Anandam – Hindi Poem – अति-संचय : जगत संग्राम : भिखारिन

अति-संचय

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संचय मानव का स्वभाव है,
अति संचय अन्याय का घर।
उतना ही जोड़ो धन को तुम,
जितने से बसे तुम्हारा घर।।

यह सृष्टि हमें जो देती है,
मिल बाँट प्रेम से खाना है।
अति संचय से घट जायेगा,
हर प्राणी को जो पाना है।।

तुम खाली हाथ ही आये हो,
और खाली हाथ ही जाना है।
जोड़ोगे छीन झपट कर धन,
पर सब कुछ छोड़ ही जाना है।।

लेलो समाज की अनुमति तुम ,
फिर उतना ही संचय कर लो।
बस अल्प बचत अपनालो तुम,
सादे जीवन का व्रत लेलो।।

यह विश्व मिलित पैत्रिक धन है,
ईश्वर ही मालिक है इसका।
उपयोग करो मिल कर सब तुम,
स्वामित्व सभी में है उसका।।

स्वामी बन बैठा एक व्यक्ति,
तो पूंजीवाद उभर आया।
जब लिया मिल्कियत सत्ता ने,
तो साम्यवाद बन लहराया।।

एक मध्य मार्ग अपना लो तुम,
अति संचय से बचकर रहना।
यह पूँजी जड़ता का घर है,
बस आय विषमता से बचना।।

संध्या चक्रवर्ती


 

जगत संग्राम

ऐसा हो जग नवल संग्राम ।
‌पाए जन शुभ विमल आयाम ।।

हो परिवर्तन सुंदर जग में ।
बढ़ते नूतन पथ निज पग में ।।
मिटे धरा से सब अंधेरा ।
हो जीवन में सदा सवेरा ।।
चले प्रगति पथ सदा अविराम ।
पाए जन शुभ विमल आयाम ।।

धरा अधिक सद् विप्र बनेंगे ।
सुंदर भव्यम कर्म करेंगे ।।
विप्र साथ में विप्र बनेंगे ।
धरा अलौकिक रूप सजेंगे ।।
सभी हिया में बसे घनश्याम ।
पाए जन गण विमल आयाम ।।

क्षत्रिय संगे क्षत्रिय बनकर ।
वैश्य साथ में वैश्य बनेंगे ।।
शुद्र संग में शुद्र बनेंगे ।
सदा जगत में जंग करेंगे ।।
साथ रहेंगे उन्हें घनश्याम ।
पाए जन गण विमल आयाम ।।

नूतन अनुपम विश्व बनेंगे ।
एक भावना हिया सजेंगे ।।
अतुलित बगिया पुष्प खिलेंगे ।
सबके हृदय सुवास भरेंगे ।।
बने धरा शुभ नवल पैगाम ।
पाए जन गण विमल आयाम ।।

सुंदर कुमारी
समस्तीपुर ।

 


भिखारिन

 

भूख से व्याकुल
चित्त से आकुल
बेबस बदहवास
कंठ में लिए प्यास

फटी धोती में खुद को छुपाती हुई
लाजवंती पर न लजाती हुई
मंदिर की सीढ़ियों पर ये कौन बैठी है !

जन्म लेते ही किस्मत फोड़ गए
क्या कहा !
इसके जन्मदाता ही इसे
मंदिर की सीढ़ियों पर छोड़ गए।

तो क्या मंदिर की सीढ़ियों से
किसी ने उठाया नही
उस पत्थर की मूरत के सिवा
किसी ने अपनाया नही

इसका कोई नाम नही है
जो ठीक लगे रख लो
या फिर लोग भिखारिन कहते हैं
तुम भी वही कह लो।

केश बिखरे आंखे पथराई
तन पर धूप से कालिमा है छाई
वेश जान बूझकर ऐसा बनाया नही है।
हाँ ये सच है उसने कई दिन से कुछ खाया नही है।

अन्न की चाह में
मिट्टी का टूटा पात्र लिए बैठी है।
पेट की पुकार पर चीखती है चिल्लाती है
आवाज कर्कश हो गई है
किसी अभिमान में नही ऐंठी है।

और उस पर पूजा की थाल लिए
सीढ़ियों से गुजरते लोग
जिनका ध्यान भूख से बिलखते मन पर नही
बल्कि फटे चिथड़े कपड़ो से झांकते तन पर है

वे भला उस अभागिन को क्या ही दे पाएंगे
हरिनाम बोलेंगे और आगे बढ़ जाएंगे।

माफ करना !
पर जब गर्मी लू और ठंड से बचाने को
एक पत्थर की मूर्ति के लिए
वातानुकूलक लगा सकते हो,
गर्म ऊनी कपड़े पहना सकते हो
तो क्या इन मजबूरों के लिए
तुम्हारे पास कोई उपक्रम नही है

या फिर सब कुछ एक ढोंग है छलावा है
कोई सार्थक अनुक्रम नही है।

घबराओ मत !
ये सवाल मेरे नही हैं
मैं भी तुम्हारे जैसा ही हूँ
कोई फर्क नही है

ये तो उसी के प्रश्न है
जिसका कोई नाम नही है
जो भी चाहे रख लो
लोग भिखारिन कहते हैं
तुम भी वही कह लो।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’