प्रद्युम्न नारायण सिंह
समाजशास्त्र – आधुनिक तथा वैदिक
हम लोग प्राउटिष्ट समाजशास्त्र पर चर्चा कर रहे हैं। इसके पहले कि हम इस पर चर्चा करें, हमें आधुनिक समाजशास्त्र पर थोड़ी चर्चा करनी होगी। साथ ही हमें वैदिक समाजशास्त्र पर भी थोड़ी चर्चा करनी होगी, इससे हमें समझने में भी थोड़ी आसानी होगी। मै स्वयं अभी प्राउटिष्ट समाजशास्त्र पर स्पष्ट नहीं हूँ, अपितु इसे समझने का प्रयास कर रहा हूँ। इस प्रयास में कम से कम एक संकेतक बन जाये तो यही मेरे लिए बड़ी बात होगी। जीवन मूल्यों में बड़ी तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। यह ठीक उसी तरह है जैसे हम किसी बच्चे को युवा होने से नहीं रोक सकते। परिवर्तन होंगे, यह सृष्टि का विधान है।
भारत में समाजशास्त्र का आरम्भ मुंबई और लखनऊ विश्वविद्यालयों से लगभग एक ही समय हुआ। सन् 1919 में मुंबई विश्वविद्यालय ने भारत में समाजशास्त्र के पहले प्रोफेसर के रूप में सर पेट्रिक गेड्स को नियुक्त किया। सन 1921 में लखनऊ विश्वविद्यालय ने पहले भारतीय प्रोफेसर के रूप में डा० राधाकमल मुखर्जी को नियुक्त किया। भारत के अधिकांश समाजशास्त्रियों का प्रशिक्षण अधिकांशतः इन्हीं दोनों जगहों में हुआ। समाजशास्त्र को मुंबई में नागरिक शास्त्र के साथ और लखनऊ में अर्थशास्त्र के साथ सम्बद्ध किया गया। लखनऊ के प्रोफेसर आर. के. मुखर्जी तथा मुंबई के प्रोफेसर जी. एस. गुर्दे जो सर पेट्रिक के उत्तराधिकारी हुए, दोनों ने भारत में समाजशास्त्र के विकास में प्रमुख योगदान दिया। प्रोफेसर घुर्ये ने समाजशास्त्र को ऐतिहासिक भारतीय-विद्यालय परिप्रेक्ष्य प्रदान किया, जबकि प्रोफेसर मुखर्जी ने पश्चिम के बौद्धिक समाजशास्त्रीय पर्यावरण को निरंतर भारतीय आचार तत्व के साथ संश्लेषित करने का प्रयास किया।
भारत में समाजशास्त्र अथवा इस देश की समस्त विश्वविद्यालयी संस्कृति पश्चिमी, मुख्यतः ब्रिटिश परम्परा का विस्तार है। बढ़ता हुआ अमेरिकी प्रभाव तो भारत की आज़ादी के बाद की है। बोरोमीर इसके लिए दो कारण प्रस्तुत करते हैं- प्रथम तो ब्रिटेन में समाजशास्त्र की धीमी प्रगति, जिस पर भारतीय समाजशास्त्र बौद्धिक तौर पर निर्भर था तथा दूसरा- औपनिवेशिक शासन के कारण भारत में स्वतंत्र तथा सामाजिक आलोचनात्मक बौद्धिक वातावरण का अभाव था। ( सोशियोलोजी इन इंडिया, बोटा मोर) भारत में विशिष्ट शिक्षण विषय के रूप में समाजशास्त्र की पूर्ण चेतना तो बहुत बाद में आई, जब समाजशास्त्रीयों ने कुछ प्रमुख क्षेत्रों की ओर ध्यान केंद्रित करने की दृढ़ प्रवृत्ति प्रदर्शित की, जैसे –
1 -भारतीय सामाजिक संस्थायें (जाति तथा संयुक्त परिवार) एवं बंधुत्व (किन शिप),
2- मूल्य तथा प्रतिमान ( नॉर्म),
3- सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक विघटन,
4- महानगरों का अध्ययन तथा परिवार नियोजन,
5- ग्राम अध्ययन,
भारतीय समाज का व्यवस्थित अध्ययन। सामाजिक समस्याओं पर दार्शनिक चिंतन की परम्परा रही है। जब भारतीय
परम्परा गत समाज परम्परा हीन समाज के सम्पर्क में आया तो विचारकों की दो प्रतिक्रियाओं का उदभव हुआ और उन्होंने समाजशास्त्र के विस्तार को निर्धारित करने के लिए अपनी स्वयं की विचार पद्धतियाँ प्रदान की। पहले तो वे विचारक हैं जो आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को पूर्ण रूप से अस्वीकार करते हैं और परम्परागत मूल सिद्धांतों की ओर लौटना चाहते हैं। इनमें डा० कुमार स्वामी तथा डा० भगवान दास का नाम लिया जा सकता है। इनका विश्वास है कि जब कभी भारतीय समाज को विश्रृंखलन की शक्तियों का सामना करना पडा तो भारतीय समाज ने स्वयं अपने में से नवीन संस्कृति को उदभूत किया है।
