काशी–सारनाथ

श्री पी. आर. सरकार
अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित

वाराणसी
पूर्वी अर्द मागधी में वर्तमान काल के लिए ‘छ’ भूतकाल के लिए ‘ल’ तथा भविष्य काल के लिए ‘ब’ प्रयुक्त होता है।पश्चिमी अर्द मगधी में ‘छ’ वर्तमान काल के लिए प्रयुक्त नहीं होता है।किन्तु ‘ल’ और ‘ब’ भूतकाल और भविष्य काल के लिए प्रयुक्त होते हैं।भोजपुरी भाषा करीब 1200 वर्ष प्राचीन है। यह गंगा राप्ती क्षेत्र की भाषा है जिसकी सुदूर दक्षिणी सीमा ‘बण गंगा’ है।

वाराणसी बौद्ध पूर्व शहर है तथा इसकी सांस्कृतिक विरासत 7000 वर्ष पुरानी है। यह भगवान शिव की शीतकालीन राजधानी थी।ठीक से पूरी खुदाई करने पर यहां बौद्ध पूर्ण अवशेष प्राप्त हो सकते हैं। शंकराचार्य एक उत्तर बौद्ध दार्शनिक थे जो 1300 वर्ष पूर्व मौजूद थे।विष्णु भी उत्तर बौद्ध देवता थे।सरंगनाथ शब्द (सांरगधर) से सारनाथ शब्द व्युत्पन्न हुआ था, जिसका अर्थ है- विष्णु।इसका वैदिक नाम ऋषि पत्तन मृगदाव था। पाली में कृ का उच्चारण या तो ‘इ’ होता है या ‘उ’ होता है या फिर अनुच्चरित रह जाता है।इसीलिए ऋषि पत्तन हो गया इषिपत्तन।

सारनाथ का वैदिक नाम ‘ऋषिपत्तन मृगदाव’ था जो बाद में वैष्णव प्रभाव के परिणाम स्वरुप सारंग धर- सारनाथ हुआ
सारनाथ में स्थापित स्तूप के विषय में बताया कि स्तूपोंका स्थापत्य अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक एक ही प्रकार का है। स्तूप का अर्थ है किसी चीज को ढृढता से स्थापित करना। पूरे गंगा क्षेत्र में छोटी और पतली ईंटों का उपयोग होता रहा है।ऐसा ही पूरी काशी राज्य में पाया जाता है। कुशीनगर, नन्दानगरनगर (बेतिया) और यहां सारनाथ में भी ऐसी ही ईटों को बैठने के लिए सुर्ख़ि चूने का प्रयोग होता था।मन्दिरों के ऐसे निर्माण चैत्य,मठों का निर्माण संग्रहम-संधाराम और संघ क्रमशः संस्कृत पाली और अर्धद्ध पाली में कहे जाते थे। सारनाथ उसके आस-पास सारंग धर, सारंग नाथ मन्दिर, विष्णु मन्दिर के आस-पास एक बगीचे में था।
सारनाथ में बुद्ध ने पांच शिष्यों को उपदेश दिया था। कौण्डीय,बम्पा, भाध्दीय, महानमा और अस्सजी। दीक्षा की यह पद्धति उपसम्पदा कही जाती थी। पहले दो दिक्षती सारिपुत और मोदगलायन मगध से आये थे। इस क्षेत्र में महावीर वर्ध्दमान बुद्ध के पहले आए थे किन्तु जनसाधारण में उनके विचारों का प्रभाव कम रहा। समाज में बुद्ध छाये हुए थे। वह मन्दिर बुध और गौरिय स्थापत्य शैली का एक समीश्रण का प्रतिनिधित्व करता है।किन्तु शेताम्बर जैसे स्थापत्य शैली में समीकरण प्रोत्साहित नही करता।दिगम्बर में नग्नता एक आस्था का मामला है। परन्तु बुद्ध और पौराणिक मत में नग्नता को प्रोत्साहित नहीं किया।बुद्ध मत में बहुत दिनों के बाद देवताओं की अवधारणा उभरी और हरिति,मारिची और शिथला बुद्ध देवता बने। गाजीपुर आगरा प्राप्त का जिला था और उसमें बलिया एक डिवीजन था। संस्कृत में ‘बल्लिया’ वर्तमान भोजपुरी में ‘बलिया’ वर्तमान बेतिया’ ‘वृतक’ नाम जिसका अर्थ है गन्ने पौधे की एक जंगल।

