अग जग में व्याप्त,
सकल अस्तित्व के आदि श्रोत
जीवों के अन्यतम् आश्रय
भक्त वृन्द के प्यारे “बाबा”।
हे! सदाशिव,
हे! आशुतोष तुम आये,
सर्वजन हिताय
सर्वजन सुखाय
विखण्डित धरणी को
एक नया संदेश मिला।
अंधकार के भटके मनुज को
शाश्वत ज्योति पूंज मिला।।
जड़ चेतन में भास्वर
सकल सृष्टि के श्रष्टा।
कण-कण के द्रष्टा
घर मानव का तन।।
हे! सदाशिव,
हे! आशुतोष तुम आये
करुणा का नीर बहाये।
जग के सुविष्तीर्ण आंगन में
अवलम्ब मिला मानवता को।
युग-युग से उत्पीड़ित मानव में
विश्वास जगा शाश्वत सुख का।
तप्त-भूमि में तृषित जीवन को
ब्राह्मी शीतल छाव मिला।।
हे! सदाशिव,
हे! आशुतोष तुम आये
करुणा नीर बहाये।
मैं को मैं का बोध जगा।
इस महा बोध के
उत्स बिन्दू पर
तू ही तू ही शेष बचा।
हे! सदाशिव,
हे! आशुतोष तुम आये ।।
मधुकानन संदेश मई १९९३

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