मगहर—कबीर की निर्वणस्थली

– श्री पी. आर. सरकार

अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित

‘यह स्थान सभी दृष्टिकोण से भारतीय संस्कृति की उसे विशेषता का मूर्तस्वरूप है।

जिसके आधार पर भारतीय संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति होते हुए भी आज जिन्दा है।

India is a land of blending and give and take की प्रगतिशील आत्मधृत होने के कारण ही वह टिकी हुई है।जबकि अनेक प्राचीन सभ्यतायें और संस्कृतियों नष्ट हो गई है। यह अनेक परिवर्तनों की बीच टिकी रही।जिसमें लगभग 5000 वषों के अन्तराल में मानवता की आत्मधारा  अक्षुण्ण बनी रही।

किसी महान व्यष्टि की यादगार में निर्मित किसी स्थान को ‘मजार’ कहा जाता है। ईसाई धर्म में गिरजाघर पवित्र किए हुए ‘प्रार्थना’ गृह है किंतु स्थान विशेष को पवित्र (Consecrated) तब वह प्रार्थना गृह ही बना रहता है । बेनजोइन(Benzion) जलाना, फूलों से बेदी सजाना मिट्टी के दिए जलाना जैसे कुछ अनुष्ठान मजारों में किये जाते हैं। पवित्र किए हुए किसी स्मारक को मकबरा कहा जाता है।यहां मजार का ऊपरी भाग दक्षिणी सिमेटिक कला का प्रतिनिधित्व करती है। यह गोथिक स्थापत्य कला से सर्वथा  भिन्न है। इसका निचला भाग खास तौर पर कोने का भाग राजवाड़ा स्थापत्य कला का प्रतीक है, इसी प्रकार दक्षिणी सिमटिक और राजवाड़ा स्थापत्य का मिश्रण राजस्थान के कोटा के मंदिरों में तिब्बत में तथा राजवाड़ा का मिश्रण कुमायूं गढ़वाल ,कुल्लू कांगड़ा और कश्मीर के कुछ मंदिरों में देखा जा सकता है।

लखनऊ का रेलवे स्टेशन दक्षिणी सेमिटिक  शैली को निरूपित करता है। दूर से देखने पर यह मस्जिद की तरह दिखता है।

हिंदू शब्द प्राचीन संस्कृति का शब्द  नहीं है उचित  नाम है आर्य धर्म! यहां अपनाई  जाने वाली पूजा पद्धति आर्य धर्म की पद्धति नहीं है क्योंकि उसमें संस्कृत मन्त्रों प्रार्थनाओं का प्रयोग नहीं होता है। और मुद्राओं (Ritualistic postures in worship or prayer) का भी प्रचलन नहीं है। पुरोहित लोक जनेऊ और शिक्षा का उपयोग करते हैं। पुजारी जनेऊ में कंठि का उपयोग करते हैं। जनेऊ में कंठी नाथ साधना में वैष्णो मत के मिश्रण का प्रतीक है। कबीर की साधना पद्धति नाथ मत और वैष्णव मत दोनों का एक सुन्दर मिश्रण है। कबीर की साधना पद्धति का अधिक सम्बन्ध ‘मेरुतन्त्र’ से है,

किंतु चाहे दर्शन और मत या साधना कोई हो तंत्र साधना अन्त सलिला की भाँति भारत ही  सदेव एक।सुक्ष्मतर आधार  रही है। विभिन्न तन्त्रों में कोई भेद नहीं है।

मगहर कबीर निर्वाण स्थल पर मन्दिर – मस्जिद के बीच की दीवार और दो प्रवेश द्वार को इसको विभाजित करने वाली दीवार को तोड़ देना होगा। और सभी प्रकार के जागतिक सम्प्रदायगत भेद को मिटा कर इन्सानियत को बचाना होगा, इन्सान और इन्सानियत एक है। मनुष्य- मनुष्य के बीच अन्तर पैदा करना अधर्म है। इस अधर्म से धर्म की और खींच लाना सभी सड़कों का दायित्व तो है ही, सभी समाज सेवीयों  का भी दायित्व है।

सामान्यत: मन्दिरों की चार वास्तु शैलियां है—

1-द्रविड़ शैली– रामेश्वरम, चिदम्बरम, तिरुवनन्तपुरम, त्रिवेन्द्रम तथा मदुरई के मन्दिरों में पाई जाती है।

2–उत्कल– शैली भुवनेश्वर और पूरी के मंदिरों के मन्दिरों में पाई जाती है।

3–रजवाड़ा शैली– उत्तरी -भारत के विभिन्न स्थानों और राजस्थान में पायी जाती है।

4—गौड़ियशैली या बंगाल शैली काली–घाट के काली मन्दिर,  कलिकाता एवं बंगाल में और कई स्थानों में पाई जाती है।

यूरोप में कोई व्यष्टि दो प्रमुख शौलियों– उत्तरी सेमिटिक शैली एवं दक्षिणी  सेमिटिक शैली को देख सकता है।

