सहर प्रेमी – देवेन्द्र कुमार भल्ला
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हम खड़े हैं क्यू में कब से कुर्सी पाने के लिए,
काश! हमें कोई कह दे बैठ जाने के लिए।
ऐसा मौका ज़िंदगी में बार–बार आता नहीं,
पाँच ही तो साल हैं दौलत कमाने के लिए।
एक दो बंगले हम ने बनवा लिए तो क्या हुआ,
कुछ जगह तो चाहिए भई सिर छुपाने के लिए।
फ़िल्मी तर्जों पर जब से कीर्तन होने लगा,
चाहिए पुलिस भक्तों को बिठाने के लिए।
मयकदा में मिल ही जाए सदाचारी शायद कोई,
शैख साहिब जा रहे हैं आजमाने के लिए।
दूध–घी की शुद्धता तो छोड़िए–इस दौर में,
ज़हर भी ख़ालिस नहीं मिलता है खाने के लिए।
दैर को काबा पर विश्वास तो अब इतना ही है,
लोग जाते हैं वहाँ अपनी ख़ताएँ बख़्शवाने के लिए।
संघर्ष. ..
पानी टकराता लहरों से
लहरें कुल से टकराती
दिशा विपक्षी तेरे मछली.
बूँद डूब कर उतराती. .सागर गर्जन करता हर- हर,
अग्नि हवा से टकराती
बादल “गगन से जब टकराता, ,
अमृत की बूंदे आती.ध्वनि टकराती है अम्बर से
ब्रह्मनाद भाषा बनती
मिट्टी जल के टक्कर से
इस सृस्टि चक्र को राति मिलतीमानव जो संघर्ष से भागे,
मृत सामान हो जाएगा,
कला, धर्म विज्ञान ज्ञान का,
अंतिम समय आ जाएगा,सत्य का टक्कर सदा झूट से
प्रेम का टक्कर पापी से,
“राम” लड़ेगा “रावण” से जब
“विप्र ” लड़े “सन्तापि” से.मानव है संघर्ष का प्रेमी,
लोभ क्रोध से लड़ता है,
पशुता से लड़ते लड़ते ही
मुक्ति मोक्ष वह पाते है.तभी खिलेगी कलिका मन की,
स्वर्ग धरा बन जाएगी
घर्षण से चमकेगा सोना
कूल नदी .तब पाएगी. . ..संध्या चक्रवर्ती. .

