काशी: उत्तर-पूर्व भारतीय सभ्यता का इतिहास – श्री पी. आर. सरकार

श्री पी. आर. सरकार

अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित

वैदिक युग में वाराणसी के पूरे क्षेत्र को ‘काशी’ राज्य कहा जाता था। काशी ‘कश’ धातु से बना है। कश का तात्पर्य है चमकने वाला। मध्यकाल में वाराणसी नाम आया और दोनों नाम चलने लगे। बौद्धोत्तर युग में द्वादश शिव लिंगों के वर्णन में नाथ मत में इस वाराणसी का नाम आया है। वैसे 3000 वर्ष पूर्व के मागधी पुस्तक ‘उदय लयसन’ में भी इसका उल्लेख है। कुछ लोगों का यह मत-भाषा विज्ञान की दृष्टि से उचित नहीं प्रतीत होता कि वाराणसी वरूणा+अस्सी से आया है। यदि ऐसा होता तो इसका उच्चारण होता वरूनासी। वाराणसी दो शब्दों के योग से बना है- बार+अनस। अनस का अर्थ है पुनर्जन्म और बार का अर्थ है रोक देना अर्थात् जो पुनर्जन्म को रोक देता है। लोगों में ऐसी धारण है कि यहाँ मरने से पुनर्जन्म नहीं होता।

काशी राज्य का क्षेत्र था उत्तर हिमालय दक्षिण विन्ध्याचल जहाँ सोन और घाघरा (घर्घरा) मिलती हैं, पश्चिम प्रयाग और पूर्व जहाँ सोन और नारायणी मिलती हैं। काशी राजधानी थी।

अनेक प्रसिद्ध और बुद्धिमान राजाओं ने काशी राज्य पर शासन किया था। उनमें से एक थे राजा भोज जिन्होंने सांख्य दर्शन पर टीका लिखी थी। बाद में यह राजधानी बक्सर क्षेत्र के निकट डुमराव स्थानान्तरित कर दी गई। ऐसा इसलिए किया गया था कि सर्वदेशी प्रकृति का स्थान राजनीतिक राजधानी के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। भोजपुरी भाषा उसी स्थान के आधार पर विकसित हुई। पहले जब राजधानी काशी थी तो उसे काशिका कहा जाता था। पश्चिमी अर्द्धमगधी से इसका जन्म हुआ था।

मागधी भाषा की दो बेटियाँ थीं– पूर्वी अर्द्ध मागधी और पश्चिमी अर्द्धमागधी। पश्चिमी अर्द्धमागधी की चार पुत्रियाँ थीं, भोजपुरी, मगही, नागपुरिया और छत्तीसगढ़ी। पूर्वी अर्द्धमागधी एक मृत भाषा हो गई किन्तु उसकी छः पुत्रियाँ हुई- असमिया, बंगला, अंगिका, ओड़िया, मैथिली और कौशली। मगध के पश्चिम शौरसेनी प्राकृत लगभग 4000 वर्ष पूर्व बोली जाती थी।

भगवान श्री कृष्ण की मातृभाषा शौरसेनी प्राकृत थी। बाद में अर्द शौरसेनी में रूपान्तरित हो गई और फिर उससे पाँच बोलियों का जन्म हुआ– बघेली, बुन्देली, अवधी, ब्रज और हरियाणवी। हरियाणवी का मिश्रण जब टर्की और परसियन से हुआ तो उर्दू का जन्म हुआ। पर्सिया की मूल लिपि खरोष्ट्री थी। भारतवर्ष में वह अरबी में बदल गई। अरबी और पर्शियन लिपि में स्पष्ट अन्तर है। औरंगजेब के समय शासकीय भाषा उर्दू- पर्शियन लिपि में लिखने लगी तभी से भोजपुरी का पतन प्रारम्भ हुआ।

भोजपुर के लोग (न-तृत्त्व विज्ञान की दृष्टि से) ऑष्ट्रिको काकेशियन वर्ग के हैं। अर्थात् वे काकेशियन के उपवर्ग ऑष्ट्रिक इण्डिका हैं। ऑष्ट्रिकों के तीन वर्ग थे– इण्डिका, मलयेशियन और ऑष्ट्रिलियन। यह लोग मँझले कदकाठी के थे। गंगा के उत्तर के मंगोलियन रक्त की प्रधानता थी और उसके दक्षिण नीग्रो। परिणाम स्वरूप गंगा उत्तर के लोगों में गौरवर्ण की प्रधानता थी और दक्षिण साँवले रंग की। यहाँ की जलवायु अच्छी है किन्तु तराई अंचल के जल में आयोडीन की कमी पाई जाती है। गंगा के दोनों तरफ का जल स्वाथ्य के दृष्टि कोण से अच्छा है किन्तु सर्वोत्तम जल भभुआ का होता है।

पड़ोसी क्षेत्र ‘आरा’ अरण्यदेव (शिव) के नाम पर बना था। हरिश्चन्द्र उस क्षेत्र के राजा थे, जो गंगा के दक्षिणी क्षेत्र में था जिसका नामकरण (उनके पुत्र रोहिताश्व के आधार पर) रोहतास हुआ। हिमालय के दक्षिणी भाग को आसाम और बंगाल में ‘दियारा’ और गढ़वाल तथा कुमायूँ में ‘तराई’ कहा जाता था। नेपाल का दक्षिणी क्षेत्र जो भोजपुर का अंग है समतल है, जिसे मधेश या मध्यदेश कहा जाता है। उत्तरी क्षेत्र में गौरवर्ण और सम्पूर्ण दक्षिणी क्षेत्र मे श्यामवर्ण प्रधान लोगों का बाहुल्य है।

पहले इस भाषा को “काशिका” कहते थे। जब राजधानी भोजपुर में आने से भोजपुर भाषा कहने लगें।

लगभग 4000 हजार वर्ष पूर्व संस्कृत भाषा का रूपान्तरण सात प्राकृत भाषाओं (जनभाषा) में हुआ। मागधी प्राकृत उनमें से एक भाषा थी, जो प्रयाग के पूर्व उपयोग में आती थी। मागध चूँकि उस क्षेत्र का प्रसिद्ध स्थान था इसलिए उसका नाम मागधी प्राकृत हुआ। प्रयाग से सरहिन्द तक जनभाषा शौरसेनी प्राकृत हुई। कृष्ण यह भी एक भाषा बोलते थे।

सरहिन्द जो चण्डीगढ़ के पास स्थित है, जल प्रवाह का विभाजन स्थान है। उसके पूर्वी क्षेत्र की नदियाँ गंगा में मिल जाती है और अन्ततः बंगाल की खाड़ी में चली जाती हैं। उसके पश्चिमी क्षेत्र में प्रवाहित नदियाँ सिन्धु में मिलकर अरबियन समुद्र में मिल जाती हैं।

‘सरहिन्द’ का अर्थ है भारतवर्ष का सिर। सरहिन्द से हिन्दूकुश तक जनभाषा पैशाची प्राकृत थी। उत्तरी छोर पर स्थित कश्मीर घाटी उजवेकिस्तान बलूचिस्तान और दक्षिण रूस जनभाषा पश्चात्य प्राकृत सैन्धवी प्राकृत। गुजरात और राजस्थान में मालवी प्राकृत और महाराष्ट्र और गोवा में महाराष्ट्री प्राकृत का प्रयोग होता था। मागधी प्राकृत प्रयाग सम्पूर्ण पूर्वी क्षेत्र सल्किया तक जहाँ ब्रह्मपुत्र भारत में प्रवेश करती है, जनभाषा के रूप में प्रयुक्त होती थी। प्रायः एक भाषा एक हजार वर्ष तक और लिपि दो हजार वर्षों तक अस्तित्व में रहती है।