यह मजार दक्षिणी सेमिटिक  शैली एवं राजवाड़ा वास्तु शैली के अनोखे समिश्रण को दर्शाती है। साथ ही, राजवाड़ा एवं गौड़िय वास्तु शैलियों का समीश्रण मजार के दोनों किनारों पर दिखाई देता है। जो काशी
की  संस्कृति का एक उत्कृष्ट प्रमाण है। यह कबीर चौरा मन्दिर भारतीय संस्कृतिक  विकास के आदान-प्रदान सिद्धान्त को उधृत करता है। तिब्बत एवं राजवाड़ा शौलियों के समीश्रण कुमाऊँ,गढ़वाल, कुल्लू घाटी कांगड़ा एवं जम्मू के कुछ स्थानों में देखे जा सकते हैं।

कबीर स्वामी रामानन्द जी द्वारा दिक्षित थे। स्वामी रामानन्द जी वैष्णव थे। तथापि कबीर को आध्यात्मिक क्रियाएँ( साधना) नाथ पन्थ द्वारा प्राप्त हुई थीं। वह साधना राजयोग एवं हठ जोग का सम्मिश्रण थी तथा प्रचलित तान्त्रिक क्रियाओं पर आधारित थी। आध्यात्मिक साधना की इस पद्धति को हिन्दुओं और मुसलमानों के रूप में वर्णित करना निरर्थक है। नाथ पन्थ या मुसलमान और हिन्दू शब्दावली से कोई सम्बन्ध नहीं है।

हिन्दू एक फारसी शब्द है, जिसे मुसलमानो द्वारा भारत लाया गया था। जो धर्म  वेदो में प्रतिपादित है। उसे आर्ष धर्म कहते हैं। उसे किसी एक दार्शनिक या ऋषियों द्वारा प्रतिपादित किया नहीं गया था। अज्ज धर्म शब्द आर्ष धर्म शब्द से  व्युत्पन्न हुआ तथा परमर्ती काल में आर्य शब्द से व्युत्पन्न होकर ‘आज्य’ कहलाया और बाद में ‘आजि’ शब्द प्रयोग में आया और भी बाद में बड़े व्यष्टि के सम्बोधन के अर्थ में ‘जी’ शब्द विकसित हुआ।

तुर्की लोगों द्वारा  भारत में इस्लाम धर्म लाया गया, जिसने भारत के संस्कृतिक  इतिहास में एक नया अयाम जोड़ा। मुस्लिम का तात्पर्य  ऐसे व्यष्टि से है जिसने ‘ईमान’ कि  नैतिकता को स्वभाविक  धर्म के रूप में अपना लिया है। चुँकि इस्लाम तुर्की लोगों द्वारा भारत में लाया गया था, इसलिए लोगों ने उन्हें ‘तुर्क’ कहा, हम इस्लाम का प्रभाव काशी की संस्कृति में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।

हिन्दू और मुसलमान एक ही देश के निवासी है, वे एक ही जैसी पोशाक पहनते हैं। परिणामत:  एक ही जैसी मानवीय  भावना, उसके मन और हृदय को अनुप्राणित करती है। जैसे ही वह अपने जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करते है, वैसे ही वे अनुभव करेंगे कि विष्णु और अल्ला एक ही हैं।

कबीर चौरा नाम से ज्ञात यह कबीर मन्दिर सच्चे अर्थ में हिन्दू मन्दिर नहीं है, क्योंकि हिन्दू मन्दिरों के लिए पौराणिक धर्म मत द्वारा निर्धारित कर्मकाण्ड इस मन्दिर में अनुष्ठित नहीं होते हैं। जैसा की पुजारी  या पुरोहित से पुछने पर ज्ञात हुआ, कि वह ध्यान मन्त्र का पाठ केवल पुरोहितों द्वारा होता है, जबकि प्रमाण तन्त्र पुरोहित के पाठ कर लेने के बाद, सन्पूर्ण भक्त मण्डली द्वारा दोहराया जाता है। इस प्रकार यह एक हिन्दू मन्दिर की शर्ते पूरी नहीं करता है। बल्कि  यह नाथ पन्थ का शेषांश है, इसका रामानन्द समुदाय से कोई सम्बन्ध नहीं है। मन्दिर के यह गौड़िय वास्तु शैली का कोई प्रमाण नहीं है।

भगवान बुद्ध ने अपना धर्म प्रचार सारनाथ से शुरू किया, जिसे पहले “सारंग नाथ” के नाम से जाना जाता था। इसका प्राचीन नाम ऋषियों द्वारा स्थापित जैविक उद्यान। बुद्ध के समय ऐसे ऋषि पत्तन मृगदाव कहा जाता था। बुद्ध द्वारा प्रथम दीक्षा मगध में दी गयी थी । दिक्षित व्यष्टि थे सारीपुत्त  और मोदगलायन।