कुल मिलाकर हमारे यहाँ समाज शास्त्र की स्थिति अच्छी नहीं है। पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थी प्रायः द्वितीय कोटि के होते हैं, जिन्हें अन्य आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद माने जाने वाले विषयों में प्रवेश नहीं मिलता है। समाजशास्त्र में प्रवेश लेने वालों में लड़कियों का अनुपात प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है जिनका अध्ययन अपना समय व्यतीत करने का एक बहाना होता है और इस बीच उनके माता-पिता उनके लिए वर खोजने में व्यस्त रहते हैं। समाजशास्त्र में एम. ए. की सरकार को आवश्यकता नहीं होती है।

बाबा कहते हैं, आज से दस लाख वर्ष मनुष्य को इस पृथ्वी पर आये हो गया लेकिन अब तक एक त्रुटि मुक्त मानव समाज का निर्माण नहीं हो पाया है। वैदिक काल के ऋषियों ने इस कमी को महसूस किया था इसलिए उनकी वाणी मुखरित हुई थी- “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुख भाग भवेत्”। तत्कालीन देव असुर संघर्ष से ऋषि मर्माहत थे। भगवान सदाशिव ने स्वयं विवाह कर परिवार संस्था की नीव तो डाल दी थी, इतना ही नहीं, उन्होंने आर्य कन्या पार्वती, अनार्य कन्या काली और मंगोल कन्या गंगा से विवाह कर सभी प्रजातियों को आपस में जोड़ने की कोशिश भी की। इससे पारिवारिक भावनाओं का जन्म तो हुआ, लेकिन सामाजिक भावना का विकास नहीं हो पाया था। इसी सामाजिक भावना को विकसित करने के लिए ऋषियों ने गाया था- “सं गच्छध्वं सं वदध्वं संवो मनांसि जानताम्”। समाजिक भावना का यह उच्चतम आदर्श था जो तत्कालीन व्यवहार में नहीं उतर पाया। शायद यह प्राउटिष्टों का देय है जो उसे चुकाना होगा। यथार्थ और आदर्श के बीच एक दूरी बनी रहती है। हम जितना ही आदर्श के निकट पहुंचते हैं यह दूरी थोड़ी बढ़ जाती है। यही चिरंतन खेल है इस सृष्टि का। तो असुरों और देवों के बीच निरंतर युद्ध चलते थे, यह दो संस्कृतियों का संघर्ष था। असुर कोई लम्बे नाखून, माथे पर सींग, लपलपाते जिह्वा वाले लोग नहीं थे, वे तत्कालीन भारत की अनार्य जन गोष्ठी के लोग थे, जो देवों अर्थात आर्यों से टकराते रहते थे। देव और असुर भाषा के अलंकारिक प्रयोग थे। वास्तव में वे इस धरती के ही लोग थे जो दो भिन्न संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते थे। आपने देवासुर संग्राम की अनेक कहानियाँ पढ़ी होंगी, दोनों जन-गोष्ठियों को आपस में मिलाने के प्रयत्न भी होते रहे। आपने समुद्र मंथन की कथा पढ़ी होगी। अमृत के लिए यह दोनों जन-गोष्ठियों को मिलाने का प्रयत्न था। आपसी वैमनस्य में तो विष मिलता है, आपसी सद्भाव में ही अमृत मिलते हैं। तो उस समय भी छल थे, प्रपंच थे, कूटनीति थी, लेकिन प्रबुद्ध ऋषियों ने सदा सं गच्छध्वं की आलोक वर्तिका जलाये रखी। असुरों और देवों के बीच इतने गहरे जातीय विद्वेष थे कि दो युवा हृदय का प्रेम मिलन भी कठिन था।

