Prabhat Samgiita No. 4505

 

Songs of New Dawn by Shri Shri Anandamurti Ji

 

 

ए गान आमार जीवनेर आनन्दधारा।

अनादि हते अनन्तते बाजाय मोर एकतारा।। 

 

      ए गान कखनो कोनो बाधा माने ना, 

      ए गान कारो मने व्यथा देय ना।

      ए गान भरे प्राण करे देय आपनहारा।।

 

ए गान कखनो नति जानाय ना, 

ए गान कारेओ विनति करे ना। 

ए गान द्युतिमान, माने शुधु एकइ ध्रुवतारा।। 

 

भावार्थ:

हे प्रभु, मेरा यह गीत मेरे जीवन में परम-आनंद का प्रवाह है। अनादि से अनंत तक के धुन और गीत को मेरा यह एकतारा प्रतिध्वनित करता रहा है।

यह गीत कभी भी आगे बढ़ने में किसी बाधा की ओर ध्यान नहीं देता और यह गीत कभी किसी के मन को कष्ट पहुँचाने का भाव नहीं रखता। यह गीत तो प्राणशक्ति से व्यक्ति को भर देता है और व्यक्ति स्वयं को ही परम-आनंद में खो देता है।

यह गीत न किसी को झुकने के लिए कहता है, न ही खुद किसी से अनुनय-विनय करता है। यह स्वयंप्रकाशीत गीत है जिसकी केवल एक ही अभिलाषा है और जिसके लिए केवल एक ही ध्रुवतारा हैं – ‘परमपुरुष’, जिनकी ओर यह प्रभात संगीत व्यक्ति को ले चलता है।