुर्गति को प्राप्त करता है। पति-पत्नी के बीच दरार तब होता है जब दोनों एक दूसरे के दिल के दरिया में गोते लगाने के लिए तैयार नहीं होते हैं। पति-पत्नी के बीच अक्सर विचारों में मतभेद होता है जिससे एक दूसरे के प्रति त्याग तपस्या की भारी कमी होती है। टूटे रिश्ते का कारण शक भी है। इस शक को सही साबित करने के लिए एक दूसरे के पीछे लगे रहते हैं।

अहंकार के कारण परिवार के साथ सामंजस्य नहीं बैठ पाता है और सामने वाला भी झुकता नहीं है। अहंकार वैवाहिक जीवन को बर्बाद कर देता है। अहंकार होने पर व्यक्ति अपने सामने वाले की भावनाओं की कद्र नहीं करता है, जिससे रिश्ते खत्म होने लगते हैं। जब दो लोग साथ जुड़ते हैं तब दो अलग-अलग जीवन धीरे-धीरे एक होने लगते हैं। यह दोनों को अब सिर्फ स्वयं के बारे में नहीं सोचते हुए एक दूसरे के लिए जीना होता है। कोई भी काम अपने पार्टनर की खुशी को भी ध्यान रखकर करना होता है। आपके साथी के लिए केवल इतना ही काफी है कि उसका ओहदा आपके जीवन में बहुत पवित्र और बड़ा है, आपके जीवन साथी होने का ओहदा। आपके साथी आपसे किसी भी मामले में– चाहे शिक्षा हो, आर्थिक स्थिति हो, कोई काम उसे नहीं आता हो अथवा किसी गुण में आपसे वह कम क्यों नहीं हो, फिर भी उसकी दूसरी अच्छी बातों के लिए उसका सम्मान करते हैं तो यही सम्मान अपने साथी के लिए काफी है।

ऐसा नहीं है कि इस परेशानी से सिर्फ महिलाएं ही प्रभावित होती हैं। अभी हाल की घटना है समस्तीपुर के पूसा की, एक लड़का जो बेंगलुरु में जॉब कर रहा था उसकी पत्नी ने अहंकार में और महिला होने का नाजायज़ फायदा उठाकर पति को इतना प्रताड़ना दिया कि वह लड़का उसके संवाद का वीडियो बनाकर खुद फंदे में लटक गया। पहले ज़्यादा महिलाएं प्रताड़ित हो रही थीं, अब उनके लिए कानून बना तो इसका नाजायज़ फ़ायदा भी अपने परिवार के साथ मिलकर उठाने लगी हैं। जब तक मन में हर एक जीव को परमात्मा का अंश मानकर सेवा और त्याग की भावना नहीं रहेगी, ऐसी घटना घटती रहेंगी।

शादीशुदा ज़िंदगी में दो व्यक्ति होते हैं, दोनों का अस्तित्व अलग-अलग होता है। बहुत ही कुशलता पूर्वक दो अलग-अलग अस्तित्व के लोगों का एक साथ जुड़ना ही सफल वैवाहिक जिंदगी है। कुछ जोड़े पारिवारिक व सामाजिक मर्यादाओं की इज्ज़त को ध्यान में रखकर, कुछ थोड़ी-थोड़ी दरार को नज़रंदाज़ करके खींचते चले जाते हैं। और कुछ लोग कोर्ट कचहरी पहुंचकर तलाक की अपील करते देखे जाते हैं। एक आदर्श रिश्ता वह होता है जो अपनी कोई भी जरूरत अपने साथी के सहमति से ही पूरा करता है। जब आप स्वार्थ से पहले अपने साथी की इच्छाओं को महत्व देते हैं तो आपके रिश्ते में यह होना एक आदर्श रिश्ते की पहचान है। जब अपने साथी के रंग–रूप वह बाहरी आवरण पर अधिक ध्यान नहीं देते हैं तो उसके आंतरिक सुंदरता की कद्र करते हैं। निःस्वार्थ रूप से उसे प्रेम बनाए रखने की कोशिश करते हैं तो रिश्ता आदर्श होता है। पति-पत्नी के बीच होने वाले कई मामलों में देखा गया है कि विवाद और झगड़ा का कारण इगो होता है। अगर दोनों नौकरी में है तो इगो क्लैश ज़्यादा होता है। ऐसे में छोटी-छोटी बातों पर समझौता करने के बजाय दोनों का विवाद बड़ा रूप ले लेता है। ऐसे में रिश्तों में खटास आ जाता है। यही बढ़ते–बढ़ते एक दिन घरेलू हिंसा या तलाक का रूप ले लेता है।

चाणक्य नीति के मुताबिक पति-पत्नी को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। सारी परेशानी पति-पत्नी के रिश्ते में अहंकार के कारण ही होती है। एक दूसरे से प्रेम का अभाव होने पर सम्मान नहीं दे पाते हैं। पति-पत्नी के रिश्ते की नीव प्यार पर टिकी होती है। बिना किसी शर्त के प्यार करना और अपने पार्टनर की कमजोरी को समझना रिश्ते को सच्चा और खास बनाता है। एक दूसरे के विचारों, भावनाओं और समस्याओं का सम्मान करना एक रिश्ते के लिए ज़रूरी है।

रिश्ता टूटने के कारण


१. आपस में दोनों का संस्कार मेल नहीं खाते। अहंकार के कारण दोनों में से कोई पक्ष झुकना नहीं चाहते।
२. दूसरों के कहे सुने बातों पर बेवजह पार्टनर पर शक करना विश्वास में कमी लाता है।
३. जब दोनों एक दूसरे को नहीं समझते और एक दूसरे के लिए समय नहीं देते हैं।
४. आध्यात्मिकता की कमी–आध्यात्मिकता से घर संवर जाता है। आध्यात्मिकता में बहुत बड़ी शक्ति है।

५. आई.जी.आई.एम.एस. के क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट प्रिया कुमार ने बताया कि कई बार परिवार के दबाव में आकर दंपति रिश्ता जोड़ लेते हैं लेकिन एक दूसरे को स्वीकार नहीं कर पाते।

६. अपने पूर्व प्रेमी या प्रेमिका से संबंध शादी के बाद भी रखने के कारण रिश्ते में खटास आती है।
७. हर समय खुद को ही सही साबित करना।
८. एक दूसरे के भावनाओं को महत्व नहीं देना।
९. एक दूसरे से संवाद या विचार नहीं करना।
१०. ईर्ष्या की भावना रखता।
११. बार-बार विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश करना।
१२. किसी भी बात का अभिमान करना।
१३. अपने साथी को खुद से कम समझना।

रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए इन बातों का ध्यान रखें
१. अपने पार्टनर पर भरोसा करें।
२. एक दूसरे की ज़रूरत का ख्याल रखें।
३. किसी भी समस्या के हल के लिए एक दूसरे से खुलकर बातें करें।
४. अपने साथी के लिए कुछ खास पल निकालें।
५. अपने साथी से सॉरी बोलने में नहीं हिचकिचाएं।
६. अपने साथी के साथ खुद का भी आकलन करें और अपनी कमियों का सुधार करें।

विभिन्न मनुष्यों की संरचनाएं भी विभिन्न होती हैं। सभी कोई अपने आभोग के अनुसार तदनुकूल संरचना प्राप्त करते हैं। इसलिए दो मनुष्यों की संरचना एक समान नहीं होती है। क्योंकि प्रत्येक को अपनी संस्कारों की अभिव्यक्ति के लिए अलग-अलग संरचना की जरूरत होती है, तो हमारा कर्तव्य क्या होगा कि हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ेगी जिसकी उन्हें ज़रूरत है। धर्म जीवन और इसकी विशेषताओं को बचाए रखना है। जितनी भी बाधाएं क्यों ना आएं, सिर्फ धर्म ही बाधाओं के विरुद्ध आगे बढ़ने की शक्ति देता है। धर्म के आदेशों पर ध्यान देना ही होगा। इसके अतिरिक्त सभी चीज– धन, बुद्धि, तर्क आदि गौण हैं। जो धर्म के आदेशों को पालन करता है उसी को साधु कहते हैं। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं दूसरों के साथ भी तुम वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम अपने प्रति करते हो। अर्थात जैसी मेरी चाह है दूसरों के प्रति ऐसी भावना रखनी ही धर्म है और जो इस भावना से परिचालित है, वही साधु है। धर्म ही यथार्थ मित्र है। इसलिए जब धर्म का पतन होने लगता है तो जीवन की स्वाभाविकता नष्ट होने लगती है। विनाश का संकट उपस्थित हो जाता है। जब धर्म जीवन के उचित स्थान से बेदखल हो जाता है तब धर्म की ग्लानी हो जाती है। जब मनुष्य का जीवन या मनुष्य का अस्तित्व बोध एक गंभीर अंधकार से आच्छादित रहता है तो क्या उचित है क्या अनुचित है यह विचारशीलता खो बैठता है। आज्ञा के अंधकार में खोया रहता है। शास्त्र के भाषा में यही कलयुग है।

कुछ लोग कहते हैं यह जगत दुखमय है, आनंदमय नहीं है। वे विश्व ब्रह्मांड के सब कुछ को दुखमय देखते हैं। समग्र विश्व को दुखमय देखने के परिणामस्वरूप पलायनी मनोवृति के पक्षधर हो जाते हैं। अपने कृत्य कर्म से बचने के लिए कहां भाग पाएंगे। इस विश्व ब्रह्मांड का कोई ऐसा जगह नहीं है जहां वह दुख के हाथ से बचने के लिए भाग पाएंगे। दुख का तरीका बदल जाएगा दुख नहीं बदलेगा। दुख कोई वैयक्तिक सत्ता नहीं है, परंतु आनंद एक वैयक्तिक सत्ता है। हम लोग परमपुरुष के नाटक के प्रति मुहूर्त पात्र-पात्री हैं। कोई धनी, कोई गरीब, कोई बुद्धिमान, कोई निरबुद्धि, कोई मोटा, कोई दुबला, कोई कल, कोई गोरा– सब कोई अपनी–अपनी भूमिका निभा रहे हैं। प्रत्येक जीव परमपुरुष की ही संतान है आखिर में परम पुरुष में ही मिल जाएगा। इसलिए मन को छोटा करने की ज़रूरत नहीं है। सभी परिस्थिति में सामंजस्य बैठाते हुए अपनी मंज़िल परमधाम की ओर बढ़ना चाहिए।

 

शांति सुमन