कृष्ण जन्माष्टमी की दो पत्तियां
भादों कृष्ण अष्टमी को जन्म ए पाए,
उनका नाम कृष्ण रखाए।

छोटे-छोटे पांव में घुंघरू बजावे ,
मुरली की धुन पर सबको नचावे।
गायों को अपने वृंदावन ले आवें,
ग्वाल -बाल संग गैया चारावे।
मटकी पर गोपियों की कंकर चलावे,
जिस यमुना तट पर गोपियाँ नहाए ।
राधा संग रास निधिवन में रचाए,
हाथ में मुरली और माथे पर मोर सजावे।
माखन खा कर गाय चरावे ,
यशोदा के लाल सबके मन भावे।
गले वैजयंती, अधर पर मुरली बजावे,
गोधूलि के समय घर लौट आवें।
गोवर्धन को उंगली पर उठावे,
मात-पिता को कारागार से छुड़ावे।
कृष्ण कृष्ण का जो कीर्तन लगावे ,
जीवन अपना धन्यवाद बनावे।
हर साल भादोअष्टमी तिथि आवे,
मिल कर सब कृष्ण जन्माष्टमी मनावे।
रचनाकार_ सरिता मौर्य
कुशीनगर( उत्तर प्रदेश)
कृष्ण तेरा धरा पर आना अकारण तो नहीं |
कृष्ण तेरा धरा पर आना अकारण तो नहीं |
परित्राण मानवता का हो साधारण तो नहीं |
निज जीवन उत्सर्ग हो समाज में हो कुछ काम |
भूखे पेट भोजन भी मिले तभी हो प्रभु का नाम |
संघर्ष जीवन में सुवास बिखेरे तपे स्वर्ण सा जीवन |
कर्म प्रधान जीवन हो जाए और इसका होवे तर्पण |
पाप शक्ति से विजय दिलाने तूने किया एक संकल्प |
आततायी को सजा दिलाने तूने रखा न कोई विकल्प |
हे परमेश्वर इस धरा धाम पर तेरी चरण ऱज़ मिल जाए |
गोपी, राधा, मीरा , अर्जुन बन ये जीवन सफल हो जाए |
गौतम प्रधान “मुसाफिर”
केलो विहार रायगढ़ (छ०ग०)
लड़ो! तुम लड़ो!
लड़ो! तुम लड़ो! तुम वीर अभिमन्यु की तरह लड़ो।
क्युकी तुम्हारी पैदाईस ही लड़ने के लिए हुई है।
तुम स्वछंद हो, तुम मुक्त हो। मुक्त होने के लिए तुम लड़ो।

ईस बंधन से मुक्त होने के लिए तुम लड़ो।
सार्थक होने के लिए तुम लड़ो। तुम्हारी सार्थकता तुम्हारे लड़ने में ही है।
हार का आभास हो, मृत्यु की प्रतिछाया हो, पर तुम लड़ो।
क्या उस वीर अभिमन्यु ने लड़ना छोड़ा था जब मृत्यु उसके सर पे तांडव कर रही थी।
तुम उस वीर अभिमन्यु की तरह हारने के लिए लड़ो।
लड़ो क्युकी लड़ने में ही तुम्हारी सार्थकता है।
उस परमात्मा को पाने के लिए तुम लड़ो,
क्युकी उस परम लक्ष्य को पाने के लिए तुम आए हो।
तुम स्वछंद हो, तुम मुक्त हो। मुक्त होने के लिए तुम लड़ो।
अभिमन्यु देव
कर्म के प्रति समर्पण होना चाहिए,
पूजा का महत्व हृदय संजोना चाहिए।
बुद्धि का संतुलन बनाए रखना सदा,
सबके समन्वय से जीवन होना चाहिए।

आस्था विश्वास अपनी जगह है,
कर्म की प्रधानता अपनी जगह है।
कृष्ण ने विराट रूप दिखला बताया,
कर्म से फल प्राप्ति अपनी जगह है।
दिग्भ्रमित अर्जुन समर में खड़ा था,
व्याकुल व्यथित चहूं ओर तक रहा था।
कर्म से भी विचलित जब वह हो गया,
प्रार्थना ही उसके लिए सम्बल बड़ा था।
निराशा के क्षणों में, आतुरता से पुकारता,
क्या करूँ राह दिखाओ, कृष्ण को पुकारता।
हो गया नत मस्तक वह, आराध्य के सामने,
भक्ति समर्पण भाव, व्याकुलता से पुकारता।
तब कृष्ण ने उसे, विराट रूप दिखा दिया,
समर प्रांगण में, सत्य से अवगत करा दिया।
कर्म का सिद्धांत क्या, बुद्धि का प्रयोग कैसे,
आस्था विश्वास पूजा, महत्व भी बता दिया।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
53 महालक्ष्मी एनक्लेव, मुजफ्फरनगर 251001
उत्तर प्रदेश
🌸सुनो विश्व के सच्चे बच्चे
सुनो विश्व के सच्चे बच्चे, आप धरा अरमान हो ।
बढो सदा ही सुंदर पथ पर, आप अखिल कल्याण हो ।।

आए बाधा लाख सामने, चूर्ण करो पल में सदा ।
टीके नहीं पथ कोई अड़चन, आए गर तूफां कदा ।।
बढ़ो रौंदकर अग्र जगत में, सबल भीष्ण प्रहार को ।
पार करो तुम हिम्मत रखकर, सदा सामने ज्वार को ।।
बुज दिल बनो न मेरे बच्चे, तुम जग के वर्तमान हो ।
बढ़ो सदा ही सुंदर पथ पर, आप अखिल कल्याण हो ।।
अमर्त्य वीर पुत्र धरती के, सदा प्रगति पथ पर बढो ।
बन अभिज्ञानी नहीं अज्ञानी, आप भव्य जीवन गढ़ो ।।
हो सनातनी धर्म अनुरागी, कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहो ।
मन विचलित हो यदि तुम्हारे, परम पिता का पद गहो ।।
है शुभ बालक और बालिकाएंँ जगत अतुल मेहमान हो ।
बढो सदा ही सुंदर पथ पर, आप अखिल कल्याण हो ।।
पीछे क्या है नहीं देखना, देखो सदा भविष्य को ।
स्वर्ण युक्त वर्तमान तुम्हारा, परख सदा ही लक्ष्य को ।।
जगा हृदय में ज्ञानपूंज को, ज्योतिर्मय हो जिंदगी ।
जड़ तमिश्रा से ऊपर हो, करो ईश की बंदगी ।।
चरण चुमेगी असंख्य कृतियाँ, तुम विश्व अभिज्ञान हो ।।
बढो सदा ही सुंदर पथ पर, आप अखिल कल्याण हो ।।
सुंदर कुमारी
समस्तीपुर।
मेरे मन के मोहन
हे श्याम, तुम्हारी बाँसुरी जब
मन के आँगन में बजती है,
सूनी-सूनी साँसों में भी
एक मधुर धुन सजती है।

मोर मुकुट की छाया में
मेरा हर भय खो जाता है,
तेरे चरणों की धूल मिले तो
जीवन धन्य हो जाता है।
न धन माँगूँ, न यश माँगूँ,
न जग की कोई अभिलाषा,
बस इतनी कृपा करो कान्हा—
हर श्वास बने तेरी भाषा।
जब-जब मन संसार में उलझे,
तेरा नाम सहारा बनता,
अँधियारे पथ पर गिरता हूँ तो
“गोविंद” दीप हमारा बनता।
राधा के प्रेम-सा निर्मल कर दो,
मीरा जैसा मन दे दो,
मुझमें जो कुछ मेरा-मेरा है,
सब अपने चरणों में ले लो।
हे पार्थ के सारथी, मेरे भी
जीवन-रथ की डोर थाम लो,
कर्म करूँ मैं निष्काम भाव से,
फल की चिंता तुम पर छोड़ दूँ।
अंत समय जब नयन झुकें और
जग की सारी राहें छूटें,
मेरे अधरों पर नाम तुम्हारा,
मेरी आत्मा तुममें टूटे।
हे नंदलाला, हे गिरधारी,
तुम ही आरंभ, तुम ही अंत,
तुममें ही मेरी भक्ति समाए,
तुममें ही मेरा जीवन अनंत।
कृष्णा तुम मेरे मन को भाये,
श्याम-श्याम धड़कन गाए—
जिस हृदय में कृष्ण बस जाएँ,
वह हृदय स्वयं वृंदावन हो जाए
मीरा प्रकाश

