Songs of New Dawn by Shri Shri Anandamurti Ji

प्रभात संगीत क्रमांक 1285

कुय़ाशार कालो मुछे दिय़े,
हताशार रेश दूरे सरिय़े,
आशार प्रदीप हाते निय़े,
निशीथे से एसेछिलो।

प्रीतिते आँखि छिल भरा,
द्युतिते आनन आलो-करा,
नीरबे पथ परिक्रमा,
सेरे से द्वारे थेमेछिलो।

महाकाश मेघे माखा छिलो,
चिदाकाश भाबे भरा छिलो,
तार कथा भेबे भेबे,
नय़ने जल जमाछिलो।

यूथीरा से श्राबणी सन्ध्याय,
गन्ध ढेलेछिलो हाओवाय,
मेघेर आड़ाले चन्द्रमाय,
देखे शिखीरा नेचेछिलो।

से चरणधूलिते करुणा छिलो,
मोर मनने माया छिलो,
मायाते से धूलिर स्पर्शे,
स्पन्दन जेगे उठेछिलो।

भावार्थ:

कुहासा रूपी जड़ता के अंधकार को मिटाते हुए, निराशा के निशानों को मिटाते हुए,

हाथों में आशा की उज्ज्वल दीपक लिए हुए, मेरे प्रभु रात्रि–काल में मेरे पास आए।

उनकी आँखें प्रेम से भरी हुई थीं और उनका चेहरा तेज से आलोकित था।

अपनी नियमित परिक्रमा पथ छोड़कर वे नीरवतापूर्वक मेरे द्वार पर रुक गए।

विशाल आकाश बादलों से आच्छादित था लेकिन मेरे मन का आकाश उनके भाव से भरा हुआ था।

उनके बारे में सोच–सोचकर मेरी आँखों में आँसू भर गए।

श्रावण की उस संध्या को चंपा के फूल हवा में सुगंध फैला रहे थे।

बादलों के पीछे छिपे चाँद को देखकर मोर भी खुशी से नाचने लगा।

उनके चरणों की धूल में करुणा थी, लेकिन मेरे मन में माया का भ्रम बना हुआ था।

उस माया में प्रभु की चरणधूलि के स्पर्श से सुखद स्पंदन जागृत हो गई।

Compiled by Supriya Goswami