एक मार्मिक कहानी सुनाता हूँ। शायद यह प्राचीन भारतीय वांगमय की अकेली ट्रेजिक प्रेमकथा है। भारतीय संस्कृति और साहित्य में ट्रेजिडी पसंद नहीं किया जाता है। यहाँ के नाटक, फिल्में आदि सभी सुखांत होते हैं। पश्चिम की तरह हमारे यहाँ दुखांत नाटकों या फिल्मों का चलन नहीं है। तो कहानी है कि असुरों के गुरू शुक्राचार्य संजीवनी विद्या में निपुण थे। उस समय इस विद्या के एकमात्र ज्ञाता वही थे। केवल अपनी एकमात्र पुत्री देवयानी को उन्होंने यह विद्या सिखलाई थी। देवयानी सरल, सौम्य और विद्या निपुणा थी। इस विद्या के कारण देवासुर संग्राम में जो असुर मारे जाते, शुक्राचार्य संजीवनी विद्या से उसे जीवित कर देते। देवताओं ने छल कर के देव गुरू वृहस्पति के पुत्र कच को इस विद्या को प्राप्त करने शुक्राचार्य के पास भेजा। छद्म नाम से कच ने शुक्राचार्य का शिष्यत्व प्राप्त किया। उन दिनों आग्रही शिष्य को गुरू इनकार नहीं करते थे। कच शुक्राचार्य के घर में ही रहकर विद्या का अभ्यास करते। देवयानी शुक्राचार्य के इस सुदर्शन शिष्य की देखभाल करती। धीरे-धीरे दोनों प्रगाढ़ प्रेम संबंध में बंध गये। दोनों जैसे एक दूसरे के बिना अधूरे थे। एक दिन असुर समुदाय में इस रहस्य का भेद उजागर हो गया कि कच देव गुरू वृहस्पति का पुत्र है जिसने छलपूर्वक शुक्राचार्य का शिष्यत्व प्राप्त किया। शुक्राचार्य ने कच का वध कर उसे जलाकर राख कर दिया और उस राख को घोलकर पी गये ताकि इस राख में भी कच के जीवन की कोई संभावना नही रहे। देवयानी इस घटना से मर्माहत हो गई। कच के बिना यह विरहिणी कैसे रह सकती। उसकी आँखों के आँसू सूखते नहीं थे। शुक्राचार्य बेटी की व्यथा को महसूस करते थे, लेकिन वे असुरों के गुरू थे। जाति की सुरक्षा का बहुत बडा दायित्व उनके कंधे पर था। देवयानी को कच के वियोग में अपना जीवन भार लगने लगा। अंत में अपने प्रेम के लिए देवयानी ने एक कठोर निर्णय लिया। संजीवनी विद्या की ज्ञाता तो वह थी ही। कच का राख शुक्राचार्य के पेट में था। एक दिन रात के वक्त देवयानी ने सोये हुए शुक्राचार्य के पेट में स्थित कच के राख पर संजीवनी मंत्र का प्रयोग किया। कच शुक्राचार्य के पेट में जीवित हो गया। पेट में समा न सकने के कारण शुक्राचार्य का पेट फट गया और कच बाहर निकले। पेट फटने के कारण शुक्राचार्य की मौत हो गई। अब देवयानी शोक करे या खुश हो। इस अभागिन का जीवन तो अपने प्रेम के कारण अभिशप्त हो गया। संजीवनी विद्या तो वह जानती ही थी, उसने पिता को भी जीवित किया। कच की सीखी विद्या उसके छल के कारण लुप्त हो गई। वह श्रीहीन और सर्वहारा था अब, हीनता और लज्जा बोध के कारण एक क्षण भी वहाँ ठहरना कच के लिए असंभव हो गया। देवयानी साथ चलने के लिए गिड़गिड़ाती रही। बहुत अनुनय विनय किया, किन्तु सब बेकार। सिसकती देवयानी को छोड़ कच चला गया। अभागिन देवयानी सिसकती रही।

वैदिक काल में समाज का आदर्श बडा उदात्त था यह “संगच्छध्वं सं वदध्वं” मंत्र से ही ज्ञात हो जाता है। आनंद मार्ग का हर अनुष्ठान इसी मंत्र से आरम्भ होता है। “समम अजन्ति जना: अस्मिन इति समाज:”, एक साथ मिलकर चलने का नाम ही समाज है। हिन्दू मस्तिष्क बहुत अधिक संश्लिष्ट रहा है। यहाँ हिन्दू शब्द का प्रयोग मैने सम्प्रदाय गत विचार से नहीं किया है। हिन्दू शब्द का किसी धर्म या सम्प्रदाय से कुछ भी लेना देना नहीं है। आप भारतीय शब्द का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन यह अर्थ को पूरी तरह प्रकट नहीं करेगा। भारतीय मूल्यों की श्रेणीबद्धता की रचना करने में सफल हुआ है जिसकी अभिव्यक्ति अन्ततः मानवी उद्देश्यों के “त्रि वर्ग” में होती है, जिन्हें पुरूषार्थ भी कहा गया है। जीवन के आदर्शों- धर्म, अर्थ, काम- इन तीनों को मानवीय लक्ष्यों के निर्माणकाल के रूप में समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में इन्हें कर्तव्य, लाभ तथा आनंद कहा जा सकता है। ये तीनों उद्देश्य आवश्यक तथा वैधानिक हैं, परन्तु इन्हें इस प्रकार श्रेणी में क्रमबद्ध किया गया है कि निम्न आदर्श का अवलम्ब केवल उस समय तक कि उच्च आदर्श को हस्तक्षेप न करना पड़े।
कर्म का सिद्धांत सामाजिक अस्तित्व को आश्रमों के रूप में अविच्छिन्नता प्रदान करता है। इसका शाब्दिक अर्थ सोपान, अवधि अथवा दशा होता है। भूतकाल निर्धारित होने तथा भविष्य काल अनुबन्धित होने के कारण हिन्दू तत्वदर्शन जीवन भाग्यवादी, समर्पण नहीं माना जा सकता, अपितु यह तो आत्मानुभूति की तैयारी के रूप में तीव्र प्रयत्न करने का अवसर है।
इस अर्थ में मानव को जीवन के चार आदर्शों की प्राप्ति के लिए जीना चाहिये, जिन्हें धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष कहा गया है, धर्म व्यक्तियों पर नियमों के एक पुंज को आरोपित करता है जिसका एक व्यक्ति को अपने सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा पारमें रिक सम्बंधों में अनुसरण करना होता है, जीवन के दूसरे आदर्श ” अर्थ” की व्याख्या एक ऐसी क्रिया अथवा आचरण के रूप में की जा सकती है जो व्यक्ति को सामाजिक समूह के एक प्राणी के रूप में ही नहीं अपितु उसके एक अद्वितीय भाग के रूप में आर्थिक अथवा भौतिक सुख प्रदान करती है, ” काम” जीवन के आनंद के अर्थ में सांस्कृतिक पक्ष को प्रदर्शित करता है और इस प्रकार यह निराशावाद तथा त्यागवाद पर एक नियंत्रण के रूप में काम करता है, यह स्त्री पुरूषों के संबंध को इस अनुमान के आधार पर नियमित करता है कि शारीरिक जीवन अपने आप में पाप पूर्ण या हानिकारक नहीं, इसके विपरीत इसका कार्य तो एक आवश्यक तथा नैतिक कार्य का सम्पादन करना है, मोक्ष अथवा मुक्ति जीवन का अंतिम आदर्श है जिसके अनुसार व्यक्ति को अपनी सभी क्रियाओं को इस अंतिम उद्देश्य को ध्यान में रखकर करना चाहिए, इन आदर्शों की पूर्ति में सुविधा प्रदान करने के लिए व्यक्ति के जीवन को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास के चार आश्रमों में विभाजित किया गया, इन्हें अध्ययन, पारिवारिक कर्तव्य, ध्यान तथा त्याग की जीवन अवधियों में रूपांतरित किया जा सकता है, संक्षेप में प्राचीन जीवन आदर्श यही था, अत: भारतीय समाजशास्त्रियों को एक भिन्न सामाजिक दर्शन उत्तराधिकार में मिला है जो न केवल प्राचीन है अपितु अनेक सभ्यताओं के ज्ञात इतिहास से भी बहुत आगे चला जाता है, मनुष्य को न केवल अन्य मनुष्यों के साथ अपितु समस्त प्राणीमात्र के साथ संबंधों पर विचार विमर्श करने में अन्यतम है, अब इसीके आलोक में हम प्राउट के समाज दर्शन की चर्चा करेंगे—–
इस अर्थ में मानव को जीवन के चार आदर्शों की प्राप्ति के लिए जीना चाहिये, जिन्हें धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष कहा गया है। धर्म व्यक्तियों पर नियमों के एक पुंज को आरोपित करता है जिसका एक व्यक्ति को अपने सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा पारम्परिक सम्बंधों में अनुसरण करना होता है। जीवन के दूसरे आदर्श “अर्थ” की व्याख्या एक ऐसी क्रिया अथवा आचरण के रूप में की जा सकती है जो व्यक्ति को सामाजिक समूह के एक प्राणी के रूप में ही नहीं अपितु उसके एक अद्वितीय भाग के रूप में आर्थिक अथवा भौतिक सुख प्रदान करती है। “काम” जीवन के आनंद के अर्थ में सांस्कृतिक पक्ष को प्रदर्शित करता है और इस प्रकार यह निराशावाद तथा त्यागवाद पर एक नियंत्रण के रूप में काम करता है। यह स्त्री पुरूषों के संबंध को इस अनुमान के आधार पर नियमित करता है कि शारीरिक जीवन अपने आप में पाप पूर्ण या हानिकारक नहीं। इसके विपरीत इसका कार्य तो एक आवश्यक तथा नैतिक कार्य का सम्पादन करना है। मोक्ष अथवा मुक्ति जीवन का अंतिम आदर्श है जिसके अनुसार व्यक्ति को अपनी सभी क्रियाओं को इस अंतिम उद्देश्य को ध्यान में रखकर करना चाहिए। इन आदर्शों की पूर्ति में सुविधा प्रदान करने के लिए व्यक्ति के जीवन को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास के चार आश्रमों में विभाजित किया गया। इन्हें अध्ययन, पारिवारिक कर्तव्य, ध्यान तथा त्याग की जीवन अवधियों में रूपांतरित किया जा सकता है। संक्षेप में प्राचीन जीवन आदर्श यही था। अत: भारतीय समाजशास्त्रियों को एक भिन्न सामाजिक दर्शन उत्तराधिकार में मिला है जो न केवल प्राचीन है अपितु अनेक सभ्यताओं के ज्ञात इतिहास से भी बहुत आगे चला जाता है। मनुष्य को न केवल अन्य मनुष्यों के साथ अपितु समस्त प्राणीमात्र के साथ संबंधों पर विचार विमर्श करने में अन्यतम है। अब इसी के आलोक में हम प्राउट के समाज दर्शन की चर्चा करेंगे।
अब समय आ गया है कि प्राउटिष्ट अपनी निद्रा से जागकर सामाजिक जगत में अपने अधिकार पूर्ण स्थान को बलपूर्वक मनवावें। किन्तु यह थोथी घोषणाओं से नहीं, अपितु इस प्रकार के अध्ययन पर आधारित वास्तविक, योगदान द्वारा हो जिसकी परिकल्पना परमसत्ता द्वारा की गई है। हमें सिद्धांतों और अवधारणाओं पर बहुत उलझना नहीं है। सारे सिद्धांत और अवधारणायें दे दी गई हैं, हमें केवल इनको व्यवहारिक रूप देने की चेष्टा करनी है। हमें हमारे विषय की महानता को ध्यान में रखते हुए छोटे-छोटे मतभेदों को भुला देना चाहिए और दृढ़ निश्चय के साथ प्राउटिष्ट समाज के लिए ठोस सकारात्मक योगदान करने हेतु आगे बढ़ना चाहिए। न तो सामर्थ्य में और न साहसिकता में ही हमें किसी अन्य से पीछे रहना चाहिए।
44 समाजों की विशिष्ट आवश्यकताओं और उसकी विशेषताओं का अध्ययन किया जाना चाहिए, हर समाज का अपना-अपना समाजशास्त्र हो और सदृश विशेषताओं को एक दूसरे से जोड़ा जाना चाहिए।
प्राउटिष्ट द्वारा “प्रमा दर्शन” के सिद्धांतों को जानना आवश्यक है क्योंकि इसकी सहायता से ही किसी विघटित समाज या संस्था को पुनर्संगठित किया जा सकता है। सामाजिक विकास को आगे बढाने में इसकी महती भूमिका है। विकृत, विपर्यस्त और विक्रांत एक क्रम है जो विघटित समाज या संस्था के भिन्न-भिन्न स्तर हैं। निम्न स्तर से उच्च स्तर पर व्यवस्था को किस प्रकार लाया जाय, उसी का विज्ञान यह प्रमा दर्शन है। विकृत सामाजिक अवस्था के पुनर्गठन का यह मूलमंत्र है। प्राउटिष्ट सिद्धांतवादी नहीं प्रयोगधर्मी हैं, इसलिए उन्हें इस कौशल में दक्ष होना होगा।

I loved this article the most, because I am able to understand each word written in it. We are lucky to have Pradyumn dadaji with us.
Namaste dada ji wonderful update greatest perfect gift ideas of P R sarkar please let me know how to implement mukeshkumar