प्रकृति, प्रभात संगीत और शोभनीय सेमल वृक्ष

डॉ. वर्तिका जैन

सहायक आचार्य, वनस्पति शास्त्र विभाग, राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय

 

प्रस्तावना

प्रकृति के विभिन्न घटक मानव मन को प्रभावित करते हैं चाहे वह सूर्योदय हो या सूर्यास्त, ऋतुओं का बदलना हो या मेघ का गर्जन। मन स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर जाना चाहता है तथा संगीत इसमें एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रभात संगीत एक साधक के मन की विभिन्न अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करता हुआ समूचे मानव जगत के लिए एक अनुपम अवदान है। श्री प्रभात रंजन सरकार ने प्रभात संगीत के 5018 गीतों की श्रृंखला में प्रकृति के कई घटकों जैसे वनस्पति, लता-गुल्म, पशु-पक्षी, पर्वत, नदियाँ इत्यादि के माधुर्य को समावेशित कर संगीत का एक अद्भुत घराना रचित किया है जो मानव मन को आकर्षित किये बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के इन्हीं घटकों में उन्होंने एक अनुपम वृक्ष का उद्धरण कुल 31 प्रभात संगीत (सं. 103, 110, 439, 474, 1345, 1549, 1557, 1882, 1931, 2676, 2704, 2799, 3050, 3476, 3537, 3619, 3685, 3947, 3954, 4032, 4069, 4108, 4159, 4214, 4299, 4243, 4276, 4319, 4625, 4662 और 4708) में किया है, वह बहुमूल्य वृक्ष है – ‘सेमल’ जिसे ‘शिमूल’ या ‘शाल्मली’ के नाम से भी जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम – बोम्बेक्स सीबा है जो मालवेसी कुल का सदस्य है। इस आलेख में प्रकृति में सेमल के अद्वितीय सौंदर्य और विभिन्न गुणों को परिलक्षित करते, रहस्यवाद से परिपूर्ण प्रभात संगीत की चर्चा की गयी है।

 

 

प्रभात संगीत में शोभनीय सेमल

Vasanta Aaj Jaglo II #103 II Prabhat Samgiita II Basant Ritu II By Songs Of New Dawn

प्रभात संगीत में विभिन्न ऋतुओं यथा वर्षा, ग्रीष्म, शरद, शीत, हेमंत, बसंत इत्यादि के दौरान प्रकृति में होने वाले बदलावों को इंगित किया गया है। प्रकृति में सेमल जैसे मंजुल वृक्ष की शोभा को साहित्य सृजन में भुलाया नहीं जा सकता। सभी ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ, ‘ऋतुराज बसंत’ आशावाद का सन्देश लाता है। बसंत के आगमन के साथ ही पेड़-पौधों में नई कोंपलें और फूलों का विकास होता है और पतझड़ से उपजी हुई निराशा का समापन होता है। बसंत ऋतु के इसी प्राकृतिक सौंदर्य को तथा परमपुरुष की ओर आगे बढ़ते हुए साधक के मन की उल्लासित अवस्थाओं को श्री सरकार ने कई प्रभात संगीत में पिरोया है। इसमें बसंत ऋतु के सन्दर्भ में मुख्यतः प्रभात संगीत संख्या 103, 439, 1549, 1557, 1882, 1931, 3050, 3476, 3685, 4108, 4159, 4299, 4319, 4662 और 4708 में शिमुल वृक्ष का उल्लेख किया गया है। उदाहरण के लिए प्रभात संगीत सं. 103 में दर्शाया गया है की जब बसंत ऋतु का आगमन होता है तो प्रकृति में विभिन्न पेड़-पौधे पुष्पित होते हैं जैसे- आम, बकुल, शिमुल, पारुल, पलाश इत्यादि और एक मधुमय छटा बिखेर देते हैं। सेमल के रक्तवर्णी पुष्प भी सामान्यतया फरवरी से मार्च के बीच खिलते हैं, जब फागुन का आह्वान होता है। इस विशाल वृक्ष पर जब पुष्प लगते हैं तब इसकी पत्तियां झड़ चुकी होती हैं और दूर से गुलाबी चुनरी ओढ़े दिखाई देने वाले सेमल को ‘जंगल के राजा’ की संज्ञा दी जाती है। फाल्गुन के आगमन पर खिलने वाले विभिन्न पुष्पों के संग मन की दोलायमान अवस्था को प्रभात संगीत सं. 3050 में दिखाया गया है। मधुमास अर्थात बसंत ऋतु के आगमन पर आम वृक्ष पर मंजरिया लद जाती हैं तथा सेमल और पलाश के रंगीन पुष्पों से जंगल शोभायमान हो जाता है (प्रभात संगीत सं. 4159)।

 