वैष्णो मत और बौद्ध मत के सम्मिश्रण में जहां कहीं वैष्णव मत प्रबल था, वहाॅ पर विष्णु को बौद्ध प्रतिमा के ऊपर  उत्कीर्ण किया गया था। फिर भी यदि कहीं बौद्ध मत प्रबल था तो बुद्ध को विष्णु प्रतिमा के ऊपर उत्कीर्ण किया गया, जैसा कि गोरखपुर के विंध्यवासिनी पार्क में देखने को मिला है और जिसको लोकेश्वर विष्णु का नाम दिया गया है। शैव मत या  वैष्णो मत जहां बौद्ध मत पर छा गया। वहां की प्रतिमा में बुध की स्थापित शिव या  विष्णु से नीचे हो गयी। शैव मत और वैष्णव मत का बौद्ध मत पर व्यापक प्रभाव है तथा जहां बौद्ध मत जनता में प्रभावकारी और लोकप्रिय बना रहा,वहों इसका एक नए रूप में रूपांतरण हुआ। इस तरह के प्रभावों के तहत बुद्ध की प्रतिमा पवित्र धागे और जनेऊ से सज्जित हुई।

गुप्त काल के दौरान दौर में ब्राह्मण धर्म प्रवल हुआ, विशेष कर परवर्ती पौराणिक काल के दौरान जब मुख्यत: शासकों  द्वारा पौराणिक धर्म को अपना लिया गया था। ब्राह्मणों के प्रयाग सम्मेलन में ब्राह्मण धर्म को स्थापित करने का निर्णय लिया गया था। इसके परिणाम स्वरूप नाथ मत के बहुत से अनुयायियों ने  पौराणिक मत अपना लिया था। इस तरह के धर्म परिवर्तन है। हिन्दू बुनकरों को निम्न सामाजिक दर्जे का समझ गया था। हालांकि उनके द्वारा छुआ हुआ पानी उच्च जातियों द्वारा ग्रहण किया जा सकता था। जिन्होंने मुस्लिम धर्म अपना लिया वे मोमिन या अंसारी या अनुसूचित जाति के मुस्लमान कहलाए। नाथ पन्थ के केन्द्र के पास बहुत से मुसलमान जुलाहे पाये जा सकते हैं।

यथा– गोरखनाथ मंन्दिर के आस-पास जो उन लोगों का पवित्र स्थान हुआ करता था। बिहार में भागलपुर के पास नाथ नगर के आस -पास गाँवों में वे लोग मोमिन बन गये। मुसलमान जुलाहों एवं हिन्दू बुनकरों के बीच बहुत कम संस्कृतिक पार्थक्य है। उदाहरण के तौर पर दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। केवल सिया लोग उर्दू या उर्दू मिश्रित भोजपुरी बोलते हैं। सुन्नियों की भी दो भाषाएं है-हनीफ और बहाबी। बंगाली मुसलमान बहाबी वर्ग से जुड़े हैं। जबकि क्षेत्रिय मुसलमान लोग हनीफ वर्ग से जुड़े हैं। सभी हनीफ लोग भोजपुरी बोलते हैं क्योंकि वे गौर शिया है।

प्राचीन भोजपुरी श्री हर्ष लिपि या कुटिला लिपि में लिखी जाती थी। पश्चिमी अर्ध मागधी  भोजपुरी की मां है। मागधी  प्राकृति की दो पुत्री भाषऍ थी- पूर्वी अर्ध मागधी और पश्चिमी अर्ध मागधी। पश्चिमी अर्ध मागधी की चार पुत्रियॉ है -भोजपुरी, मगही, नागपुरी,और छत्तीसगढ़ी। पूर्वी अर्ध मागधी मृत होने से पूर्व अपनी छ: बेटियों को छोड़ गई- असमी, बांगला, अंगिका,उडिया, मैथिली,और कौशली। मगध के पश्चिम की और करीब 4000 वर्ष पूर्व शौरसेनी प्रकृत थी। इसका अर्ध शौरसेनी प्राकृत  में रूपान्तरण हुआ, जिसमें कालान्तर में पांच पुत्री भाषाऍ, बधेली, बुन्देली, अवधी, ब्रज एवं हरियाणवी रूपान्तरित हुई।

ये पाॅचो भाषाएँ  साधारणत:  इस युग की बोल-चाल की भाषाएं हैं। हरियाणवी भाषा, तुर्की और फारसी के साथ सम्मिश्रित होकर उर्दू के रूप में परिणत हुई। फारसी की मूल लिपि खरोष्ठी थी।   भारत में इसने अरबी लिपि में रूपान्तरण पाया। अरबी और  फारसी लिपियों के बीच एक सुस्पष्ट अन्तर है। औरंगजेब के शासनकाल में फारसी लिपि में उर्दू राजकीय भाषा बन गयी तथा उसी युग से भोजपुरी का पतन शुरू हो गया। रामानन्द स्वामी के ऊपर नाथ पन्थ की अपेक्षा वैष्णव मत का प्रभाव बहुत अधिक था, बावजूद इस तथ्य की रामानन्द स्वामी की रचनाएं व्यक्त करती है कि वह नाथ पन्थ से प्रभावित थे । प्रयाग में ब्राह्मण सम्मेलन के बाद पौराणिक धर्म का स्वर्ण युग प्रारम्भ हो गया और यह पूरे भारत में फैल गया।

गोरखपुर 31जनवरी 1984