आचार्य दिलीप
नेपाल एक ताज़ा उदाहरण है, उसको देखते हुए उपरोक्त की व्याख्या करते हैं। स्थापित व्यवस्था या सरकार के विरोध में जब जन आंदोलन होता है और उसमें युवा की अधिकता होती है तो वह उग्र हो जाता है। उसमें से ही कुछ लोग अराजक हो जाते हैं और कुछ लोगों की विद्रोह की अभिव्यक्ति हिंसा में परिणीति होती है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह कैसे स्वभाविक है तथा इसके कारण को जानने के प्रयास करते हैं। क्या यह प्राउट सिद्धांत सम्मत है।
जन आंदोलन जो उग्र नहीं होते तो उसे कभी किसी के लिए ख़तरा नहीं माना जाता है। जन आंदोलन के प्रभावी होने के लिए यह आवश्यक है कि जो लोग आंदोलन में परोक्ष भाव से भाग नहीं ले रहे हैं वो भी अपनी मौन स्वीकृति दें। ज़रूरत पढ़ने पर वह कम से कम विरोध न करें। विरोध कौन करता है जो की बौद्धिक रूप से जागरूक हैं। आंदोलन से पहले यह आवश्यक है कि ऐसे लोग जो कि बौद्धिक रूप से जागरूक हैं उन तक अपनी विचार धारा रूप बतायी जाए। जन आंदोलन से पहले यह आवश्यक है की बौद्धिक रूप से जागरूक लोगों के मन में अपना विचार भर दिया जाए। येसा करने से इसके विरोध की संभावना कम हो जाती है तथा आंदोलन को मौन स्वीकृति की संभावना बढ़ जाएगी। इसके लिए विभिन्न प्रकार से अपनी बात पहुँचाई जा सकती है जैसे की प्रेस वार्ता, विज्ञप्ति के द्वारा, सेमिनार के द्वारा, कॉलेज विश्वविद्यालय में जाकर व्याख्यान के द्वारा या अख़बारों पत्रिकाओं में ली लेख के द्वारा। इन सभी प्रक्रियाओं का प्रयोग करना चाहिए।
प्राउट के अनुसार मनुष्य गुणों की प्रधानता के आधार पर चार भागों में बाँटा गया है। शूद्र, क्षत्रिय, वैश्य और विप्र। ये गुण सभी मनुष्यों में विद्यमान् होते हैं तथा विशेष स्थिति में यह मनुष्य के अन्दर यह मुख्य रूप से परिलक्षित होते हैं। ये शब्द जाति सूचक नहीं वरन गुण सूचक हैं।
१। शुद्र वो लोग हैं जो मात्र वर्तमान का ध्यान रखते हुए जीते हैं तथा उनके अंदर अपनी तरफ़ से कोई रचनात्मक कार्य करने की क्षमता नहीं होती।
२। क्षेत्रीय वो लोग हैं जो शरीर की शक्ति को प्रधानता देते हैं वो भूत का गौरव का ध्यान रखते हुए वर्तमान में ही जीवन जीते हैं।
३। वैश्व वो लोग हैं जो भौतिक संसाधन पर अपने आधिपत्य पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, बौद्धिक रूप से उन्नत होते हुए भी भीरु प्रवृत्त के होते हैं तथा अपना स्वार्थ सिद्धि के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
४। विप्र वो लोग हैं जो अपने वर्तमान, भूत तथा भविष्य का ध्यान रखते हुए लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। उनका ध्यान बौद्धिक बल का प्रयोग यथासंभव करना ही उनका लक्ष्य होता है।
भौतिक संसाधन का आनन्द वैश्य, विप्र, क्षत्रीय सभी लोग चाहते हैं लेकिन उनकी आनन्द लेने के तरीके में अंतर है। उदाहरण के लिए क्षत्रियों को भौतिक संसाधन जो उसने अपने शक्ति बल से प्राप्त किया है उसका उपभोग करके लेता है। विप्र भी भौतिक संसाधन का उपभोग लेने में आनंद लेता है लेकिन भौतिक संसाधनों का सृजन ख़ुद से लड़कर नहीं लेकिन दूसरे की लड़ाई द्वारा प्राप्त संसाधन से लेता है। वैश्य भी भौतिक संसाधन का आनन्द उसके उपभोग से न लेकर उसके संग्रह में लेता हैं , दूसरे शब्दों में, उसे भौतिक संसाधन के उपभोग से ज़्यादा आनन्द उसके संग्रह करने में होता है।