इसी प्रकार रहस्यवाद को प्रदर्शित करते प्रभात संगीत सं. 439 में एक साधक के मनोभाव को बताया गया है जब उसके जीवन में बसंत ऋतु का प्रवेश हो जाता है तो उसके हृदय के दोनों किनारों पर लगे आम, बकुल, शिमुल वृक्षों में अप्रतिम चमक आ जाती है। साधक के परमपुरुष को प्राप्त करने की यात्रा में आने वाले इन पड़ावों को प्रकृति चित्रण के द्वारा प्रदर्शित करना एक अनूठा प्रयोग है। प्रभात संगीत सं. 3685 में परमपुरुष के आगमन की रात्रि की तुलना फागुन के मौसम की रात्रि से की गयी है जब पलाश के वृक्षों पर प्रेम से भरे अनेक फूल खिले होते हैं और सेमल वृक्ष की शाखायें नयी पुष्पकलिकाओं से सज्जित होकर झूम रही होती है।

 

 

प्रभात संगीत सं. 1882 में फागुन के आगमन पर प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारते हुए शिमुल के सुन्दर पुष्प खिल उठते हैं जैसे वे दिल खोल कर नृत्य कर रहे हों। और उसी प्राकृतिक छटा के बीच साधक देखता है कि बाँस के जंगल में अचानक किसी अजाना पथिक ने प्रवेश किया है। इसी प्रकार उस अजाना पथिक को खोजते हुए साधक प्रभात संगीत सं. 1931 में पूछ रहा है कि मेरे अंतर्मन में किस अपेक्षा से तुमने अग्नि प्रज्वलित कर दी है जैसे की बसंत ऋतु में एक बगीचा खिल उठा हो और तब तुम ऊँचे सेमल के वृक्ष के नीचे धीरे-धीरे चलते हुए आम मंजरी की ओर अपनी निगाहें रखे हो साथ ही सम्पूर्ण वातावरण को भावुक बना दिए हो। प्रभात संगीत सं. 4299 में साधक पूछ रहा है कि साल और महुए के जंगलों में आज कौन आया है कि बसंत ऋतु के रंगों में पेड़-पौधे अनुरंजित हो रहे हैं। सेमल के फूल पूर्ण रूप से खिल गए हैं, तो वो अजाना पथिक, आम की मंजरियों को देखते हुए उन्हें प्रेम से अपनी और बुला रहा है। इसके साथ ही प्रभात संगीत 4319 में बसंत ऋतु के आगमन में देरी को भी प्रकृति चित्रण से प्रदर्शित किया गया है कि क्यों शीत ऋतु समाप्त नहीं हो रही है? क्यों पलाश के फूल पल्लवित हो कर दोलायमान नहीं हैं और लगता है की सेमल के वृक्ष को भुला दिया गया है। मुख्यतया एक साधक के परमपुरुष को न पा सकने की बेचैनी की अवस्था को इस प्रभात संगीत में चित्रित किया गया है।

 

प्रभात संगीत सं. 4662 में साधक परमपुरुष से कह रहा है की मेरे मन के उपवन में आकर, सेमल, बकुल और बेर के वनों में तुमने बसंत ऋतु का माधुर्य घोल दिया है। प्रभात संगीत सं. 4708 में साधक परमपुरुष को सम्बोधित करते हुए कहता है कि क्या आप नहीं जानते कि मैं आपसे प्रेम करता हूँ। वर्ष की सब ऋतुओं में सब समय, मैं तुम्हें याद करता हूँ। चैत्र के महीने में जब फागुन का आगमन होता है पलाश पर पुष्प खिल उठते हैं और तब बकुल, शिमुल और आम की कलियाँ मुझे आश्वासन देतीं हैं कि परमपुरुष से मिलने की मेरी साधना जरूर सफल होगी। रहस्यवाद को परिलक्षित करते एक प्रभात संगीत सं. 1345 में साधक कहता है कि मरुस्थल की मृगमरीचिका मुझे निरंतर बुला रही है। मैं उस नीरव, शुष्क और बंजर रेत से प्रेम करता हूँ तथा सेमल और पलाश के पुष्पों से उसका मौन अभिषेक करता हूँ। दूर-दूर तक फैले हुए मरुस्थल में जहाँ केवल सूखी रेत नजर आती है, हरीतिमा और रंगों का नामो-निशान नहीं दिखता, वहाँ उस रेत के अभिषेक के लिए सुर्ख गुलाबी रंग के जीवंत सेमल के फूलों का उपयोग करना, यह एक अप्रतिम उपमा है।

 

 