27–मार्च 1984

Sarnath: The Buddhist Pilgrimage Site of Varanasi, Uttar Pradesh, rich in  stupa and pillars

सारनाथ राजगिरी से पुराना है। यहाँ की ईट देखकर, यह स्थान अशोक के थोड़ा ही पहले का है लगभग 2300 बर्ष पूर्व। यहाँ कुॅओं में दिवालों में चढ़ने उतरने के लिए गड्ढे नहीं बने हैं। ऐसे गड्ढे पठान कल के कुओं में बनते थे।पर्सिया में ऐसे प्रचलन था इसका प्रचलनभारतवर्ष में अधिक नहीं हुआ, क्योंकि यहों के कुॅयें मिट्टी में बनते हैं। अतः इससे यह प्रमाणित होता है कि यहों लोग 2500 वर्ष पूर्व से ही रहते थे।

सारनाथ स्थित कुछ खम्मनुमाफ गोल छोटे-बड़े, नीचे ऊंचें ईटों को जमा कर बनाए गए स्थानों के विषय में बताया कि विभिन्न चक्रों के प्रतीक है और सबसे ऊंचा स्थान वृद्ध के लिए और विभिन्न और चक्र तक सिद्ध साधकों के लिए छोटे स्थान बनाए गए थे।सहस्त्रार चक्र को जगद् दल कहा जाता था, जो परमशिव किंवा बौद्ध परम्परा में नैरात्म देवी का स्थान माना जाता था। यह सर्वोच्च चक्र ही सर्वच्च स्थान माना जाता था।उसके बगल में एक विशाल घड़ा रखा जाता था जिसे धर्मघट करते थे। यह इतना भारि होता था कि साधारणतया उसे इधर-उधर नहीं किया जा सकता था। काफी बड़े बिहार को भी जगद् दल बिहार करते थे।

बुद्ध के देहांत के लगभग 100 वर्ष बाद पाटलिपुत्र में एक विशाल सम्मेलन हुआ, जिसमें बुद्ध धर्म मत के दो खंड स्वष्ट दिखाई पड़े। दूसरा सम्मेलन पुरूषपुर (पेशावर)में हुआ। दोनों धड़ के अन्तर और स्वष्ट हुए और तीसरा सम्मेलन जो पाटलिपुत्र में हुआ, उसमें दोनों दो भागों में विभक्त हो गए। हिनयान और महायान।महायान की भाषा संस्कृति और हीनयान की भाषा पाली थी यह घटना बुद्ध केशरीरान्त के 300 वर्ष बाद घटित हुई ।दोनों भागों के स्पस्ट विभाजन के बाद दोनों को दो विचारधाराओं की मान्यता प्राप्त हो गई। हिनयान लोगों की यह धारणा थी कि बुद्ध आत्मा परमात्मा में विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने बुद्ध को ही अपना सब कुछ मान लिया। बाद में अतिरिक्त अन्य देवी- देवताओं को भी स्वीकारा। हिनायान चिट्टगाॅव क्षेत्र में प्रभावी रहे,और अन्य क्षेत्र में महायान ।बाद में बहुत से महायानी पौराणिक धर्म स्वीकारे और बहुतों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया किन्तु हीनयानी अपने मत में दृढचित्त रहे, वह आज भी चिट्टगांव क्षेत्र में बरूआ नाम से जाने जाते हैं, जो संस्कृत के बटुक नाम से जाना जाता है, इसका अर्थ होता है श्रेष्ठ ।शिव को भी बटुक नाथ कहा जाता है और प्रसिद्ध नाम बटुकभैरव है। आसाम बंगाल और कतिपय हिन्दुओं में बरूआ, चतुर्धारी,(चोधुरी),पद् वीधारी लोग उपलब्ध होते हैं।

बौद्ध धर्म मत वाराणसी में काफी समय और आस-पास तो कई सौ वर्ष तक जीवित रहा गुप्तवंश के सत्तासीन होने पर अनेक राजाओं ने पौराणिक धर्म स्वीकार कर लिया। वे सभी राय पदधिकारी कुल के थे।यह स्थिति बलिया (बल्लिका) में विशेषत: रही कुछ भूमिहार वर्ग के ऐसे लोग सिंह पदबी लगाते रहे।

