एल.के. अग्रवाल
कृष्ण कहते हैं, “हे अर्जुन, मेरी ओर देखो! यदि मैं एक क्षण के लिए भी काम करना बंद कर दूं, तो सारा ब्रह्माण्ड नष्ट हो जाएगा। मुझे काम से कुछ भी लाभ नहीं है; मैं ही एकमात्र परम सत्ता हूं, फिर भी मैं काम करता हूँ, क्योंकि मैं संसार से प्रेम करता हूं।” जहां सच्चा प्रेम है, वहां बदले में कुछ पाने की अपेक्षा समाप्त हो जाती है, और भौतिक कार्यों के प्रति आसक्ति कम हो जाती है।
लोग अपने आस-पास के लोगों से अपेक्षा करते हुए गहरी पीड़ा, दुख और संताप से पीड़ित होते हैं। वे दुनिया के सबसे सुखी लोगो हैं, जो अपने बच्चों के पालन- पोषण, शिक्षा- दीक्षा के बदले में कुछ भी अपेक्षा नही रखते है। माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे बच्चो के लिए तब तक काम करें, जब तक कि वे दुनिया के उतर- चढ़ाओ का भली भाती सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से मजबूत न हो जाएं। यहीं पर बात समाप्त हो जाती है। शेष जीवन लोगों और समाज के हितकारी कार्यों के लिए समर्पित करना ही निर्देशित है। इस कार्य को उसी दृष्टिकोण को अपनाते हुए किया जाए, जैसा उन्होंने अपने बच्चों के लिए किया था। यही सनातन सत्य है।
यदि हम भगवान कृष्ण द्वारा कही गई बातों के भाव को ध्यान से देखें, तो मेरे मन में आता है कि मानव की संरचना के साथ ही भगवान ने अपने समस्त गुण बीज के रूप मे उनमे समाहित किया है। जिस प्रकार कि एक छोटे से बीज में एक बड़े बरगद के पेड़ की सभी संभावनाएं समाहित होती हैं। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमें न तो खुद पर भरोसा है, और न ही उस असीम सत्ता पर जिसने हमें और पूरे ब्रह्मांड को बनाया है।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं; इस संसार मे मालिक की तरह काम करो, गुलाम की तरह नहीं। लगातार काम करो, लेकिन गुलामी मत करो। क्या तुम नहीं देखते कि हर कोई कैसे काम करता है? 99 प्रतिशत मानव जाति गुलामों की तरह काम करती है, और इसका परिणाम दुख है; क्योंकि यह सब स्वार्थी काम है। अगर इसी काम को स्वतंत्र मन से करो; प्रेम से करो! तो परिणाम भी सुख और आनंद से परिपूर्ण होगा। प्रेम शब्द को समझना बहुत कठिन है; जब तक स्वतंत्रता न हो, प्रेम कभी नहीं आता। गुलाम में सच्चा प्रेम संभव नहीं है। यदि आप एक गुलाम खरीद लें और उसे जंजीरों में बांध दें और उससे अपने लिए काम करवाएं, तो वह एक मजदूर की तरह काम करेगा, लेकिन उसमें प्रेम नहीं होगा। इसलिए जब हम स्वयं गुलाम बनकर दुनिया के लिए काम करते हैं, तो हमारे अंदर प्रेम नहीं हो सकता, और हमारा काम सच्चा काम नहीं है। यह रिश्तेदारों, दोस्तों, बच्चों, और यहाँ तक की हमारे अपने लिए किए गए काम पर भी लागू है। स्वार्थी काम गुलामों का काम है। अगर विश्वास न हो तो एकांत मे बैठा कर चिंतन करो। प्रेम का हर कार्य खुशी लाता है; प्रेम का कोई भी कार्य ऐसा नहीं है जो अपनी प्रतिक्रिया में शांति और आनंद न लाए। वास्तविक अस्तित्व, वास्तविक ज्ञान और वास्तविक प्रेम एक दूसरे से हमेशा जुड़े रहते हैं।
क्या हम अपने काम के प्रति एक तरह का प्रेम उत्पन्न करने के तरीके खोज सकते हैं, चाहे वह व्यक्तिगत प्रकृति का हो, पेशेवर हो या सामाजिक। काम के प्रति प्रेम का विचार हर व्यक्ति में अलग-अलग होता है। हमें सर्वोच्च सत्ता द्वारा उपहार में दिए गए प्रेम के शक्तिशाली संधान का व्यहवारिक अभ्यास करने के लिए अपने मानसिक क्षेत्र का विस्तार करने की आवश्यकता है। शिवोत्तर तन्त्र का अनुपालन और भागवत गीत को आत्मसथ करे बिना ये संभव नही है।
एल.के. अग्रवाल

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