Prabhat Samgiita No 1971

प्रभात संगीत नंबर-1971

आनंदेरइ एइ निमंत्रण
तुमि एका कांद केनो
कुसुमोच्छासे प्राणेर् आबेशे
सबार संगे नाहि मिशे
हांसि खुशिते सबे उच्छल
नीरधि-उर्मि नृत्ये चपल
अणुपरमाणु भाबार चंचल
दूर सरेआछो कार आने
हताश होबार नेइ प्रयोजन
विश्वस्रष्टा तोमारओ आपन
सुस्मित सेइ परम सुजन
तोमारेओ जेनो भालोबासे


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भावांर्थ—-
हे मानव,आनंद के आमंत्रण पर तुम अकेले बैठकर क्आनआ हैयों रो रहे हो?आनंद का आह्वान क्या सुन नहीं पा रहे हो?तुम्हारे आशाआशा नरोम रोम में,छिद्र छिद्र मे आनंद का यह आह्वान तुम्इरहें याद दिला रहा है कि तुम अमृत की संतान हो,आनंद से ही तुम्हारा जन्म हुआ है।हताशा निराशा तुम्हारा स्वभाव नहीं।आनंद के स्रोत से तुम आये हो।फिर क्यों नहीं एक खिले फूल की सुवास की तरह प्राण के आवेग से,हृदय की मधुर स्निग्धता के साथ सबके साथ घुलमिल क्यों नहीं जाते?

इस पृथ्वी पर यह त्योहार का अवसर है।युगों बाद आनंद का अवतरण जो हुआ है!प्रकृति भी नृत्यरता है,सागर की उर्मिला भी नृत्यचंचल है।अणु परमाणु भी आनंद से आवेशित हैं।फुहारा से जैसे जलकण निरंतर उच्छ्वसित होकर बाहर की ओर निकलते हैं,आनंदरूप झरने से वैसे ही निरंतर आनंद के कण उच्छ्वसित होकर बाहर निकल रहे हैं।आनंद जहां पूर्ण है,अभाव जहां शून्य है वहां इच्छा नाम की कोई शक्ति काम नहीं कर सकती।इच्छा का विषय ही आनंद है क्योंकि इच्छामात्र ही आनंद चाहती है और आनंद पाने के बाद इच्छा अपने आप में विलीन हो जाती है।आनंद तो तुम्हारा ही खोया धन है,जिसे फिर से पाने का अवसर तुमको मिल गया है।फिर दूर रहकर किसकी आशा में प्रतीक्षा कर रहे हो?हताशा का कोई प्रयोजन नहीं,सृष्टि का रचयिता तुम्हारा सबसे अपना है।चेहरे पर मुस्कान लाओ।वह बहुत दयालु है,वत्सल है,करूणानिधि है।तुमको बहुत प्यार करता है।उनकी तरफ जरा झांक कर तो देखो!

प्रद्युम्न नारायण सिंह दादाजी द्वारा अनुवादित