जब आनन्द ने बुद्ध से पूछा कि उनके उपदेशों को किस भाषा में लिखा जाए तो बुद्ध ने कहा था कि उसी में जिस भाषा में वे बोले हैं ।सामान्य लोगों से बातचीत में और उपदेश देते समय वे जन भाषा पाली उपयोग करते थे। आज भी वाराणसी में ब्राह्मी लिपि के उत्कीर्ण स्थल प्राप्त हो सकते हैं। पाली ब्राह्मी लिपि में लिखी जाती थी। बाद में कुछ (परिवर्तन होकर) अर्ध्दमागधी श्री हर्ष लिपि। भोजपुरी की मूललिपी श्री हर्ष लिपि और बाद में कुटिला(कैथी) हुई।कुटिला या श्री हर्ष लिपि इलाहाबाद से डिब्रूगढ़ तक प्रचलित थी। यह कल लगभग 1500 से 2000 वर्ष तक कथा और अब से लगभग 400 बर्षो तक भी यह लिपि प्रचलित थी। आज शायद ही कोई इस लिपि को पढ़ने में सक्षम हो।यह कहना यहां प्रासंगिक होगा कि आचार्य प्रतिपादित्य ने गोरखपुर में रहते समय ही बाबा से अपने गांव में एक भग्न मन्दिर में प्राप्त कथित शिला लेख की चर्चा की तो उन्होंने कहा कि समय नहीं होने से मैं वहां नहीं जा सकता। किंतु यदि तुम उसका फोटो मेरे पास भेज दो तो मैं पढ़ सकता हूं।बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा था तुम लोगों की कृपा से शिव की समस्या लिपियां को जो आज तक आई है, मैं पढ़ सकता हूं।

पूरातत्व की दृष्टि से यदि उचित ढंग से उत्खनन किया जाय तो काशी संसार के प्राचीनतम लिविंग सिटी के रूप में प्रमाणित हो सकता है। भारतवर्ष के इस परिक्षेत्र में वर्धमान प्राचीन शहर था और वाराणसी। दूसरा प्राचीन शहर था और उससे भी पहले का प्रयाग नगर था, किन्तु यह सभी गंगा– यमुना की गोद में चले गए। वर्तमान अल्हाबाद ब्रिटिश काल का निर्माण है। शिया मुसलमान ने अलग शहर बनाया था। उसी को इलाहाबाद कहते हैं और सुन्नी उसी को अलाहाबाद।यदि उचित ढंग से अत्खनन किया जाए तो 7500 वर्ष पुराना शिव कलीम अवशेष यहां पाये जाएंगे और शिव की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति प्रमाणित होगी।

वाराणसी का सांस्कृतिक अध्ययन करने से पता लगेगा कि वाराणसी एक सांस्कृतिक केंद्र है और शिव की शीतकालीन राजधानी ही थी। इसका मानव सभ्यता पर गहरा प्रभाव था।चीन की सभ्यता 600 वर्ष पूर्व की है। आर्य भारतीय सभ्यता 5000 वर्ष पूर्व के इज्पिट 4520 बर्ष पूर्व की,मोहोन्जोदार और कोटा के पास अलनिया स्वदेशी भारतीय सभ्यता 5000 वर्ष पुरानी है। वाराणसी के चारों और उत्खनन करने से यह प्रमाणित होगा कि वाराणसी सबसे प्राचीन सभ्यता है।भारतीय सभ्यता के चिन्हें को डग्मा मानकर नष्ट कर दिया गया अन्यथा इसकी सभ्यता के प्रमाण 7500 वर्षो से पहले के मिलते ।अभी भी इन प्राचीन क्षेत्र में।गहरा उत्खनन किया जाये तो यह प्रमाण प्राप्त हो सकते हैं।वेद पाठ गौडीया, काशीका, महाराष्ट्रीप और तमिल यह चार शैलियों में करते है।भोजपुरी की उच्चारण शैली यजुर्वेदिय है जैसे लक्ष्मण को लखन, तुलसीदास रामायण में इनका व्यवहार हुआ है।

28मार्च,1984

अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित