Prabhat Samgiita 3357 :

Songs of New Dawn by Shri Shri Anandamurti Ji 
प्रभात संगीत क्रमांक 3357 

प्राणेरी उजाने छंदे गाने,
एसो प्रभु मनविताने।
आमार आँधार मोरे,
रेखेछे कुहेली भरे
सराओ ताहारे स्वनने।
कमल परिमल गंध वह बहे,
दूरे रेखेछि तारे थेकेछि बद्ध मोहे।
मोर आँखि खुले दिले बाँधन सरिये दिले,
आजिकार ए नवारुणे।
फागुनेर हिंदोले अशोक पलाश दोले,
रङबेरङेर मेला वसंत गुलाले,
रङेर धरणी आज साजियाछे नव साज,
तुमि एसे साजाओ मने।

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भावार्थ: 
मेरे हृदय में गीतों और लय के माध्यम से ज्वार–भाटा लाते हुए, हे प्रभु तुम मेरे मन के कुंज में आ जाओ। घने कोहरे ने मुझे घोर अंधकार से ढक रखा है, तुम उसे अपनी अलौकिक ध्वनि से हटा दो।
तुम्हारी कमल की खुशबू, पराग कणों के साथ हवा में बहकर आ रही थी, लेकिन मैं दुनियावी मोह की बंद कोठरी में ही मग्न रहने के कारण उस खुशबू को अपने आप से दूर रखा हुआ था। आज की नई सुबह के साथ तुमने ही मेरी आँखें खोल दीं और मोह के बंधन हटा दिये हैं।
वसंत ऋतु (फागुन) के दोलन से अशोक और पलाश के वृक्ष अब झूम रहे हैं। अनेकों रंगों का उत्सव इस वसंत में है और यह धरती कई रंगों से एक नया श्रृंगार की हुई है। ऐसे मौके पर तुम आ जाओ प्रभु और मेरे मन को भी सजा दो।
सुप्रिया गोस्वामी द्वारा संकलित