मागधी प्राकृत की दो बेटियां थी 1. अर्द्ध मागधी 2. अर्द्ध पूर्व मागधी 3. अर्द्ध पश्चिमी मागधी की चार बेटियां थी, भोजपुरी, मगधी, नागपुरी और छत्तीसगढ़ी और पूर्व मागधी की मैथली, अंगीका, ओडीया और असामी। वैसी ही शौरसेनी प्राकृत ने जन्म दिया अर्द शौरसेनी इसकी बेटियां है– अवधी, बुन्देली, बघेली, ब्रज और हरियाणवी। हरियाणवी, दिल्ली के आसपास कि भाषा थी। जब तुर्क भारत में आये तब हरियाणवी, फारसी और अरबी हिन्दुस्तानी नाम से जानने लगी। साधारणतः मुगल राजाओं के सरहिन्दी, हिन्दुस्तानी, ‘वर्दी’-वर्दी के नाम पर उर्दू नाम पड़ा, वर्दी पहनने वाले लोग की भाषा उर्द भाषा नाम से जानने लगी। भाषा का कुछ शब्द सम्भार फारसी तथा तुर्की से था और सर्वनाम, क्रियारूप और शब्द रूप हरियाणवी भाषा का। सही ढंग से बोले तो उर्दू भाषा नहीं थी, थी हरियाणवी, बाद में हरियाणवी से हिन्दी का जन्म हुआ।

भोजपुरी भाषा का अपना स्वर विन्यास और उच्चारण विधि है। इण्डो आर्यन भाषा में वर्णों के तीन प्रकार की उच्चारण विधियाँ हैं, विस्तृत, सम्वृत और तिर्यक। भोजपुरी में उच्चारण विधि सम्वृत है, जिसमें ‘अ’ उच्चारण दीर्घ होता है। कभी कदाचित विवृत और तिर्यक का प्रयोग जो प्रायः नहीं ही होता है। तिर्यक में ‘आ’ ‘ओ’ मिश्र हो जाता है।

आर्यों के निवास कई चरणों में हुए थे। प्रथम चरण में वे खैबर दर्रे से आकर मात्र जम्मू तक आए, दूसरे चरण में वे सरहिन्द तक और तीसरे चरण में वे प्रयाग तक पहुँचे। ऑष्ट्रिक लोगों से सम्पर्कित होने पर उनका रूपान्तरण ऑष्ट्रिक आर्य वर्ग में हुआ। वाराणसी उनकी सभ्यता संस्कृति का चरमबिन्दु रहा।

आर्यन ऋषि अपने लोगों को मगध में और अपने क्षेत्र से बाहर जाने के लिये मना करते थे। जिन ब्राह्ममणों ने निर्देश का उलंघन किया, उनको जाति के बाहर किया जाता था और उनकी सरायुंपारिन ब्राह्मण या दुसरे दर्जी का ब्राह्मण से जाना जाता था।

काशी राज्य के पूर्व संस्कृत शब्दों की प्रधानता थी। तद्भव शब्द अपेक्षाकृत कम थे। भोजपुर और जौनपुर परिक्षेत्र में तद्भव शब्दों की प्रधानता थी किन्तु उनका उच्चारण भोजपुरी स्वर विन्यास के अनुसार होता था।

केरल के नम्बूदरी ब्राह्मण बंगाल से जल और थल दोनों मार्गों से गए थे। वे उत्तर क्षेत्रों की सभ्यता संस्कृति अर्थात् विन्ध्य से उत्तर, दो सभ्यताओं का मिश्रण हुआ। बंगाल और केरल दोनों में महिलायें सामाजिक उत्सव के अन्त में एक विशेष ध्वनि का उच्चारण करती हैं, जो दोनों के इस मिश्रण का प्रमाण है। दोनों में अंगवस्त्रम् या चद्दर का उपयोग होता है। यह सभ्यताओं का सम्मिश्रण भारत की अपनी मूलभूत विशेषता है।

काशी राज्य में अनेक यजुर्वेदी ब्राह्मण पाए जाते हैं, अथर्ववेदी अपवाद स्वरुप (मराठी) पाए जाते हैं। जनेऊ की लम्बाई के आधार पर इसका निर्णय होता है।

29 मार्च 1984

श्री पी. आर. सरकार

अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित