खैर मनाओ हैरत बी मुर्गे की शामत आई है, उसे हलाल होना है क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का महोत्सव मनाया जा रहा है

 

भारत वर्ष दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। जब भी भारत वर्ष में संसद चुनाव होता है तो दुनिया भर की नज़रें भारत वर्ष पर टिकी हुई होती हैं कि भारत वर्ष में अगली सरकार किसकी बनेगी और कैसा प्रधानमंत्री आएगा। वह उनके फ़ायदे के लिए काम करेगा कि नहीं। अब इतना बड़ा लोकतांत्रिक महोत्सव है तो पैसे भी पानी की तरह बहाए जाते हैं। कहाँ से पैसा आता है और किस तरह यह पैसे बनाये जाते हैं इसका किसी को हिसाब देने की भी ज़रूरत नही है। देश के खज़ाने से भी इस चुनाव को कराने के लिए देश के विभिन्न राज्यों में हर वर्ष, तो केंद्र में अगर स्थाई सरकार बन गई तो केंद्र के द्वारा भी 5 वर्षों में एक बार इस महोत्सव का आयोजन होता है।

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक महोत्सव किसी मेले से कम नही लगता और ऐसा प्रतीत होता है मानो सारा देश अजायबघर बना हुआ है और हर तरफ जोकर अपना खेल दिखा रहे हैं। कोई हँसी ठिठोली कर रहा है तो कोई नाराज़गी जता रहा है तो कोई चिंता प्रकट कर रहा है तो कोई गालियाँ बरसा रहा है। जनता के अलावा इन्हें सबकी फिक्र होती है। लोकतंत्र के इस महोत्सव में क्योंकि इन्हें मजहब, धर्म, जाति सम्प्रदाय, अमीरी, गरीबी सब कुछ इस समय याद आता है। पर आम जन की प्रगति कैसे होगी इसका लेखा-जोखा किसी के पास नही होता। कोई कहता है कि हम चाँद के सैर करवाएँगे तो कोई कहता है कि हम तीर्थ करने को आसान करवाएँगे, तो कोई कहता है कि वह भगवान से मिलने का रास्ता आसान करवा देंगे। ऐसे अनगिनत वादे किए जाते हैं और मुफ्त की रेवड़ियों के अंबार का बाज़ार सजाया जाता है और जनता को कौन सी रेवड़ी पसंद है उसका चुनाव करने के लिए दिग्भ्रमित किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और पत्र मीडिया सभी गीत गाकर अपने तरीके से कहानी सुनाते रहते हैं कि कौन सा साबुन बढ़िया और किससे बढ़िया सफाई होगी। शिक्षित एवं अशिक्षित सभी लोग इस महोत्सव में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं और उसे देशभक्ति की शान समझते हैं।

सभी महोत्सव के आनंद में मदमस्त रहते हैं पर जीत का तो एक ही फार्मूला काम आता है इस महोत्सव में। सबके आनंद के लिए बेचारे करोड़ों मुर्गे अपनी जान गँवाते हैं और बकरे हलाल होते हैं। कितना भी हल्ला किया जाए और कोई भी जीते पर मुर्गे का हलाल होना तो तय है और बकरे की जान जानी भी तय है। और दारू गंगा भी अवश्य ही बहेगी। जो इस देश की सबसे ज़्यादा जनसंख्या में हैं- गरीब, उनके बीच पैसे, धोती, साड़ी, कंबल, शाल और भी बहुत सारी रेवड़ियाँ और साथ में दारू, मुर्गा, मटन भी बटना ज़रूरी है क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा महोत्सव इन सबके बगैर अधूरा रह जायेगा और इस देश में चुनाव हो नहीं पायेगा। चुनाव आयोग को सब पता है और वह चुनाव में किसी प्रत्याशी द्वारा खर्च करने की सीमा भी तय करते हैं। पर वह यह सब जानते हुए भी गहन निद्रा में या स्वप्नों के सागर में गोते लगाते रहते हैं। दुनिया की लगभग 1/5 वीं आबादी इस देश मे रहती है पर यहाँ पर बुद्धिजीवियों का या तो अत्यंत अकाल पड़ा हुआ है या वह मौन व्रत में रहते हैं या स्वप्नों के सागर में गोते खाते हुए रहते हैं।

इस लोकतंत्र के महोत्सव में ईमानदारी, विकास, देशभक्ति, धर्म की विजय और न जाने क्या-क्या नारे लगाए जाते हैं पर पता नहीं कोई यह नहीं कहता कि किस तरह आम जन का विकास होगा और कैसे सबकी निम्न जरूरतों की पूर्ति की अर्थव्यवस्था बन पाएगी और देश का हर इंसान भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति की ओर अग्रसर होगा। देश मे जाति, मजहब, क्षेत्र, कौम, लिंग, अमीर-गरीब जैसा कोई विभाजन न होगा बल्कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जाएगा जिसमें मानवता की विजय होगी और धर्म का शासन होगा एवं किसी को निम्न ज़रूरतों की पूर्ति का अभाव न होगा। और यह देश एवं देश की जनता एक राष्ट्र और एक परिवार के रूप में कार्य करने में सक्षम हो पाएगी और किसी भी प्रकार की चुनौती का सामना करने के लिए पूरा देश एकजुट होकर सहयोगात्मक तरीके से परस्पर प्रेम की भावना से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होगा।

यह सब जानते समझते हुए मुझे बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि इस देश में सही प्रगतिशील नेतृत्व का अकाल पड़ा हुआ है और जनता भी महोत्सव के नशे में मदमस्त नाच रही है। उसे कोई फ़िक्र ही नहीं है कि कैसे व्यवस्था में सुधार होगा और कैसे नैतिकवान लोग नेतृत्व करने के लिए आगे आ पाएँगे क्योंकि जहाँ पर देश नेतृत्व के चुनाव के लिए इतनी अधिक मात्रा में पैसों की जरूरत होगी वहाँ तो भ्रष्टाचार, लूट, खसोट, सेंधमारी, ठगी यह सब शासन व्यवस्था का हिस्सा बनेगी ही बनेगी और इस महोत्सव के प्रायोजक दुनिया भर के पूंजीपति अपने-अपने फ़ायदे और हिस्से की गणित लगाना कैसे छोड़ पाएँगे और कैसे देश का नेतृत्व और प्रशासन पूंजीपतियों और मक्कारों के चंगुल से आज़ाद हो पायेगा?

यह सब तभी सम्भव हो पायेगा जब सामाजिक नैतिकता को महत्व दिया जाएगा, जब मानवता को सर्वोच्च शिखर पर रखा जाएगा, जब आध्यात्म आधारित धर्माचरण का आधार बनाया जाएगा। वर्तमान में तो ऐसा होता नज़र नहीं आता है तो हमें तो यही कहना पड़ता है कि- “खैर मनाओ हैरत बी मुर्गे की शामत आई है, उसे हलाल होना है क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का महोत्सव मनाया जा रहा है।” इसके अलावा बड़ी शर्मिंदगी के साथ मेरे पास दुनिया के लोकतंत्र के सबसे बड़े महोत्सव के लिए कोई अन्य शब्द नहीं हैं।

आदर्श चंद्राकर