इसी प्रकार प्रभात संगीत सं. 3537 में साधक अपनी मनःस्थिति का वर्णन करते हुए परमपुरुष का आह्वान कर रहा है। वह कहता है कि सेमल का वृक्ष फूलों से लद गया है, पपीहा आवेशित होकर आवाज़ दे रहा है और सब पूछ रहे हैं कि तुम कहाँ हो? मेरे मन के बगिया में लगे हुए पेड़-पौधे तथा पशु-पक्षी भी अपने अंतर्मन में मुस्कुराते हुए सभी केवल एक (परमपुरुष) को ही चाहते हैं। प्रभात संगीत सं. 3476 में बसंत ऋतु के परिप्रेक्ष्य में ही विशाल सेमल वृक्ष की ऊंचाई की और इंगित किया गया है। इसमें साधक कहता है कि आज मेरे मानसिक बगीचे में कौन आया है की मेरा मन रंगों से भर गया है और अपने सारे कार्य भूल गया है। जहाँ एक ओर व्यथित होकर बकुल के पुष्प गिर रहे हैं वहीं दूसरी ओर निडर खड़ा विशाल सेमल का वृक्ष अन्य सभी वनस्पतियों से प्रतिस्पर्धा करता प्रतीत होता है। प्रभात संगीत सं. 2799 में साधक परमपुरुष से कहता है कि जब मैंने तुम्हें देखा तब आम की कलियों में मधु प्रवेश कर चुका था। पारुल और सेमल के पेड़ पास-पास बैठकर स्वर्णिम प्रकाश में सारी घटनाओं का वर्णन कर रहे थे और सबकी प्रसन्नता देखते ही बन रही थी।

प्रभात संगीत सं. 2704 में साधक परमपुरुष के गुणों को बताते हुए उनसे कहता है कि, हे परमपुरुष आप बर्फ से आच्छादित पर्वत-चोटियों पर जल रही अग्नि की ज्वाला समान हो जिसने मेरे जीवन को प्राणों से भर दिया है। साधक कहता है कि- परमपुरुष आप इस नश्वर संसार में अमरत्व की दीप्ति हो और स्वर्ग के पारिजात वृक्ष की सुगंध को भी गंधहीन सेमल के पुष्पों में भर सकते हो। सेमल के बड़े-बड़े पुष्पों में कोई गंध नहीं होती इसलिए इसे निर्गंधपुष्पी भी कहा जाता है। परन्तु अत्यंत सुगन्धित पारिजात की सुगंध को सेमल के फूलों में स्थानान्तरित करने का कार्य केवल परमपुरुष ही कर सकते हैं।

नव वर्ष के आगमन पर चैत्र ऋतु में सेमल वृक्ष की सुंदरता मन को मादकता से भर रही है क्योंकि यही वह समय होता है जब सेमल के खूबसूरत लाल रंग के पुष्प पेड़ पर दिखाई देते हैं (प्रभात संगीत सं. 4032)। सेमल के वृक्ष पर अप्रैल-मई के महीनों में फल लगते हैं जिसमें भरी हुई रेशमी रुई में अनेक काले रंग के बीज होते हैं। प्रभात संगीत सं. 110 में ग्रीष्म ऋतु का चित्रण करते हुए श्री सरकार सेमल के इस लक्षण को बताते हैं कि गर्मी के दिनों में सेमल वृक्ष बीज से भर जाता है। प्रकृति प्रेम के चलते यह उनकी सटीक अवलोकन क्षमता को भी प्रदर्शित करता है।

 

बहु-उपयोगी सेमल

जहाँ एक ओर सेमल वृक्ष की सुंदरता मानव मन को उद्वेलित कर साहित्य सृजन को प्रेरित करती है वहीँ दूसरी ओर सेमल के असंख्य गुण सर्वत्र अपनी छाप छोड़ते हैं। ना केवल औषधीय वरन सेमल वृक्ष आध्यात्मिक, पारिस्थितिक, व्यावसायिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एक बहुद्देशीय वृक्ष है जिसका प्रत्येक भाग- जड़, तना, पत्ती, फूल, फल, गोंद, बीज, रुई, कांटे, छाल औषधीय महत्व रखता है। यह प्रदर रोग, नपुंसकता, उदर रोग, मुहांसे आदि कई व्याधियों के उपचार में पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों में उपयोग लिया जाता रहा है। विभिन्न वैज्ञानिक शोध निष्कर्षों में वर्तमान में प्रचलित मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों में भी इसके उत्साहवर्धक परिणाम सामने आये हैं। सेमल वृक्ष से कई उपयोगी रासायनिक तत्त्व भी निकाले गए हैं जैसे मैंगीफेरिन, शेमिमिसिन, एपिजेनिन, कैम्प्फेरोल, बीटा-सीटोस्टेरॉल, लुपीओल इत्यादि, जो विभिन्न रोगों के उपचार में औषधीय रूप से प्रभावी साबित हुए हैं।

देव-वृक्ष के नाम से विख्यात तथा पंचवटी के पाँच वृक्षों में शामिल सेमल का पेड़ घर के आस-पास के वातावरण को पॉज़िटिव माइक्रोवाइटामय कर सकता है। इसके साथ ही यह पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। एक छत्रक वृक्ष की तरह यह विभिन्न जीव-जंतुओं और पक्षियों को आश्रय प्रदान करता है। सेमल की जड़ें पानी को रोकने में सहायक होती हैं और तालाबों के किनारे इसे लगाकर ग्रीष्म ऋतु में भी जल की उपलब्धता बनायी रखी जा सकती है। बंजर भूमि को उर्वर बनाने के साथ ही उत्कृष्ट कोटि की वर्मीकम्पोस्ट खाद भी इसकी पत्तियों और फूलों से बनायी जाती है।

आर्थिक रूप से इसकी लकड़ी विभिन्न वाद्य यन्त्र जैसे ढोलक व मांदल बनाने, माचिस उद्योग, नावें, ताबूत, चम्मच, कृत्रिम पाँव इत्यादि बनाने में देश के विभिन्न राज्यों में इस्तेमाल होती है। इसकी रेशमी रुई, गद्दे-तकिये भरने के अलावा ध्वनिरोधक दीवारें, सोफे, कुशन, रजाईयां आदि भरने तथा सर्जिकल ड्रेसिंग में काम आती है। प्राचीन समय में दुर्ग की दीवार बनाने में भी सेमल की रुई इस्तेमाल की जाती थी। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है और सूखे हुए फूल भी औषधीय रूप से महत्त्व रखते हैं और 1600 रु. प्रति किलोग्राम की दर से बाज़ार में बिकते हैं। इसके अतिरिक्त भारत में विभिन्न समुदाय अपने उत्सवों, प्रथाओं, पहेलियों, लोक-गीतों इत्यादि में सेमल वृक्ष का प्रयोग करते हैं। नेजा उतारने जैसी रोचक प्रथा दक्षिणी राजस्थान में सेमल वृक्ष पर ही आधारित है।

परन्तु इतना बहुपयोगी वृक्ष राजस्थान के उदयपुर शहर में प्रतिवर्ष, प्रह्लाद का प्रतीक मानते हुए परम्परा का संवहन करने हेतु हज़ारों की संख्या में होलिका-दहन में जलाया जाता है जिसके सरंक्षण हेतु सोसाइटी फॉर माइक्रोवाइटा रिसर्च एंड इंटीग्रेटेड मेडिसिन (स्मरिम), उदयपुर, विगत 15 वर्षों से सेमल सरंक्षण अभियान में लगी है। इसके तहत सेमल के बीजों को एकत्र कर उनसे नए पौधे बनाना और विभिन्न स्थानों पर सघन पौधारोपण करने के साथ ही वर्ष 2011 से लोह-स्तम्भ पर पर्यावरण-संरक्षी होलिका दहन करने की पहल को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रही है। वर्ष 2021 में इस बहुमूल्य वृक्ष के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु सोसाइटी ने प्रतिवर्ष माघी पूर्णिमा पर ‘सेमल दिवस’ मनाने का संकल्प लिया और जिसके तहत प्रथम बार पूर्णतया एक वृक्ष को समर्पित ऑनलाइन राष्ट्रीय सेमिनार वर्ष 2022 में आयोजित किया गया।

 

उपसंहार

सेमल वृक्ष की शोभा हर क्षेत्र में दिखाई पड़ती हैं चाहे बाह्य सुंदरता हो अथवा औषधीय गुण, आध्यात्मिक महत्व हो या आर्थिक उपयोगिता, साहित्य सृजन हो अथवा सामाजिक जीवन, पर्यावरण संतुलन हो अथवा परम्पराएं। सेमल ने जीवन के हर क्षेत्र में मानव के लिए अपनी उपादेयता सिद्ध की है। प्रभात संगीत में सेमल को स्थान देकर श्री सरकार ने इस वृक्ष का महत्त्व और अधिक बढ़ा दिया है। परन्तु आज भावजड़तावादी परम्पराओं का वहन करते-करते यह अपने अस्तित्व की सार्थकता खोने की कगार पर है तथा सरंक्षण के अभाव में उदयपुर के आस-पास से लुप्त होता जा रहा है। यह आह्वान है समूचे मानव समाज को कि वह अब भी संभल जाय और सेमल के सरंक्षण हेतु सम्मिलित प्रयास करे। भावजड़ता का समूल नाश करके, सघन पौधरोपण द्वारा सेमल को आने वाली पीढ़ियों के उपयोग हेतु सरंक्षित करे ताकि इसकी सुंदरता अर्थपूर्ण बनी रहे।

 

उदयपुर-313001, राजस्थान, भारत

ई-मेल: vartikabotany@gmail.com