उपरोक्त मनुष्य के गुणों के आधार पर वर्गीकरण केवल एक संदर्भ में दिया जा रहा है जिससे की मूल विषय को समझने में आसानी हो सके।
नेपाल मे युवा लोगों (Gen Z) का आंदोलन देश व्यापी हुआ। वर्तमान की राजनीतिक व्यवस्था तथा समाज में भ्रष्टाचार, राजनीतिक लोगों का संभ्रांत समूह जैसा उभरकर सामने आना, बेरोज़गारी आदि मुख्य मुद्दे थे। नेपाल मे युवा लोगों (Gen Z) का आंदोलन जैसा कि उभरकर सामने आया उसका वेग तथा अनियंत्रित स्वभाव, किसी को नहीं मालूम कि आगे क्या मिलेगा, लक्ष्य हीनता, किसी की भी नहीं सुनना, उससे पता चलता है कि कोई विशेष विचार धारा आंदोलन के पीछे नहीं है। बदलाव का भाव, बदला लेने का भाव ही परम था।
युवा जब अनियंत्रित हो तथा नेपाली जनमानस मौन, मूक दृष्टा रही, जिससे ये चलता है कि नेपाल की वर्तमान व्यवस्था से सभी त्रस्त थे। इसलिए आंदोलन विरोध का स्वर नहीं उठा और उनके प्रति सहानुभूति थी।
जन आंदोलन उग्र है, अराजक है, हिंसक है, इससे पता चलता है कि समाज के लोगों का दमन था और वो एक विक्षुब्ध शुद्र के रूप में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश थे, और उनकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति का ऐसा होना उनके स्वभाव के अनुरूप था।
अब प्रश्न यह भी है कि क्या शांतिपूर्ण आंदोलन से कुछ भी प्रभाव होगा। हाँ होता है, लेकिन यह मात्र जानता में जागरूकता ला सकता है तथा चुनाव में उसका प्रभाव दिखाई पड़ सकता है लेकिन उग्र, अराजक और हिंसक आंदोलन ही सत्ता परिवर्तन की क्षमता रखता है। जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन से काम नहीं चलेगा तथा दमन शासन का माध्यम बन जाएं तो आन्दोलन हिंसात्मक हो तभी वह प्रभावशाली रहता है।
आंदोलन केवल व्यक्ति विरोध, सरकार विरोध , व्यवस्था विरोध पर होने से आगे कुछ नहीं मिलेगा। व्यक्ति कुछ सीमा तक प्रगति ला सकता है लेकिन सभी के हित के लिये आज की सभी व्यवस्थाएँ ( साम्यवादी , पूँजीवादी या समाज वादी) अक्षम हैं। आंदोलन नई व्यवस्था या नई विचार धारा पर आधारित होनी चाहिये तभी नई संभावनाओं को वह जन्म देगी।
यूवा उग्र होकर सरकार बदल सकता है लेकिन दिशाहीन यूवा बाद में पछतायेगा। (असम में भी एक नई युवा आंदोलन से निकली हुई सरकार बनी थी , असम गण परिषद, क्या हुआ?) युवा अपने शक्ति प्रदर्शन से पहले समाधान के रास्ते को वैचारिक स्तर पर स्थापित या परखना होगा। क्या नेपाल की नई सरकार जन भावनाओं का सम्मान कर पायेगी? मेरी समझ से , उन्नत विचार धारा के अभाव में , घोर निराशा ही हाथ लगेगी।
प्राउट, एक सामाजिक आर्थिक सिद्धांत, को जानें समझें जिसमें सभी समस्याओं का समाधान है। अभी भी समय है नई सरकार को विचार मंथन का अवसर दें।
आचार्य दिलीप
समाज सचिव , प्रगतिशील ब्रज समाज।
