Prabhat Samgiita No./ प्रभात संगीत क्रमांक 108

Songs of New Dawn by Shri Shri Anandamurti Ji

 

रौद्रेर खर तापे,

ग्रीष्मेर दाबदाहे,

बेला-मालती स्निग्ध समीर,

किछु शीतलता आने,

मन आरो शीतलता चाहे। 

 

सहकारशाखा भारेते आनत,

थरे थरे फले जम्बुक नत,

प्रचण्ड ताप सहे ना ये आर,

मन सदा एइ कहे। 

 

नैश बातासे कुसुम सुबासे,

किछु उपशम आने,

मन आरो उपशम चाहे। 

 

शत जनमेर शत क्लेश यत,

ग्रीष्मेते येन हलो एकीभूत,

रुद्र देबता बृष्टि नामाओ,

मन सदा एइ कहे। 

 

भावार्थ:

सूर्य के प्रचंड ताप और ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती गर्मी के समान क्लेश युक्त मेरे जीवन में, बेला और मालती की खुशबू से सुगंधित मंद हवा जैसे क्षणिक सुख, मुझे कुछ शीतलता देते हैं। लेकिन मेरा मन और भी अधिक शीतलता की इच्छा रखता है।

आम से लदी हुई वृक्षों की झुकी हुई शाखाएं और कतारों में फले जामुन से नत डाल जैसे क्षणिक सुख जीवन में मिलते हैं। लेकिन ये भीषण गर्मी जैसी सांसारिक पीड़ा अब और सहन नहीं होती, मेरा मन हर वक्त यही कहता रहता है।

मेरे जीवन के रात्रि काल में, फूलों की खुशबू से मधुमय मंद हवा जैसी तुम्हारी कृपा वर्षा की कुछ बूंदें, कुछ राहत देती हैं। परंतु यह मन अब और भी अधिक राहत चाहता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि सैकड़ों जन्मों के सैकड़ों कष्ट, ग्रीष्म ऋतु समान मेरे इस जीवनकाल में एकीभूत हो गए हैं। हे मेरे रुद्र देवता अब तो अपनी पूर्ण कृपा वृष्टि मुझ पर कर दो, मेरा मन हर वक्त यही कहता रहता है।